शंभूनाथ शुक्ल : मुलायम चचा को सलाह! माफ कीजिएगा, अपने सूबे के चहेते मुलायम चचा को एक सलाह दे रहा हूं… समाजवादी पार्टी और मीडिया में तीन और छह का आंकड़ा है। कुछ लोग इसे जातीय द्वेष बताते हैं तो कुछ की नजर में यह मुलायम सिंह के हिंदी भाषा और देसी तथा गांव के लोगों के प्रति असीम प्रेम के कारण उपजा शहरी रोष है। कुछ-कुछ दोनों बातें सही हो सकती हैं।
पर चचा मुलायम यह बताएं कि पत्रकारों को अपने विवेकाधीन कोष के जरिए खरीदने का पत्ता भी उन्होंने ही फेंका था। वे अपने उन चहेते पत्रकारों से पूछें कि भैया तुम लोग बदल क्यों गए? सपा-बसपा सरकार के वक्त उन्होंने स्वयं यह दांव चला था। पर बसपा ने मीडिया को न तो भाव दिया और न ही उसे दुत्कारा। लेकिन बसपा ने कभी भी सैफई जैसे आयोजन भी नहीं किए। पत्रकारों का जातीय द्वेष वहां तो नहीं दीखता। जबकि मुलायम चचा के जातीय भाई बंधु अब पत्रकारिता में खूब हैं और वे भी उन्हें नहीं बख्श रहे।
मायावती भी हिंदी प्रेमी हैं तथा वंचित तबकों के भले और शहरी भद्र लोक को चिढ़ाने के लिए उन्होंने तमाम काम किए पर मायावती के खिलाफ इस मीडिया ने कोई अभियान नहीं चलाया। अगर मीडिया को मुलायम चचा नहीं समझ पाए तो मुंशी प्रेमचंद के गोदान में अखबार मालिक ओंकारनाथ और राय साहब के बीच के द्वंद को समझने की कोशिश करें।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.






