सुभाष राय ने कभी खुद की मार्केटिंग नहीं की. वे जहां रहे, चुपचाप अपना काम करते रहे. अपने साथियों को अपना बेस्ट देने के लिए उकसाते रहे. यही वजह है कि वे अमर उजाला में रहे तो कई दशक तक एक ही यूनिट में संपादक के बतौर रह गए. उनके पास कई आफर आए, लेकिन वे कहीं गए नहीं, डिगे नहीं. वे बात के धनी हैं. जबान के मजबूत हैं. भरोसा रखते हैं और भरोसा रखने वालों को पसंद करते हैं. जुबान के खरे हैं, कलम के धनी हैं. इसलिए हिप्पोक्रेसी बहुत देर तक बर्दाश्त नहीं करते. खुलापन पंसद है, फक्कड़पन से प्यार है.
कबीरी अंदाज में जीवन जीने वाले सुभाष राय ने कम उम्र में ही घर से बगवात कर जेपी आंदोलन के बरास्ते जेल यात्रा कर ली थी. फिर साधु बनने के लिए संगम तीरे से लेकर वन-जंगल तक में भटके और साधनाएं की. जनसंदेश टाइम्स से जुड़े तो उन्होंने इस अखबार को शून्य से शुरू करके लखनऊ के कुछ पठनीय अखबारों में बना दिया. साहित्य, समाज, संस्कृति, संवेदना, कला, कविता के माध्यम से उन्होंने जनसंदेश टाइम्स अखबार को समझदार लोगों को अखबार बना दिया. लखनऊ जैसे शहर में यह काम बहुत मुश्किल था लेकिन सुभाष राय ने अपनी छोटी और जुझारू टीम के जरिए यह कर दिखाया.
आजकल के दौर में जबकि अखबार चौबीस घंटे के भीतर बासी निर्जीव हो जाया करता है, फिर आग जलाने या छोटे बच्चों की टट्टी साफ करने के काम आने लगता है, तब सुभाष राय ने जनसंदेश टाइम्स को संग्रहणीय अखबार में तब्दील किया. जिसमें छपे को पढ़ने के लिए बुद्धिजीवी, साहित्यकार, समझदार लोग कई कई दिनों के पुराने अखबार खोजते खंगालते फिरते थे. ऐसे सुभाष राय ने इस अखबार से अपने अलगाव की घोषणा भी बड़े अलग अंदाज में की. उन्होंने अपने करीबी लोगों को लिखकर दिल का हाल बताया, ताकि उनके करीबियों को उनके जाने की खबर किसी और से लगे, उससे पहले वे ही बता दें कि दोस्त, मैं तो यहां से चला. पढ़िए सुभाष राय का अपने नजदीकी लोगों को भेजा गया पत्र, जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है. सुभाष राय के बारे में ज्यादा जानने के लिए उनका भड़ास पर प्रकाशित दो पार्ट में इंटरव्यू इस लिंक पर क्लिक करे पढ़ सकते हैं- सुभाष राय इंटरव्यू पार्ट एक और सुभाष राय इंटरव्यू पार्ट दो. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया
उधर से प्रधान संपादक बनने की बधाइयां, इधर से अखबार को विदा कहने का गीत

-सुभाष राय-
कौन अपना सपना खुद ही तोड़ना चाहता है लेकिन कई बार बड़े-बड़े सपने भी बचाये नहीं बचते। यह सब अनायास एक दिन में घटित नहीं हुआ। समय लगा, इसके दरकने में, टूटने में। कोई भी मेरी मनस्थिति को, मेरे द्वंद्व को समझ सकता है कि जब मुझे प्रधान संपादक बनने के लिए मित्रों की बधाइयाँ मिल रही थीं तो मेरे मन में यह निश्चय जन्म ले रहा था कि अब बस, बहुत हो चुका, खत्म करो यह नाटक।
