पिछले कुछ सालों में मीडिया इंडस्ट्री में हुई हलचल ने मीडिया के नए स्वरूप को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है. मीडिया की सरोकार-नैतिकता से इतर यह ट्रेंड मीडिया की ग्लैमर तथा बाहरी चकाचौंध देखकर आने वाले मीडियाकर्मियों के लिए भी यह खबर अच्छी नहीं है. आर्थिक उदारीकरण के दौर में सामाजिक तानेबाने जैसी कहानी ही मीडिया इंडस्ट्री में दोहराई जाती दिख रही है. समाज में जैसे अमीर-गरीब के बीच का फर्क और खाई बढ़ती जा रही है, कुछ उसी प्रकार मीडिया में भी बड़े घराने-छोटे घरानों के लिए बाजार नहीं छोड़ रहे हैं. यानी उनमुक्त आर्थिक समुंदर में बड़ी मछलियां बिना किसी हिचक के छोटी मछलियों को निगलती जा रही हैं. इसी का परिणाम है कि कई मीडिया समूह बंद होते जा रहे हैं या आर्थिक दुश्वारियों से जूझ रहे हैं. मीडियाकर्मियों के लिए अवसर घटते जा रहे हैं.
आर्थिक उदारीकरण के पहले दशक के अंत में मीडिया इंडस्ट्री का विस्तार काफी तेजी से शुरू हुआ. सन 2000 के बाद से इसमें लगातार उछाल आता चला गया. इस दौरान लगभग दो से तीन हजार करोड़ का मीडिया सेक्टर अब पन्द्रह हजार करोड़ से ज्यादा का हो चुका है. नई शताब्दी की शुरुआत से ही मीडिया का चेहरा और चरित्र भी बदला. बड़े शहरों में सेंट्रिक मीडिया छोटे शहरों तथा गांवों की ओर बढ़ चला. उदारीकरण ने सरोकार, नैतिकता और मान्यता जैसे शब्दों को व्यापार में ढाल दिया. अखबारों के विस्तार और न्यूज चैनलों के उदय का दौर शुरू हुआ. पहले जहां कुछ चुनिंदे और गिने चुने नाम थे वहीं इस दौर में नए-नए नाम और ब्रांड मीडिया सेक्टर में कदम रखने लगे.
मीडिया इंडस्ट्री का आकार बढ़ने के साथ इसमें आने वालों की संख्या भी बढ़ने लगी. पर गड़बड़ी यह हुई कि मालिकान अखबार या चैनल खोलने के से पहले इस इंडस्ट्री को मिशन या प्रोफेशन के रूप में मान्य नहीं किया. बीच की लकीर पकड़ ली गई. कर्मचारियों की सुविधाएं देने के नाम पर मिशन और खबरों के नाम पर प्रोफेशन का रूख अपनाया गया, पर मिशन और प्रोफेशन के बीच अखबार या चैनल लांच करने का बड़ा कारण बना पॉवर गेम. मिशन-फोफेशन और पॉवर गेम की खिचड़ी ने शुरू से ही इनको डाइलेमा की स्थिति पैदा कर दिया. फिर भी मीडिया इंडस्ट्री की हनक और धमक को देखते हुए ही दूसरे सही-गलत धंधों में लगे लोग इसे एक मजबूत शेल्टर के रूप में लिया. लिहाजा प्रॉपर्टी, चिटफंड का काम करने वाले तथा दो नम्बर से पैसा जुटाने वाले राजनेता इस में हाथ आजमाने उतर गए.
कुछ करोड़ लगाकर आए दिन चैनल खुलने लगे और अखबार लांच होने लगा. और इसके साथ शुरू हो गया पत्रकारों का शोषण और उनके खून चूसने का खेल. एसवन, एमएचवन, आजाद न्यूज, वीओआई, वीओएन, हमार टीवी, फोकस टीवी, एचवाई टीवी, एनईटीवी, सीवीबी न्यूज, हरियाणा न्यूज, नेटवर्क10, आर्यन टीवी, कशिश न्यूज, 365 दिन, इंडिया न्यूज, एचबीसी न्यूज, पीपुल्स समाचार, आर्यन टीवी, देश लाइव, आज समाज, महुआ टीवी, कल्पतरु एक्सप्रेस, बीपीएन टाइम्स, सीएनईबी, जीएनएन, लाइव इंडिया जैसे तमाम चैनल और अखबार या तो प्रॉपर्टी की काम करने वाले लोगों की हैं या तो चिटफंड कंपनियों की या फिर किसी राजनेता की. ज्यादातर मालिकों ने इन चैनलों तथा अखबारों को तिहरा लाभ वसूलने के लिए लांच किया. पहला कि इससे वे लाभ कमाएंगे, दूसरा यह उनके दूसरे कामों में शासन-प्रशासन से शेल्टर का काम करेगा और तीसरा कि उनका काला धन सफेद भी हो जाएगा.
