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मीनाक्षी नटराजन के मीडिया का गला घोंटने के अति उत्‍साह से कांग्रेस में असमंजस

बतौर सांसद मीनाक्षी नटराजन की ओर से तैयार किए गए निजी बिल के मामले में संदेशवाहक भी संदेश जितनी ही अहमियत रखता है. पहली बार संसद सदस्य बनीं नटराजन इतनी सीधी-साधी भी नहीं हैं. वे राहुल गांधी के ब्रिगेड की अहम सदस्य हैं. इसलिए जब उन्होंने मीडिया का गला घोंटने की पर्याप्त क्षमता वाले प्रिंट ऐंड इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्टैंडर्ड्स ऐंड रेग्युलेशन बिल का मसौदा तैयार किया तो खुद उनके संगी-साथी भी चकरा गए.

बतौर सांसद मीनाक्षी नटराजन की ओर से तैयार किए गए निजी बिल के मामले में संदेशवाहक भी संदेश जितनी ही अहमियत रखता है. पहली बार संसद सदस्य बनीं नटराजन इतनी सीधी-साधी भी नहीं हैं. वे राहुल गांधी के ब्रिगेड की अहम सदस्य हैं. इसलिए जब उन्होंने मीडिया का गला घोंटने की पर्याप्त क्षमता वाले प्रिंट ऐंड इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्टैंडर्ड्स ऐंड रेग्युलेशन बिल का मसौदा तैयार किया तो खुद उनके संगी-साथी भी चकरा गए.

क्या यह उनकी अपनी पहल थी या उन्होंने अपने नेता के आदेश पर ऐसा किया? मसौदे की भाषा किसी मंजे हुए कानूनी जानकार की है और नटराजन संविधान की विशेषज्ञ वकील नहीं हैं. नटराजन इस बिल को 30 अप्रैल को संसद में पेश करने वाली थीं लेकिन उस दिन वे वहां नहीं पहुंचीं और उनका बिल भी पेश नहीं हो सका. बिल के मसौदे में एक मीडिया रेग्युलेटरी अथॉरिटी के गठन का प्रस्ताव है, जिसके पास ऐसी किसी भी घटना के कवरेज को प्रतिबंधित या स्थगित करने का अधिकार है, जो ''किसी विदेशी या आंतरिक स्त्रोत से देश के लिए खतरा'' पैदा कर सकती है.

तीन सदस्यों वाली इस अथॉरिटी का चयन सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा सरकार के अन्य नामित लोग करेंगे ताकि सरकार के पास पूर्ण नियंत्रण और सेंसरशिप अधिकार रहें. प्रस्तावित बिल में दोषी पाए जाने पर 50 लाख रु. के जुर्माने का प्रावधान है. यह बिल किसी मीडिया संगठन के कामकाज को 11 महीने तक के लिए रोकने और उसका लाइसेंस रद्द करने जैसे कठोर कदम उठाने की भी सिफारिश करता है. यह प्रस्तावित अथॉरिटी को आरटीआइ के दायरे से बाहर रखकर यूपीए सरकार की उन शानदार उपलब्धियों का भी सफाया कर देता है, जो सूचना के अधिकार कानून लागू करने के जरिए इसे हासिल हुई हैं.

कांग्रेस असमंजस में है कि वह इस पहल पर क्या प्रतिक्रिया दे. राहुल गांधी से उनकी नजदीकी के कारण कांग्रेस के नेता यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि यह नटराजन का अपना अति-उत्साह है या उनके नाम पर फुलाया गया परीक्षण गुब्बारा है. एक कांग्रेसी सांसद के मुताबिक, ''मीडिया के प्रति उनके बॉस की बेरुखी चिर-परिचित है. अपने नंबर बढ़ाने के लिए शायद उन्होंने बंदूक थाम ली होगी.'' वे इस संभावना से इनकार नहीं करते कि नटराजन ने इस काम में कांग्रेस के किसी वकील सांसद की मदद ली हो. भारतीय जनता पार्टी ने संदेशवाहक नटराजन पर दमदार हमला करने में जरा भी देरी नहीं दिखाई. भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी बोले, ''चूंकि वे राहुल गांधी की करीबी हैं, अच्छा होगा इस मामले में अब राहुल ही सफाई दें.''

विवाद में एक बार राहुल गांधी का नाम आ जाने के बाद कांग्रेस के पास नटराजन और उनके बिल से पल्ला झड़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा. कांग्रेस महासचिव और पार्टी की मीडिया सेल के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी बोले, ''यह राहुल गांधी का नजरिया नहीं है. न ही नटराजन के बिल पर उन्होंने अपनी सहमति दी थी.'' सबसे पहले द्विवेदी की ओर से कांग्रेस की प्रतिक्रिया आना महत्वपूर्ण है. दरअसल, वे बता रहे थे कि इस मामले में पार्टी की ओर से क्या कहा जाना चाहिए. नुकसान की भरपाई के लिए संसदीय मामलों के राज्‍यमंत्री राजीव शुक्ला भी मैदान में कूद पड़े. उन्होंने कहा, ''यह नटराजन की अपनी पहल थी. किसी भी सांसद को निजी बिल पेश करने का अधिकार है. यह कोई सरकारी बिल तो है नहीं.''