मैं बहुत कृतज्ञ हूं अपने छोटे भाई जैसे देवराज का, जिनकी वजह से मैं जनसंदेश टाइम्स शुरू करने लगभग एक साल पहले लखनऊ आया। मैं जानता हूं मैंने देवराज को कितना कष्ट पहुंचाया, कितनी बार उनकी बात नहीं मानी, कितनी बार उन्हें डाँटा और हर बार उन्होंने पीछे हटकर मेरे प्रति अपना सम्मान का भाव बनाये रखा। अब भी बनाये हुए हैं। कभी वे जनसंदेश टाइम्स में बहुत ताकतवर थे, अब नहीं हैं। हाँ, इतना जरूर कि मैंने उनका जब भी विरोध किया, उन्हें कहीं किसी क्षण रोका तो केवल अखबार के हित के मद्देनजर। मैं सौरभ जैन को भी इस मामले में एक अच्छा आदमी मानता हूं कि धन की कंजूसी के अलावा उन्होंने कभी अखबार के मामलों में दखलंदाजी नहीं की। मैं इतने दिनों में यह नहीं जान सका कि यह अखबार बाबू सिंह कुशवाहा जी का है या नहीं लेकिन अनुमान करता हूं कि यह उन्हीं की क्षणबुद्धि की उपज है। किसी क्षण उन्होंने सोचा होगा कि एक अखबार होना चाहिए और वह हो गया। मैं उनकी अखबार को लेकर संपूर्ण निश्चिंतता का आदर करता हूं क्योंकि उसी के कारण जनसंदेश टाइम्स जनसंदेश टाइम्स बन सका। आश्चर्य कि उन्होंने कभी अपने अखबार के संपादक से मिलने की इच्छा नहीं जतायी लेकिन सुखद आश्चर्य कि उनकी इसी निश्चिंतता ने मुझे इस अखबार को कुछ अलग तेवर, कुछ अलग मिजाज देने में मदद की। मैं इसके लिए उनका बहुत कृतज्ञ हूं। सच है कि वे राजनीति के आदमी हैं, उन्हें अखबार से क्या लेना। मुझे खुशी होती थी, जब कभी मुझे उनके करीबियों से यह संदेश मिलता था कि उनकी नजर में अखबार बेहतर निकल रहा है। यह सच है कि उन्होंने मुझसे कभी नहीं मिलना चाहा तो मैंने भी उनसे कभी मिलना नहीं चाहा।
सारी समस्या तब खड़ी हुई जब सौरभ जैन की व्यस्तताओं और उन पर मंडराते खतरों को देखते हुए अनुज पोद्दार इसका प्रबंध देखने आये। मुझे नहीं पता कि उन्होंने इस अखबार को खरीद लिया या अखबार के कर्ता-धर्ताओं ने उन्हें यह काम सौंपा। मेरे पास यह जानने का कोई उपाय भी नहीं था, जरूरत भी नहीं थी। शुरू में उनका प्रबंध कौशल अच्छा लगा क्योंकि वे लेखा, कागज, मशीन, धंधा-पानी तक सिमित थे। उनका थोड़ा विरोध हुआ तो उन्होंने मुझसे मदद चाही। यह कहते हुए कि कोई उनका सहयोग नहीं कर रहा है, मैं करूँ। मैंने उनसे साफ कहा कि आप जो भी अखबार के हित में करेंगे, मैं आप के साथ रहूंगा, बाकी के लिए मैं आप को आश्वस्त नहीं कर सकता। उन्होंने कुछ अच्छे काम किये, मसलन बिना कागज-पत्र वाले काम-काज को कागज पर लाने में कड़ी मेहनत की। बार-बार अच्छे लोगों को लाने की बात करते रहे लेकिन मैं मजबूर था कि सबको निकाल कर फिर से अच्छे लोगों की भर्ती कर पाना संभव नहीं था। वे बार-बार मुझे बताते रहते थे कि किस तरह दूसरे अखबारों के बड़े-बड़े संपादकों से राय लेकर काम करते हैं। उन्होंने इन बड़े संपादकों की राय से जो पहला बड़ा काम किया, वह था डाक के यानी जिलों को जाने वाले अखबार में चार पेज का कट। बिना यह सोचे-समझे कि इसका क्या असर होने वाला है। जब दूसरे बड़े अखबार जिलों में 20 पेज से ज्यादा जा रहे हों, तब 16 पेज के अखबार की क्या औकात होगी। उन्होंने इस संबंध में किसी की बात नहीं मानी और कहा कि खबरें गिनने की व्यवस्था करवाइये। जनसंदेश टाइम्स के 16 पन्नों में जागरण, उजाला या हिंदुस्तान के 20 पन्नों से ज्यादा खबरें होती हैं। इसमें विज्ञापन नहीं होता। फिर उन्होंने हल्ला मचाया कि जब से 16 पेज का अखबार हुआ है, कानपुर में सर्कुलेशन बढ़ रहा है। मुझे बाद में पता चला कि बढ़ा हुआ अखबार रद्दी के भाव बिक रहा है। मेरे मित्र और वितरक आवाज के संपादक राकेश पांडेय ने मुझे वे तस्वीरें दिखायीं, जिनमें कानपुर में जनसंदेश टाइम्स की गड्डियाँ तोली जा रही थीं। उन्होंने शायद उन्हें छापा भी।