परन्तु मीडिया मार्केट की आधी अधूरी जानकारी एवं खुले बाजार ने इन कंपनियों को गच्चा दे दिया. खर्च ज्यादा और आमदनी कम होने की वहज से ये तमाम चैनल और अखबार अपने शुरुआती दूसरे या तीसरे सालों में ही घाटे के चलते हांफने लगे. खबरों की बजाय चैनलों पर नौटंकी और अखबारों में कुछ भी परोस देने की स्थिति ने छोटे समूहों को और चोट पहुंचाया. चैनलों में डिस्ट्रीब्यूशन और अखबारों में प्रिटिंग लागत लगातार बढ़ने और उसके सापेक्ष आमदनी कम होने के असंतुलन ने इनको हिलाकर रख दिया. उसपर से मीडिया मालिक होने के बाद भी उनके दूसरे कामों में कोई शेल्टर न मिल पाने की कसक ने मालिकों को और ठेस पहुंचाया. लिहाजा वे अपने इन सफेद हाथियों में और पूंजी झोंकने की बजाय अपने दूसरे धंधों में ही लगे रहने को प्राथमिकता देने लगे.
परिणाम यह हुआ कि ये जितनी तेजी से पनपे उतनी ही तेजी से रसातल में मिलते चले गए. इसमें अगर किसी का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ तो वो रहे मीडियाकर्मी, जिसमें पत्रकार और गैर पत्रकार दोनों कर्मी शामिल हैं. इसके बाद क्षति हुई पत्रकारिता की. सरोकार एवं समाज की तिलांजलि पहले ही दी जा चुकी थी, किसी भी तरह पैसा कमाने की भूख, चाह और मजबूरी ने पत्रकारिता को ब्लैकमेल के आवरण में ढालना शुरू कर दिया, लिहाजा इस दौरान तमाम इफ-बट के बीच नैतिकता का स्तर भी काफी नीचे चला गया. अब जिस तरीके से तमाम चैनल और अखबार आर्थिक दुश्वारियों से जूझ रहे हैं या बंद होने के कगार पर हैं, उससे स्पष्ट लग रहा है कि मीडियाकर्मियों की बहुत बड़ी फौज बेरोजगारी के कगार पर खड़ी है. वैसे भी इन चैनलों और अखबारों में पत्रकार अल्प बेरोजगारी का ही सामना कर रहे हैं. उन्हें समय से सैलरी नहीं मिल रही, क्षमता के हिसाब से पैसे नहीं मिल रहे.
पर जो सबसे बुरी खबर है वह ये है कि अब इस इंडस्ट्री में बड़े घरानों के आने के बाद से छोटे समूहों के लिए राह और भी पथरीली हो गई है. पिछले कुछ महीने में मीडिया इंडस्ट्री में कई बड़े सौदे हुए हैं, जिसने छोटे समूहों के हिस्से की ऑक्सीजन भी खींच ली है और वो मरने की कगार पर पहुंच गए हैं. सबसे बड़े टीवी समूह में शुमार ईटीवी ग्रुप को मुकेश अंबानी की कंपनी ने नेटवर्क18 के साथ मिलकर खरीद लिया. देश के सबसे अमीर मुकेश अंबानी ईटीवी के साथ नेटवर्क18 के चैनलों में भी हिस्सेदार हो गए हैं. कुछ और मीडिया समूहों में उनके निवेश की चर्चाएं आम हैं. टीवी टुडे ग्रुप में बिड़ला समूह के भी बड़ी रकम निवेश करने की तैयारी है. टीवी टुडे में अनिल अंबानी के निवेश की खबरें पहले से ही आती रही हैं. सबसे सुरक्षित माने जाने वाले टीवी टुडे समूह से भी बड़े पैमाने पर छंटनी की खबरें आने लगी हैं.