दो दिन की खामोशी के बाद आखिरकार नटराजन ने 2 मई की शाम मीडिया के सामने अपना मुंह खोला. उन्होंने कहा कि इस बिल से राहुल गांधी का कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा, ''बिल पेश ही नहीं हुआ तो इसके बारे में बातचीत का अब कोई औचित्य नहीं रह जाता. ये मेरे निजी विचार हैं.'' इंडिया टुडे की ओर से बार-बार कोशिश किए जाने के बावजूद 38 वर्षीया नटराजन इस मामले में कुछ और कहने के लिए उपलब्ध नहीं थीं. राहुल के कार्यालय में सेक्रेटरी के तौर पर नियुक्त नटराजन का पार्टी में उत्थान असाधारण है. हालांकि वे मूलतः तमिल हैं, मगर मौजूदा संसद में वे मध्य प्रदेश के मंदसौर से चुन कर आई हैं. कांग्रेस के एक युवा नेता बताते हैं, ''राहुल युवा कांग्रेस के शिविरों में जो कुछ बोलते हैं, नटराजन उसी को दोहराती हैं.

संरक्षण या खानदान नहीं बल्कि कठिन परिश्रम आपको जीत दिलाता है, राहुल जब भी इस बात को कहते हैं, वे उदाहरण के तौर पर नटराजन का नाम लेते हैं. ''चश्मा चढ़ा गंभीर चेहरा लेकर और 'ऑटो वालों' की शिकायत में बड़बड़ाते हुए पार्टी बैठकों में पहुंचने की नटराजन की अदा ने भी उन्हें उनके मेंटर राहुल की नजरों में ग्रासरूट कार्यकर्ता के रूप में चढ़ाया है. लेकिन नटराजन के संसदीय क्षेत्र मंदसौर के कांग्रेसी सहयोगी उनके बारे में इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते. पार्टी का स्थानीय नेतृत्व क्षेत्र को पर्याप्त समय नहीं देने के कारण उनसे नाराज है. 2011 में राहुल जब भोपाल पहुंचे तो मंदसौर के एक कांग्रेस नेता ने उन्हें नटराजन पर तैयार किया गया एक चिट्ठा थमाते हुए कहा, ''कार से अगली रैली तक पहुंचने में आपको 15 मिनट लगेंगे. इस दौरान कृपया इसे पढ़ें और हमारी संसद सदस्य के बारे में और कुछ जानें.''

बुराड़ी में 2010 में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में जब नटराजन बोलने के लिए मंच पर आईं तो राहुल और सोनिया गांधी ने बड़े ध्यान से उन्हें सुना. गांधी नेतृत्व के बारे में चापलूसी भरे स्तुतिगान के अलावा उनके पास कहने को खास कुछ था भी नहीं. कुछ हटकर सोच पाने में उनकी स्पष्ट अक्षमता के बावजूद, इस बात में शायद ही कोई संदेह है कि वे गांधी परिवार की पसंदीदा हैं. स्वयंसेवी संगठन कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के वेंकटेश नाइक कहते हैं, ''सरकार कई तरह से मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिश करती रही है. यूपीए-2 सरकार ने खास तौर पर टीवी मीडिया को काबू करने के लिए गाइडलाइन तैयार करने की योजना बनाई थी लेकिन तीखे प्रतिरोध को देखते हुए उसने कदम पीछे खींच लिए. यह लोगों का मन भांपने का एक प्रयास है.''

मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिशें पहले भी हुई हैं. 1988 में राजीव गांधी सरकार लोकसभा में कुख्यात डिफव्मेशन बिल लेकर आई थी. लेकिन सरकार के इस प्रस्तावित बिल के खिलाफ देशभर में इतना जबरदस्त आंदोलन खड़ा हुआ कि 46 महीने के अपने समूचे कार्यकाल में राजीव गांधी को उन्हें मिले सबसे बड़े झ्टकों में से एक से रू-ब-रू होना पड़ा. मजबूरन उन्हें राज्‍यसभा में न सिर्फ इस बिल को दफनाने की घोषणा करनी पड़ी बल्कि अपने बचाव में यहां तक कहना पड़ा कि वे मीडिया की स्वतंत्रता के लिए कृतसंकल्प हैं. इसे विडंबना माना जाए कि मौजूदा गृह मंत्री पी. चिदंबरम और मीडिया पर मंत्रिमंडलीय समूह के नेता ने ही 1988 में डिफेमेशन बिल पर बहस की शुरुआत की थी. चिदंबरम ने तब कहा था, ''जो तलवार उठाते हैं उन्हें तलवार के वार से मरने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.'' यहां नटराजन और उनके मेंटर राहुल गांधी के लिए एक संदेश है. कानून बनाना बड़े पचड़े का काम साबित हो सकता है. (साभार: इंडिया टुडे)

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