खैर इस तुगलकी फैसले का असर यह हुआ कि चार पेज की सामग्री अखबार से अचानक गायब हो गयी। यह अखबार अपनी बेहतरीन वर्गीकृत सामग्री के लिए जाना जाता था। इसमें वीस पृष्ठों में वह हर चीज उपलब्ध थी, जो पाठकों को चाहिए। पर चार पेज कम हो जाने के बाद जब जिलों से दबाव बढ़ा तो दूसरा बड़ा फैसला श्री पोद्दार जी ने किया, फीचर पन्नों में विज्ञापन घुसेड़ने का। निस्संदेह इस अखबार का गौरव था कि इसे हरे प्रकाश जैसा फीचर संपादक मिला था। इस अखबार की प्रतिष्ठा फीचर पन्नों की विशिष्टता और साहित्य, कला के इतवारी परिशिष्ट के कारण बढ़ी थी। यह एक ऐसा मिक्स था, जो किसी अखबार के पास नहीं था और इसी नाते जिलों की बहुत कम खबरों के बावजूद जनसंदेश टाइम्स लोगों की पसंद बनता जा रहा था। विज्ञापन घुसेड़कर उन्होंने इस विशिष्टता को भी खत्म करने का भरपूर प्रयास किया। कई बार इस प्रश्न पर मेरी उनसे झड़पें भी हुईं। श्रीमान अनुज पोद्दार को अगर कोई चीज सबसे नापसंद थी तो साहित्य और विशेष टिप्पणियाँ। उनके सलाहकार उन्हें बताते थे कि यह न्यूजपेपर है, व्यूजपेपर नहीं। इसमें न्यूज होनी चाहिए, व्यूज नहीं। उनके तीसरे फैसले पर मैंने सीधी मुठभेड़ की। उनका कहना था कि इस अखबार में यूथ के लिए कुछ नहीं है। फिर मेरी असहमति के बावजूद उन्होंने यूथ के लिए चार पेज का परिशिष्ट बनवाना शुरू किया। और एक दिन फरमान जारी किया कि साहित्य के छह पन्नों में से केवल दो रखो, बाकी चार उनके चमकीले कारों और सुंदरियों वाले पन्ने डालो। उस दिन मैंने उन्हें चेतावनी दी कि अगर ये पन्ने खत्म या कम किये गये तो मेरा काम करना मुश्किल होगा। मैं जानता था कि यह जनसंदेश टाइम्स के प्राण तत्व के साथ खिलवाड़ होगा और इसे मुझे स्वीकार करके इसके अंत की शुरुआत इतनी जल्दी नहीं होने देनी चाहिए। भगवान ने उन्हें या तो सद्-बुद्धि दी या किसी रणनीति के तहत वे इस निर्णय को टाल गये।
तब तक मैं कई बार पोद्दार जी से अपने संपादकीय सहकर्मियों के वेतन के बारे में कह चुका था। यकायक मुझे पता चला कि 12.5 फीसदी वेतन उन लोगों के बढ़ा दिये जाने का फैसला कर लिया गया है, जिन्होंने एक साल पूरा कर लिया है। एक शर्त रखी गयी कि आप पिछली नौकरी की पे-स्लिप दें। एक साल काम करने के बाद कोई पुराने संस्थान की पे-स्लिप मांगे तो कितना अव्यावहारिक और हास्यास्पद लगता है। कुछ लोगों ने नहीं दी, उनकी वेतन बृद्धि रोक ली गयी। जिन तीन लोगों की वेतन-वृद्धि रोकी गयी, उनमें मैं तो था ही, हरे प्रकाश और सत्येंद्र मिश्र भी थे। इस मसले पर कई बार मेरी श्री पोद्दार से बात हुई, उन्होंने हर बार कहा कि आदेश कर दिया गया है। पर हर अगले