इसके अलावा प्रिंट मीडिया में नईदुनिया के बिकने की कहानी ज्यादा पुरानी नहीं हुई है. इस अखबार के दिल्ली-एनसीआर एडिटन के बंद होने से तमाम पत्रकार बेरोजगार हुए. बड़ा समूह का रूप अख्तियार कर चुके जागरण ने इस अखबार को बड़ी रकम देकर खरीद लिया. मध्य प्रदेश से ही खबर है कि दैनिक पीपुल्स समाचार भी बंद होने या बिकने के कगार पर खड़ा है. कर्मचारियों को समय से वेतन नहीं मिल रहा है. प्रबंधन ने अखबार में पैसा लगाना बंद कर दिया है. सीएम से पंगा लेने वाले अखबार राज एक्सप्रेस समूह को भी सरकार ने बड़ा झटका दिया. इस अखबार को चलाने वाली मूल कंपनी के कई भवनों को धराशायी करवा दिया. चिटफंड कंपनी द्वारा संचालित बीपीएन टाइम्स के भी कई कार्यालयों पर ताला लग गए. तमाम लोग बेरोजगार हुए. यूपी से लांच हुए जनसंदेश टाइम्स की स्थिति भी डगमगाती दिख रही है.
अगर चैनलों की बात करें तो सीएनईबी ने भी अपना आकार घटा कर खर्च कम कर दिया है. अब यह चैनल न्यूज से बदलकर इंटरटेनमेंट चैनल होने की राह पर चल निकला है. तमाम कर्मचारी बेरोजगार होने के मुहाने पर खड़े हैं. एसवन जैसे चैनल रहने या न रहने का कोई मतलब नहीं है. आजाद न्यूज भी किसी तरह घिसट कर चल रहा है. हमार टीवी, फोकस टीवी और एचवाई चैनल को संचालित करने वाली मतंग सिंह की कंपनी भी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई है. पूंजी के अभाव के चलते चैनल ब्लैक आउट चल रहा है. बैंक का करोड़ों का कर्ज अलग है. कर्मचारी यहां भी बेरोजगारी के कगार पर खड़े हैं. सैलरी देर से मिल रही है. जीएनएन न्यूज एवं महुआ के हालत भी ज्यादा जुदा नहीं है. महुआ पर भी बैंक का बड़ा कर्ज है. पटना से संचालित आर्यन समूह भी घाटे में चल रहा है. खर्च कटौती के नाम पर पत्रकार छंटनी के शिकार हो रहे हैं.
देहरादून में कुछ समय पहले ही लांच हुआ नेटवर्क10 दुश्वारियों से जूझ रहा है. चैनल के बिकने की खबरें भी आ रही हैं. इंडिया न्यूज एवं आज समाज प्रबंधन भी अपने कर्मचारियों को समय से पैसा नहीं दे पा रहा है. लाइव इंडिया का भविष्य भी तय नहीं है. सीवीबी न्यूज की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है. देश लाइव में कर्मचारी सैलरी के लिए परेशान हैं. अगर चार-पांच बड़े चैनलों को छोड़ दें, जिनमें घोषित-अघोषित रूप से बड़ी कंपनियों के पैसे लगे हैं तो बाकी के सभी चैनलों तथा उनमें काम करने वालों की स्थिति एक जैसी है. अपने काम को शेल्टर के नाम पर चैनल लांच करने वाले खिलाड़ी अब इस फील्ड से तेजी से पलायन करने की कोशिशों में
जुटे हुए हैं. इसके लिए वे चैनल किसी बड़े समूह को बेच देंगे या फिर टाइअप करके अपने संस्थानों का आकार छोटा करके नेपथ्य में चले जाएंगे. धीरे-धीरे इसकी शुरुआत हो भी चुकी है. यानी मीडियाकर्मियों के लिए यह खबर कहीं से ठीक नहीं है. जितनी तेजी से मीडिया प्रोफेशनल्स की संख्या बढ़ती जा रही है अवसरों की उतनी ही ज्यादा कमी होती दिखने लगी है.
भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की रिपोर्ट.





