घर लौटा युवराज, कैंसर बाउंड्री पार!- जैसी शीर्षकों से आज का मीडिया अटा पड़ा है। खुशी की बात है। हो भी क्यों नहीं एक व्यक्ति स्वस्थ होकर आया है। फिर खेलेगा भारत की और से। मीडिया ने पलक पांवड़े बिछा दिए। तब भी हल्ला मचाया था, जब उसकी बीमारी की खबर सामने आई थी। पलक पांवड़े बिछाकर आखिर क्या संदेश देना चाहती है मीडिया? कि कैंसर एक बड़ी ही गंभीर बीमारी है, या यह कि इसका इलाज अपने देश में बेहतर संभव नहीं? या फिर यह कि यह एक मामूली बीमारी है और इसका इलाज संभव है।
तो फिर मेरी पड़ोसन का क्या जो आज नहीं, आज से दस साल पहले अपने स्तन कैंसर का इलाज करवा कर स्वस्थ हो चुकी है और आज अपने पति- बच्चों के संग सानंद जिंदगी बिता रही है। वो भी किसी अमेरिका नहीं, बल्कि भारत में ही इलाज से यह संभव हुआ हो चुका है। और फिर मेरे आफिस के चपरासी के बच्चे का क्या जो आज भी रक्त कैंसर से जूझ रहा है और अमेरिका और मुंबई तो छोड़ो पटना में भी इलाज करवाने में असमर्थ है। आज भी हमारे आस-पास मेरी पड़ोसन और इस बच्चे जैसे हजारों लोग हैं। देश में आज भी लोग कैंसर से उतना ही खौफ खाते है, कितने ही मौत के शिकार होते है और ढेरों उचित इलाज होने पर स्वस्थ भी होते है। आखिर मीडिया हमेशा से सिर्फ और सिर्फ किसी सेलेब्रेटी को भुनाने का ही काम तो करती रहती है। यहां भी बात बस वहीं आकर रुक जाती है कि मीडिया किसी जग्गू, जगिया, फेंकनी, बुधनी का नहीं, बल्कि ऐश्वर्या, युवराज का ही है।
लेखिक लीना मीडियामोरचा की संपादक हैं.