महीने पता चलता कि कुछ किया नहीं गया है। मैंने उनको कहा भी कि वेतन बढ़ाने का फैसला संपादक के मूल्यांकन पर होता है, मैनेजर इस मामले में एकतरफा फैसला नहीं कर सकता। संपादक को पता होता है कि कौन क्या कर रहा है। तमाम रिपोर्टर्स को उतना भी पैसा नहीं मिल रहा है, जितना पोद्दारजी के ड्राइवर को मिलता है। इस पर उन्होंने कहा कि ठीक है आप अपना मूल्यांकन दे दीजिये, फैसला तो मुझे करना है न। मैंने अपना मूल्यांकन उन्हें सौंप दिया है, उस पर क्या होगा, भगवान जाने। मैं नहीं जानता कि मेरे साथी उनकी हर चीज को नजरंदाज करने की जिद को स्वीकार करेंगे या अपना रास्ता लेंगे। खैर, इसी बीच कुछ नये स्टेशनों से लांचिंग की बात शुरू हुई। तैयारियाँ भी शुरू हो गयीं। नियुक्तयाँ हो गयीं। मुझसे कोई सलाह नहीं ली गयी। फिर नवनियुक्त संपादकों की बैठक बुलायी गयी। मुझे भी बुलाया गया। एक परिचय सा रहा। फिर यह प्रचारित होने लगा कि गोरखपुर में नयी कंपनी बना दी गयी है और वहाँ कोई दूसरा संपादक होगा। जब कई लोगों से मैंने यह बात सुनी तो मैंने पोद्दार जी से पूछा कि क्या माजरा है। उन्होंने इस खबर की पुष्टि की। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि संपादक का मतलब पूरा अखबार होता है, जो पूरा अखबार बनाता है, वही संपादक रहता है। और यह भी कि इतने संपादक अब जनसंदेश चलाने को तैयार हैं, मगर उसे ऐसा बनाने का काम किसने किया कि उसे चलाने के लिये ललचायी नजरें चारों ओर से लपकती दिखायी पड़ रही हैं, यह भी सोचना चाहिए।
इसी के साथ-साथ एक और अप्रिय प्रसंग यह हुआ कि लेखकों के पारिश्रमिक भेजे जाने बंद कर दिये गये। टुकड़ों-टुकड़ों में भेजे जाने लगे। अब जिन्हें चेक मिलता, वे दूसरों को बताते, दूसरे लोग मुझसे या हरे प्रकाश से सवाल करते। कभी-कभी तल्ख बातें होतीं, गालियाँ भी सुननी पड़ती। आप सोच सकते हैं कि जिनका सात महीने का पारिश्रिमिक नहीं मिला हो और जो लिख कर ही जीवन चला रहा हो, वह आखिर क्यों लिखना जारी रखेगा। अगर पारिश्रमिक से जीवन चलाने की मजबूरी न भी हो तो भी कोई बिना पैसे के क्यों लिखना जारी रखेगा। यह सब जानबूझकर किया गया, ऐसा मुझे लगता है ताकि लेखकों को नाराज किया जा सके। मैं उनके लिए लड़ता रहा। कई लेखकों से तो विज्ञापन देने को कहा गया। जो पारिश्रमिक के लिए फोन करता, उससे कहा जाता कि विज्ञापन भिजवाओ। कितनी शर्मनाक बात है। यह एक तरह से मेरी दृष्टि का, मेरी पहचान का, मेरे संपर्कों का अपमान था। हरे प्रकाश कई बार चिढ़ जाता, चले जाने को कहता लेकिन मैं उसे रोके रहा, लड़ता रहा। इस बीच पोद्दार जी ने संपादक के दायित्व में भी दखलंदाजी शुरू कर दी। किसी को भी किसी भी नेता के इंटरव्यू के लिए भेज देना, किसी के खिलाफ स्टोरी बनवाना, किसी को भी कोई भी मनमाना असाइनमेंट देना। कुछ सहकर्मियों ने विरोध किया, मेरे कुछ बरिष्ठ सहयोगियों ने इस पर एतराज किया, मना भी किया। उनसे कहा कि कोई भी काम कराना हो तो संपादक से कहो। प्रिय भाई सुरेश बहादुर ने हर बार ऐसी हर कोशिश का विरोध किया, पोद्दार को सही सलाह भी दी लेकिन वे नहीं माने तो नहीं माने। दुख है कि मेरे कुछ वरिष्ठ साथियों ने पौद्दार जी के संपादकीय निर्देशों के आगे समर्पण कर दिया।
