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मीडिया में राजनीतिक दखल की समस्‍या का क्‍या हल है?

गत माह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने चार महानगरों में टेलीविजन प्रसारण को डिजिटल बनाने की 30 जून की समय सीमा आगे बढ़ा दी। नयी समय सीमा 31 अक्टूबर तय की गई है। इस काम में हो रही देरी के लिए कई वजहें जिम्मेदार हैं। इसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा है केबल टेलीविजन का स्वामित्व। अनेक राज्यों में स्थानीय राजनेताओं के पास केबल टेलीविजन का स्वामित्व है और वे नहीं चाहते कि उनकी जागीर बन चुके इस कारोबार में किसी तरह की जांच या निगरानी का दखल हो। डिजिटल व्यवस्था के लागू हो जाने के बाद अनिवार्य तौर पर ऐसा होने लगेगा। यही वजह है कि उनमें से अधिकांश लगातार इस काम को आगे टलवाने में लगे रहे।

गत माह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने चार महानगरों में टेलीविजन प्रसारण को डिजिटल बनाने की 30 जून की समय सीमा आगे बढ़ा दी। नयी समय सीमा 31 अक्टूबर तय की गई है। इस काम में हो रही देरी के लिए कई वजहें जिम्मेदार हैं। इसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा है केबल टेलीविजन का स्वामित्व। अनेक राज्यों में स्थानीय राजनेताओं के पास केबल टेलीविजन का स्वामित्व है और वे नहीं चाहते कि उनकी जागीर बन चुके इस कारोबार में किसी तरह की जांच या निगरानी का दखल हो। डिजिटल व्यवस्था के लागू हो जाने के बाद अनिवार्य तौर पर ऐसा होने लगेगा। यही वजह है कि उनमें से अधिकांश लगातार इस काम को आगे टलवाने में लगे रहे।

बहरहाल यहां हम डिजिटलीकरण के बारे में नहीं वरन मीडिया के मालिकाना हक के राजनीतिकरण की बात कर रहे हैं और यह भी कि कैसे यह 80,000 करोड़ रुपये के भारतीय मीडिया और मनोरंजन जगत का स्वरूप बदल रहा है। कुल समाचार चैनलों में से एक तिहाई से अधिक का स्वामित्व या तो राजनेताओं के पास है या फिर राजनीतिक प्रभाव वाले बिल्डरों के पास। एक अनुमान के मुताबिक केबल वितरण व्यवस्था के 60 फीसदी हिस्से पर स्थानीय राजनेताओं का कब्जा है। इन्होंने न केवल कई स्थानीय चुनावों को प्रभावित किया है बल्कि उनको धन भी मुहैया कराया है। कई ऐसे छोटे और मझोले समाचार पत्र भी हैं जिनका स्वामित्व राजनेताओं या उनके परिजन के पास है और जो तमाम स्थानीय चुनावों पर असर डालते हैं। अनेक समाचार पत्र ऐसे हैं जिनके पास राजनीतिक असर के साथ-साथ प्रसारण नेटवर्क भी है। इसके अलावा अधिकांश के पास अब अपना इंटरनेट पोर्टल भी है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हमें मीडिया के राजनीतिक स्वामित्व और देश में चलने वाली बहसों की प्रकृति, विषय और गुणवत्ता पर इसके असर के बारे में चर्चा नहीं करनी चाहिए? लंबी अवधि के दौरान इस कारोबार के भविष्य पर इस तरह के मालिकाना हक के क्या नुकसानदेह असर हो सकते हैं? क्या यह लंबी अवधि के दौरान इसे अव्यवहार्य बना देगा?  क्या इसकी वजह से भारतीय और विदेशी निवेशक दूर हो जाएंगे क्योंकि इस श्रेणी के मालिकों के समायोजन के लिए नीतियों में बदलाव लाना होगा?

