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सुख-दुख...

मूरख मिले बलेस्सर पढ़ा लिखा गद्दार ना मिले

: 9 जनवरी को पहली पुण्य तिथि पर : बालेश्वर के बिना यह एक साल बड़ी चुभन के साथ बीता है। दोस्ती तो याद आती ही है। हर सुबह, हर शाम याद आती है। पर इस साल इतनी सारी नई घटनाएं हुईं और हर बार बालेश्वर याद आए। वह चाहे राजा, कलमाडी, कनिमोझी या येदुरप्पा आदि का जेल जाना हो, मंहगाई, भ्रष्टाचार, लोकपाल या अन्ना का मुद्दा हो, या उत्तर प्रदेश में धकाधक बीस मंत्रियों की बर्खास्तगी या इस्तीफ़ा हो। या तमाम और मसले। हर बार बालेश्वर याद आए। इस लिए याद आए कि अगर वह होते तो इन मसलों पर उन के एकाधिक गीत आ गए होते।

: 9 जनवरी को पहली पुण्य तिथि पर : बालेश्वर के बिना यह एक साल बड़ी चुभन के साथ बीता है। दोस्ती तो याद आती ही है। हर सुबह, हर शाम याद आती है। पर इस साल इतनी सारी नई घटनाएं हुईं और हर बार बालेश्वर याद आए। वह चाहे राजा, कलमाडी, कनिमोझी या येदुरप्पा आदि का जेल जाना हो, मंहगाई, भ्रष्टाचार, लोकपाल या अन्ना का मुद्दा हो, या उत्तर प्रदेश में धकाधक बीस मंत्रियों की बर्खास्तगी या इस्तीफ़ा हो। या तमाम और मसले। हर बार बालेश्वर याद आए। इस लिए याद आए कि अगर वह होते तो इन मसलों पर उन के एकाधिक गीत आ गए होते।

व्यवस्था विरोध और बदलाव के जो गाने बालेश्वर ललकार कर गाते थे वह गाने गाना वाला अब कोई नहीं है। ठकुरसुहाती गानों और गोंइयां, सइयां से आगे भोजपुरी गायकी को अगर भिखारी ठाकुर के बाद कोई ले गया तो वह बालेश्वर ही थे। वह तो गाते थे कि दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार ना मिले और जैसे विसंगति को रेखांकित करते थे, मूरख मिले बलेस्सर, पढ़ा लिखा गद्दार न मिले। अब देखिए न ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग ही देश और समाज के साथ गद्दारी करते मिल रहे हैं। पता चला आक्सफ़ोर्ड के पढ़े हैं और करोड़ों-अरबों के भ्रष्टाचार में डूब-उतरा रहे हैं।

बालेश्वर का एक गाना है नाचे न नचावे केहू पइसा नचावे ला। जब यह गाना लिखा था बालेश्वर ने तब नरसिंहा राव प्रधान मंत्री थे। सुखराम का घोटाला सामने आया था और चंद्रास्वामी की राजनीति में गरमाहट थी और घोटालों में भी। तो बालेश्वर गाते थे नाचे न नचावे केहू पइसा नचावे ला और फिर जोड़ते थे कि हमरी न मानो सुखराम जी से पूछ लो! फिर वह चंद्रास्वामी और नरसिंहा राव तक आते थे। बालेश्वर की गायकी दरअसल व्यवस्था के गुब्बारे में पिन चुभोती थी। वह चाहे राजनीतिक व्यवस्था हो चाहे सामाजिक कुरीति। वह हर जगह चोट करते मिलते थे। यह व्यवस्था पर चोट अब भोजपुरी गायकी से नदारद है। इसी लिए बालेश्वर की याद आती है। बालेश्वर का एक गाना है मोर पिया एम पी, एम एल्ले से बड़का, दिल्ली लखनऊआ में वोही क डंका, और जब वह इस में ललकार कर जोडते थे कि अरे वोट में बदलि देला वोटर क बक्सा! मोर पिया एम पी, एम एल्ले से बड़का! तो चुनावी दलालों का चेहरा बरबस सामने आ जाता था। बाबू क मुंह जैसे फ़ैज़ाबादी बंडा, दहेज में मांगेलैं हीरो होंडा या फिर बिकाई ए बाबू बीए पास घोड़ा जैसे गीत भी बालेश्वर के यहां बहुतायत में हैं।

बालेश्वर असल में भोजपुरी गायकी में कबीर की सी साफगोई और बांकपन के लिए ही जाने भी जाते थे। सो वह गाते भी थे, बिगड़ल काम बनि जाई, जोगाड़ चाही! एक समय मंडल कमंडल पर भी वह खूब गाते थे। फ़िरकापरस्ती वाली बस्ती बसाई न जाएगी गाते थे और बताते थे कि हिटलरशाही मिले पर मिली जुली सरकार ना मिले। दलबदलुओं पर तंज करते हुए एक समय वह गाते थे चार गो भतार ले के लड़े सतभतरी! मंहगाई को ले कर उन का एक तंज देखिए। चंद्रलोक का टिकट कटा है, आगे और लडाई है, सोनरा दुकनिया भीड़ लगी है को कहता मंहगाई है। वह तो गाते थे जब से लइकी लोग साइकिल चलावे लगलीं तब से लइकन क रफ्तार कम हो गइल। या फिर समधिनिया क पेट जैसे इंडिया क गेट जैसे गानों मे उन की गायकी की गमक देखते बनती है। नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर कै जैसे गानों ने तो उन्हें शिखर पर बिठा दिया था।