आजिज आकर मैंने सभी जिम्मेदार लोगों देवराज जी, सौरभ जी और अन्यों को इस बारे में अवगत कराया और पोद्दार को एक लंबी मेल भेजकर उनसे कई मसलों पर स्पष्टीकरण मांगा। खेद है कि उन्होंने उस मेल का कोई जवाब नहीं दिया और अपनी दखलंदाजी पर कायम रहे। आये दिन वे मुझे भी मेसेज भेजते रहे कि कौन सी खबर कहाँ लगानी है, कौन सी हेडलाइन लेनी है, कौन सी पहले पेज पर लेनी है, कौन सी अंदर के पेज पर। मैं उन संदेशों पर कोई ध्यान नहीं देता।
मेरी मेल का जवाब तो उन्होंने नहीं दिया लेकिन कुछ दिनों बाद मुझे मेसेज किया कि तीनों लोगों के वेतन बढ़ाने के आदेश दे दिये गये हैं। मेरे, हरे प्रकाश के और सत्येंद्र के वेतन। अभी वह बढ़ा हुआ वेतन मिलना है। तीन चार दिन पहले एक दिन मैंने उनसे गोरखपुर संस्करण के संपादक के प्रश्न पर पूछा तो उन्होंने बड़े सद्भाव से कहा कि हर जगह प्रधान संपादक तो आप ही रहेंगे। लेकिन मुझे यह पता नहीं था कि वे अंदर कुछ और खयाल लिये घूम रहे हैं। पर उनकी दखलंदाजी और उनके परस्परविरोधी बयानों से यह लगने लगा कि वे कुछ ऐसा करने वाले हैं, जो वे मुझसे छिपाये हुए हैं। मुझे यह एक सप्ताह पहले ही पता चल गया था, पर मैंने तब उसे सच नहीं माना था। पोद्दार जी के एक नजदीकी ने मुझे बता दिया था कि दो फरवरी को मेरा हिसाब कर दिया जायेगा। मैं समझ गया था कि कुछ बड़े संपादकों और कुछ अन्य अखबारों के सलाहकारों की सलाह पर अमल करने की तैयारी चल रही है। तभी मैंने एक बड़ा अग्रलेख लिखा था-लिये लुकाठा हाथ। मैंने अपने मित्रों, कई स्नेही लेखकों को भी इस बारे में बता दिया था। मैं निश्चिंत था, तैयार था। इसी बीच वो दिन आ गया, जब गोरखपुर संस्करण के कुछ जिलों में अखबार जाना था। यही सोमवार यानि 30 जनवरी की तारीख। रात को गोरखपुर से प्रिंटलाइन भेजी गयी, जिसमें मेरा कहीं नाम नहीं था, संपादक के रूप में जागरण से बाहर किये गये एक सज्जन का नाम था। मुझे कोई एतराज नहीं होता, अगर वे सारे पन्ने बनाते और संपादक बनने का हक अपनी क्षमता और प्रतिभा से हासिल करते, पर उन्हें तो मेरे द्वारा लखनऊ में तैयार कराये गये अखबार का संपादक बनाया जा रहा था। उनका योगदान उसमें एक पेज की भी सामग्री का नहीं था, हाँ चार पन्ने जो गोरखपुर से आये थे, उनमें तीन पन्ने के विज्ञापन जरूर थे। इसी के लिए उन्हें संपादक बनाया जा रहा था। यह वह क्षण था, जब मुझे तय करना था कि घुटने टेक देना है या अपने मूल्यों, सिद्धांतों के लिए खड़ा होना है और मैंने और हरे प्रकाश ने तय किया कि यह फैसले की घड़ी है, फैसला लेना पड़ेगा। मैंने लखनऊ से एक भी पेज न भेजने का फैसला किया। कुछ देर बाद रात के 10 बजे के आस-पास अनुज पोद्दार का फोन आया, पेज अभी नहीं मिले। मैंने कहा, पेज नहीं जा रहे। जिसे संपादक बनना है, उसे पेज बनाना भी आना चाहिए। उन्होंने फिर दुहराया कि मुझे पहले ही बता दिया गया था कि गोरखपुर में नयी कंपनी बना दी गयी है, वहाँ स्वतंत्र