टेलीविजन का समाचार संबंधी कारोबार इस अध्ययन का एक बेहतर विषय है। टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट ( टैम ) के मीडिया शोध संबंधी आंकड़ों के मुताबिक देश में 133 समाचार चैनल हैं। यह संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। इन सबके बीच 1,800 से 2,000 करोड़ रुपये के विज्ञापन राजस्व को लेकर संघर्ष है। चार सूचीबद्घ टेलीविजन समाचार कंपनियों में से केवल एक-टीवी टुडे को मार्च 2012 में कर पश्चात लाभ हुआ। अधिकांश गैर सूचीबद्घ कंपनियां किसी तरह अपनी परिचालन लागत भर वसूल कर पा रही हैं। इन हालात के बीच तमाम ऐसे समाचार चैनल भी हैं जिन्हें प्रसारण लाइसेंस का इंतजार है।

समाचार चैनलों का सरसरी तौर पर किया गया अध्ययन बताता है कि एक तिहाई का मालिकाना हक ऐसी कंपनियों अथवा व्यक्तियों के पास है जिनकी नये ब्रांड की स्थापना में कोई रुचि नहीं है। अनेक चैनल केवल राजनीतिक हितपूर्ति के साधन हैं जबकि अन्य बिल्डरों आदि के लिए अपना प्रभाव जताने का तरीका। इसके परिणामस्वरूप पुराने तरीके से समाचार का कारोबार करके मुनाफा कमाने की कोशिश करने वाली कंपनियों को ऐसी कंपनियों से संघर्ष करना पड़ता है जो न तो शेयरधारकों और न ही निवेशकों के प्रति जवाबदेह हैं।

इस तरह वे पैसे का जैसा चाहें वैसा इस्तेमाल कर सकती हैं। एक सलाहकार के मुताबिक आंध्र प्रदेश में एक समाचार चैनल को सलाह दी गई कि उसे वहां पर चार आउटसाइड ब्रॉडकास्टिंग (ओबी) वैन की जरूरत है लेकिन उसका जोर 30 ओबी वैन रखने पर था क्योंकि उसे खर्च नियंत्रित करने अथवा मुनाफा अर्जित करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। केबल टीवी पर एक नजर डालते हैं। डिजिटलीकरण होने पर न केवल पारदर्शिता आएगी बल्कि राजस्व संबंधी गड़बडिय़ां दूर होंगी तथा और अधिक कर भी लगाये जा सकेंगे। आश्चर्य नहीं कि कोई भी केबल ऑपरेटर नहीं चाहता कि यह व्यवस्था लागू हो। सामान्य प्रक्रिया में कोई भी सरकार इसे केवल इसलिए लागू करती क्योंकि यह एक जरूरी व्यवस्था है लेकिन केबल टीवी के स्वामित्व के तरीके को देखते हुए अधिकांश सरकारों के लिए यह कठिन साबित हुआ है।

ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें कि राजनेताओं द्वारा मीडिया का स्वामित्व रखना नुकसानदेह साबित हुआ है। केवल असर के वजह से नहीं बल्कि इस कारोबार से जुड़ी पैंतरेबाजी के कारण भी। इससे कैसे निपटा जाए? आमतौर पर सरकारें मीडिया को हाथ लगाने से घबराती हैं। लेकिन फिर भी अगर कोई हस्तक्षेप होता भी है तो वह व्यापक परिदृश्य अथवा निष्पक्ष सोच से नहीं आता। रेडियो नीति और डिजिटलाइजेशन लॉ इसके अपवाद हैं। दोनों ही अग्रगामी सोच वाले मजबूत प्रावधान हैं। लेकिन आमतौर पर मंत्रालय पर गठबंधन साझेदारों तथा अन्य पार्टी सदस्यों आदि का दबाव पड़ता रहता है।

इसका जवाब है ब्रिटेन के ऑपकॉम या अमेरिका के संघीय संचार आयोग की तर्ज पर सरकार से स्वतंत्र मीडिया नियामक। अगर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड या बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण जैसा वाकई स्वतंत्र नियामक हो तो वह अधिक मजबूत माना जाएगा। ऐसे नियामक को संसद का समर्थन हासिल होता है और उसके निर्णयों को चुनौती देना आमतौर पर आसान नहीं होता। इससे स्थिरता आती है। ऐसी स्थिति में मीडिया नियामक स्वामित्व के बारे में एक नीति समेत कई ऐसे मसलों पर पर विचार कर सकता है जिनका सामना इस उद्योग को करना पड़ता है। सवाल यह है कि आखिर कौन सी सरकार यह सब करने की 'राजनीतिक' इच्छा दिखाएगी? साभार : बीएस

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