बालेश्वर असल में गरीब गुरबों के गायक हैं। खुद भी गरीब थे। दबे कुचलों के समाज से आते थे सो उन का दुख सुख भी करीब से जानते थे। सो उन का दुख सुख गाते भी थे। लोहवा के मुनरी पर एतना गुमान, सोनवा क पइबू त का करबू! गीत में गरीबी का जो दंश और डाह का जो डंक वह परोसते हैं वह अविरल है। या फिर हम कोइलरी चलि जाइब ए ललमुनिया क माई गीत में बेरोजगारी और प्रेम का जो कंट्रास्ट वह परोसते हैं वह अदभुत है। अदभुत है उन का यह गीत भी कि तोहरा बलम कप्तान सखी त हमरो किसान बा। गंवई औरत का जो गुरुर और स्वाभिमान इस गीत में छलक कर सामने आता है वह विरल है। बलिया बीचे बलमा हेराइल जैसे विरह गीत भी उन के खाते में दर्ज है। आव चलीं ददरी क मेला। या अपने त भइल पुजारी ए राजा हमार कजरा के निहारी ए राजा या फिर कजरवा हे धनिया जैसे गीतों की बहार भी है। केकरे गले में डालूं हार सिया बउरहिया बनि के जैसे मार्मिक गीत भी बालेश्वर के यहां उपस्थित हैं।

लेखक दयानंद पांडेय के साथ बालेश्‍वर

बालेश्वर के यहां प्रेम है तो प्रेम के बहाने अश्लीलता भी भरपूर है। खिलल कली स तू खेलल त हई लटकल अनरवा का होई। या फिर काहें जलेबी के तरसेली गोरकी, बडा मज़ा रसगुल्ला में। या फिर लागता ज फाटि जाई जवानी में झुल्ला, आलू केला खइलीं त एतना मोटइलीं दिनवा में खा लेहलीं दू दू रसगुल्ला। या फिर अंखिया बता रही है, लूटी कहीं गई है। जैसे गीतों की भी उन के यहां कमी नहीं है। वह मानते थे कि द्विअर्थी या अश्लील गाने गाना गलत हैं पर बाज़ार में बने रहने के लिए इसे एक तरकीब और ज़रुरी तत्व मानते थे। कहते थे कि जो यह सब नहीं गाऊंगा तो मार्केट से आऊट हो जाऊंगा। तो मुझ को पूछेगा कौन। भूखों मर जाऊंगा।

चाहे जो हो बालेश्वर की गायकी भोजपुरी गायकी की अब धरोहर है। अब अलग बात है कि उन के निधन के बाद एक से एक लुभावने वायदे हुए। बड़े से बड़े नेता आए। और चले गए तमाम वायदे कर के। पर साल भर बीत जाने के बाद भी भोजपुरी के इस अमर गायक के नाम से कोई एक पार्क, सड़क, मूर्ति या स्मारक नहीं बन सका। और भोजपुरी की ठेकेदारी करने वालों को भोजपुरी को रोज-ब-रोज बेचने वालों को, भोजपुरी की दुकान चलाने और भोजपुरी की राजनीति करने वालों को कभी इस की चिंता भी नहीं हुई। और उस बालेश्वर के लिए नहीं हुई जिस ने अवध की धरती लखनऊ में भोजपुरी का झंडा गाड दिया। और लखनऊ में ही नहीं वरन पूरी दुनिया में भोजपुरी गायकी का परचम लहराया। भोजपुरी गायकी को स्टारडम से नवाज़ा। भोजपुरी गायकी के वह पहले स्टार थे। साल भर में ही लोग उसे भूल जाएं तो यह क्या है? भोजपुरी भाषियों की यह कृतघ्नता ही है कुछ और नहीं। तो क्या कीजिएगा वह लिख भी तो गए हैं कि जे केहू से नाईं हारल ते हारि गइल अपने से!

जो भी हो लोग उन्हें लाख भूल जाएं पर भोजपुरी गायकी जब तक रहेगी बालेश्वर अमर रहेंगे। बहुत सारे कलाकार उन के गाए गीत पहले ही से गाते रहे हैं। संतोष की बात है कि उन के मझले बेटे अवधेश ने उन की गायकी की विरासत को न सिर्फ़ संभाल लिया है बल्कि उन के संगी साथियों, साजिंदों, कलाकारों की पूरी टीम, प्रशंसकों, उन के कार्यक्रमों को भी सहेज लिया है। उन की गायकी, उन का मंच, उन का कार्यक्रम सब कुछ। अवधेश को मंच पर गाते देख कर युवा बालेश्वर की याद मन में ताजी हो जाती है। और फिर बालेश्वर की याद आ जाती है। उन की गायकी की याद आ जाती है। फगुनवा में रंग रसे रसे बरसे उनकी गायकी का एक ऐसा बिरवा है, ऐसा होली गीत है जिस में रंग भी है, रस भी और रास भी। होली की ठुनक भी है और उस की मुरकी और खुनकी भी। उन की आवाज़ के मिठास की मिसरी मन में आज भी फूटती है। औरी महिनवा में बरसे न बरसे, फगुनवा में रंग रसे रसे बरसे, सास घरे बरसे, ससुर घरे बरसे अरे उहो भींजि गइलीं, जे निकले न घर से! फगुनवा में रंग रसे रसे बरसे। उन की यह गायकी अभी भी मन को पुकारती है। रई रई रई रई कर के मन बांध लेती है। वह मरदानी और मीठी आवाज़ जिस में समाई भोजपुरी माटी की खुशबू पागल बना देती है। तो उन के बिरहा के ठेके में ही कहने को मन करता है जिया बलेस्सर, जिया!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. उनका यह लेख राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

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