संपादक होगा। मैं लखनऊ और बनारस का संपादक रहूंगा। मुझे यह स्वीकार नहीं हुआ कि मैं पूरा अखबार बनाऊं और कोई उसका संपादक बन बैठे। यह तो वैसे ही था जैसे कोई उपन्यास या कहानी लिखे और कोई चोरी से या सीनाजोरी से उसे अपने नाम से छपवा ले। बात आगे बढ़ी तो अनुज पोद्दार ने यह भी बताया कि ग्रुप एडिटर के रूप में वे अजय उपाध्याय को ला रहे हैं। मैंने कहा कि यह तो कल की बातें हैं, आज की बात करिये, अगर संपादक गोरखपुर के श्रीमानजी होंगे तो मैं आज कोई पन्ना नहीं दे रहा हूं। उनका तर्क था कि वे गोरखपुर में हैं इसलिए मैं उनकी योजना ध्वस्त करने की कोशिश कर रहा हूं। मैंने कहा, ऐसा बिल्कुल नहीं है, मैंने आप को कई बार इस सिलसिले में रुख साफ करने को कहा पर आप ने नहीं किया। आप ने मेरी मेल का कोई जवाब नहीं दिया, आप ने पूछने पर कहा कि संपादक तो सब जगह आप ही रहेंगे पर अब झूठ बोल रहे हैं। फिर उन्होंने प्रधान संपादक के रूप में मुझे अपना नाम डालकर पन्ने भेजने को कहा। मैंने भेज दिया। अखबार छपा और गोरखपुर के कुछ इलाकों में गया भी। लेकिन कोई भी समझ सकता है कि इतने तनाव भरे माहौल में कोई अखबार का काम कैसे कर सकता है। कितनी बड़ी विडंबना है कि जब मैं यह तय कर चुका था कि जनसंदेश टाइम्स में अब मेरे दिन खत्म, तब मुझे मेरे चाहने वाले प्रधान संपादक बनने की बधाइयाँ दे रहे थे।
इतना लिखना इसलिए जरूरी था क्योंकि आज 31 जनवरी को पूरे दिन अनुज पोद्दार जी सबको यह बताने में लगे हैं कि उन्हें मैंने किस तरह ब्लैकमेल किया। वे किसी नये संपादक या समूह संपादक की ताजपोशी की तैयारी में भी जुटे हुए हैं। एक फरवरी को उन्होंने सभी विभागाध्यक्षों की बैठक बुला रखी है। उन्हें दुख होगा यह देखकर कि मैं वहाँ नहीं हूं। मैं पद और पैसे के पीछे कभी नहीं भागा लेकिन अपने अधिकार छोड़ने की गलती भी कभी नहीं की। मैं कुछ मूल्यों के साथ पत्रकारिता में आया था और मेरी कोशिश रहेगी कि मैं उन्हें कभी न छोड़ूं। उन्हीं मूल्यों के लिए मैं जनसंदेश टाइम्स को छोड़ रहा हूं। आशा करता हूं कि मेरा बकाया, जनवरी माह का वेतन और अन्य, जिसके कागजात में लेखा विभाग को दे चुका हूं, उसका भुगतान मेरे खाते में इमानदारी से अनुज पोद्दार जी कर देंगे। मेरे इस फैसले में हरे प्रकाश भी मेरे साथ है, इसलिए उम्मीद करूंगा कि उसका हक भी उसके खाते में जमा कर दिया जाय। (इसके साथ मेरा अग्रलेख, लिये लुकाठा हाथ, मेरा अनुजजी को भेजा गया मेल भी संलग्न है ताकि मेरे मित्र, मेरे स्नेही और मुझे न चाहने वाले भी यह तय कर सकें कि सचाई क्या है। एक फरवरी के जनसंदेश टाइम्स में मैंने अपनी आखिरी बात भी लिख दी है। हो सकता है, वह प्रकाशित हो, हो सकता है, न प्रकाशित हो, इसलिए उसे भी संलग्न कर रहा हूं).
जनसंदेश टाइम्स के नये संपादक और समूह संपादक को मेरी शुभकामनाएँ। भगवान उन्हें स्वत्वत्याग, सहनशीलता और समर्पण की शक्ति दे ताकि वे अनुज जी से अच्छे रिश्ते रख सकें। मुझसे अब आप इस नंबर पर संपर्क कर सकेंगे- 08126597407
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