‘मुन्ना भाई’ एक बार फिर ‘अंदर’ हो गए और इस तरह काफी दिनों से लटकी मुन्ना भाई सीरीज की अगली फिल्म ‘मुन्ना भाई चले दिल्ली’ और लटक गई। इस खबर ने मुन्ना भाइयों की मदद से पास होने का ख्वाब पाले छात्र-छात्राओं को भी काफी दुखी किया। बोर्ड परीक्षा के बाद गर्मी की छुट्टियों में मुन्ना भाई उन्हें इंटरटेन करने वाले थे लेकिन किस्मत का फैसला कौन बदल सकता है। अब मुन्ना भाई कैदियों को इंटरटेन करेंगे। निर्देशक सुभाष कपूर ने तो बिल्कुल साफ कह दिया है कि संजू बाबा के बिना मुन्ना भाई फिल्म की कल्पना भी मुश्किल है।
वही ही नहीं, काटजू, कांग्रेस सहित ‘देश के दर्शक’ आदि भी (बस बीजेपी को छोड़कर) मुन्ना भाई को जेल की सलाखों के पीछे नहीं, अपनी आंखों के आगे देखना चाहते हैं। खैर, सुभाष जी के लिए मेरे पास एक आइडिया है। यह मुन्ना भाई का विकल्प भी है और संजू से कम क्रेज भी नहीं है उसका। बस उन्हें करना ये है कि मुन्ना नाम की जगह ‘राजा’ कर दें और भाई की जगह ‘भैय्या’ कर दें। ‘माननीय’ फिलहाल वे हैं ही। मंत्रीपद से इस्तीफा दे चुके हैं, खाली हैं, दिमाग के घोड़े दौड़ा रहे हैं, बस सुभाष जी को उनकी लगाम थामनी है। आखिर कौन नहीं देखना चाहेगा इस माननीय की ‘पिक्चर’। उम्मीद है कि इन दिनों माननीय मना भी नहीं करेंगे। बजट-वजट का चक्कर भी नहीं रहेगा चाहे जितनी महंगी फिल्म बनाओ। सारा पैसा आम बजट से ही निकाल लिया जाएगा। फिल्म का वितरण भी हाथों-हाथ होगा (क्योंकि मना करने की हिम्मत किसी थियेटर-मल्टीप्लेक्स मालिकों के पास होगी नहीं) और टिकटें कितनी बिकेंगी, ये तो पूछो ही मत। (वरना उसका टिकट कट जाएगा)। अरे छोड़ो, टिकटें ब्लैक में न बिकीं तो कहना। अब रही स्क्रिप्ट की बात तो वह हमारे पास तैयार है। लो जी, वह भी सुन लो।
‘सब कुछ’ कर चुकने के बाद एक दिन अचानक मुन्ना भाई के मन में ये विचार आता है कि अब बहुत हो चुका, वे सचमुच का माननीय बनेंगे। एक शानदार होटल में दो-चार पैग मारकर कबाब तोड़ते हुए उन्होंने यह बात सर्किट को बताई। सर्किट का दिमाग सरपट दौड़ा- भाई, आप बस बोलो, सब काम हो जाएगा। माननीय माने और सर्किट शुरू। मुनादी हो गई- अब भैय्या दरबार नहीं लगाएंगे, बल्कि जनता दरबार लगाएगी। भैय्या जनता के दरबार में हाजिर होंगे और फैसला भैय्या नहीं जनता सुनाएगी। भैय्या सुनेंगे और वह करेंगे जो जनता कहेगी। अब भैय्या बदल गए और जनता की नजरों में ‘सचमुच के राजा’ बन बैठे। जनता ने अपने हितार्थ फैसले ले-लेकर पैसों का मोल कौड़ियों के भाव करवा दिया। खाझा और सब्जी आदि सब टके सेर हो गए। अब रंक दरबार लगाती थी और राजा को फैसला सुनाती थी। ऐसे ही एक फैसले ने राजा की जिंदगी बदल दी। क्षेत्र में एक प्रेमी की हत्या हो जाती है। दरबार सजता है। रंकों के पंच और राजा जी बैठे। प्रेमिका जार-जार रो-रो रही है- अब उसकी जिंदगी का क्या होगा? राजा जब रंकों का सुन सकते हैं तो प्रेमिका क्या चीज है? मांगो
प्रेमिका, वर मांगो। मुंहमागा वरदान मिले तो किसके मुंह में पानी नहीं आ जाएगा! प्रेमिका ने राजा को वर के रूप में मांग लिया। राजा मजबूर हैं, असली माननीय हैं, मना कर नहीं कर सकते, चिंतित हैं… भइया! अब पूरी कहानी यहीं सुन लोगे तो फिर पिक्चर क्या खाक देखोगे। सुभाष कपूर ने चाहा तो आगे क्या हुआ, यह सब मुन्ना भाई सीरीज की अगली फिल्म में देखिएगा।
लेखक रवि प्रकाश मौर्य तेजतर्रार पत्रकार हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स से जुड़े हुए हैं. यह व्यंग्य जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है.






