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सुख-दुख...

मीडिया में शोषण के मेरे पांच साल…

मैं कानपुर शहर में पिछले पांच सालों से पत्रकारिता कर रहा हूं. मैं आर्थिक रूप से गरीब परिवार से हूं. मेरे पिता जी इलेक्ट्रीशियन हैं जो रोजाना मुश्किल से १००-१५० रुपये ही कमा पाते हैं. कानपुर शहर के पत्रकार मेरा पिछले पांच वर्षों से शोषण कर रहे हैं. मैं जिनके यहाँ काम करता हूं वो एक नेशनल चैनल के ब्यूरो चीफ हैं. उनको न कैमरा चलाना आता है और न ही स्क्रिप्ट लिखने का काम आता है. सब काम मैं ही करता हूं.

मैं कानपुर शहर में पिछले पांच सालों से पत्रकारिता कर रहा हूं. मैं आर्थिक रूप से गरीब परिवार से हूं. मेरे पिता जी इलेक्ट्रीशियन हैं जो रोजाना मुश्किल से १००-१५० रुपये ही कमा पाते हैं. कानपुर शहर के पत्रकार मेरा पिछले पांच वर्षों से शोषण कर रहे हैं. मैं जिनके यहाँ काम करता हूं वो एक नेशनल चैनल के ब्यूरो चीफ हैं. उनको न कैमरा चलाना आता है और न ही स्क्रिप्ट लिखने का काम आता है. सब काम मैं ही करता हूं.

उन्होंने आज तक मेरे नाम से एक भी खबर नहीं भेजी है. वो मुझे १००० रुपया महीना देते हैं विथ पेट्रोल. यह पैसा मेरे पेट्रोल भर का भी नहीं होता है. कानपुर शहर के पत्रकार लोग जूनियर पत्रकारों का ऐसे ही शोषण करते हैं. वो मुझसे अपने घर का भी काम कराते हैं, जैसे सब्जी लाना, झाड़ू लगाना, खाना बनाना, जूठे बर्तन धुलाना, पैर दबवाना आदि. मुझे पिछले दो वर्षों से एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिली.

मैं बहुत डिप्रेसन में हूं. अब मुझे नहीं लगता कि मैं पत्रकार बन पाउंगा. मैंने न जाने कितने लोगों के शोषण की खबरें अपने चैनल में दिखाई है और उनको शोषण मुक्त कराया है. लेकिन मैं खुद मजबूर हूं. अतः मैं चाहता हुं कि आप मेरी आत्मकथा प्रकाशित करें. मुझे बहुत ख़ुशी होगी. मैं समझूंगा कि मेरी भी आवाज़ सुनने वाले कोई है. मैं अपनी कुछ मजबूरियों की वजह से अपना नाम नहीं बता सकता हूं.

धन्यवाद

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