Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

मेरे और संजय में कई समानताएं, हम दोनों के नाम के आगे ‘किशोर’ है

Amarendra Kishore : गाँव में बड़े बुजुर्गों के मुह से सुना करता था कि 'किस्मत स्वयं कुछ नहीं देता, उसे भी पुरुषार्थ की जरुरत पड़ती है' और यही बात संस्कृत के अपने गुरूजी पंडित रामलखन मिश्र जी कहा करते थे। चाणक्य ने भी लिखा है कि 'भाग्य पुरुषार्थ का अनुसरण करती है'। सच कहिये तो इन तमाम बातों को साबित किया है संस्थान के संगी संजय किशोर ने। संजय हिन्दी पत्रकारिता का विद्यार्थी नहीं था बल्कि वह तो विज्ञापन के संसार में अपना वजूद तलाशने के मकसद से भारतीय जन संचार संस्थान आया। उसके जीवन का उद्देश्य ही था चलते रहो, चलते रहो. और आज संजय एनडी टीवी में चीफ कोरेस्पोंडेंट है. संजय मेरी बधाई कबूल कीजिये!

Amarendra Kishore : गाँव में बड़े बुजुर्गों के मुह से सुना करता था कि 'किस्मत स्वयं कुछ नहीं देता, उसे भी पुरुषार्थ की जरुरत पड़ती है' और यही बात संस्कृत के अपने गुरूजी पंडित रामलखन मिश्र जी कहा करते थे। चाणक्य ने भी लिखा है कि 'भाग्य पुरुषार्थ का अनुसरण करती है'। सच कहिये तो इन तमाम बातों को साबित किया है संस्थान के संगी संजय किशोर ने। संजय हिन्दी पत्रकारिता का विद्यार्थी नहीं था बल्कि वह तो विज्ञापन के संसार में अपना वजूद तलाशने के मकसद से भारतीय जन संचार संस्थान आया। उसके जीवन का उद्देश्य ही था चलते रहो, चलते रहो. और आज संजय एनडी टीवी में चीफ कोरेस्पोंडेंट है. संजय मेरी बधाई कबूल कीजिये!

संजय किशोर दुनिया को अपनी बात बताना चाहता था। इसलिए अपनी सोच को शब्दों के पंख देना उसने मुनासिब समझा। इसके बाद तो 'धर्मयुग' जैसी पत्रिकाओं में उसके विचार छपने लगे। इसी पत्रिका में सर्वश्रेष्ट पत्र का खिताब लगातार आठ बार संजय किशोर को मिला। संस्थान में जब हम मिले (1994) तो हम एक दूसरे के नाम से अपरिचित नहीं थे। तब तक हम दोनों सन्डे मेल में लगातार छप चुके थे। इसके पहले संडे मेल द्वारा दिल्ली में आयोजित एक सेमीनार में संजय शिरकत कर चुके थे और अपने विचारों से संपादकों और राजनेताओं को परिचित करा चुके थे। पढाई पूरी की तो नौकरी भी मिल गयी भारत सरकार के एक उपक्रम में हिन्दी अधिकारी की। मगर किस्मत में तो और भी कुछ लिखा था। अच्छी खासी नौकरी छोड़कर संजय जनसंचार के मक्का कहे जानेवाले संस्थान आईआईएमसी मे जनसंचार और विज्ञापन पढने चले आये, जहां इन्हें विज्ञापन कोर्स की निदेशिका डॉक्टर जयश्री जेठवानी के साथ अन्य गुरुजनों ने जमकर मांजा और चमकाया।

हमारी अच्छी से आगे पक्की दोस्ती हो गयी। क्योंकि मेरे और संजय में कई समानताएं थीं– हम दोनों नाम के आगे 'किशोर' हैं। पटना की पैदाईश हैं। विद्यार्थी जीवन से लिखने की लत लग गयी और हम अंगरेजी साहित्य मे स्नातक हैं। सच कहिये तो हिन्दी पत्रकारिता और विज्ञापन पाठ्यक्रम के बीच का सूत्रधार था संजय किशोर। तब वह विज्ञापन पाठ्यक्रम की खिलखिलाती-चहकती सहेलियों का बेहद दुलारा और प्यारा था। लिहाजा, उसके जरिये विज्ञापन पाठ्यक्रम की सह्पाठिकाओं से दोस्ती गांठना आसन होता था। हम मित्रों की भावुकता को समय-समय पर संजय ने उकसान दिया।

संस्थान से निकलकर संजय ने जमकर संघर्ष किया। दर दर की ठोकरें खानी पडी। मगर संजय ने गहरी आस्तिकता के साथ संघर्ष किया। रह रहकर केंद्र सरकार की नौकरी छोड़ने का फैसला गलत लगने लगा। इसी बीच एनइपीसी चैनल में रोजगार मिला–कितने का,यह बताना यहाँ जरूरी नहीं। इसके बाद तो किस्मत ने जैसे करवट बदली– जीटीवी ने उसे १९९८ में काठमांडू भेजा SAF-एसएएफ गेम्स के कवरेज केलिए और साल २००० में संजय अपने चैनल के स्पोर्ट्स डेस्क का सर्वे-सर्वा बन गया। जीटीवी द्वारा सिडनी ओलंपिक्स के तमाम कवरेज को उसने अपने सपनो का रंग दिया। कार्यक्रम की जमकर सराहना हुई और पहली बार यह कार्यक्रम फायदे का सौदा रहा। मुझे जहां तक याद है वर्ष २००२ में कोलम्बो में आयोजित आईसीसी मिनी विश्व कप का कवरेज करते हुए संजय ने सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, शोअब अख्तर, शाहिद अफरीदी, मुदस्सर नज़र और विवियन रिचर्ड्स जैसे क्रिकेट के महारथियों का इंटरव्यू कर अपने चैनल का मान बढाया। मुझे यह लिखते हुए फख्र हो रहा है कि संजय किशोर ने 2003 के विश्व कप में शेन वारने के विवाद और तेंदुलकर के ऐतिहासिक छक्के का मिनट दर मिनट कवरेज किया था। वहाँ से लौटते वक़्त विमान में ही राजदीप सरदेसाई ने संजय को एनडीटीवी में रोजगार का न्योता दिया। संजय बताते हैं कि तब वह रोज ३ स्टोरी करता था और यह सिलसिला लगातार ६० दिनों तक चला। उन दिनों पाकिस्तानी टीम में एक मात्र हिन्दू दानिश कानेरिया था, जिसके जरिये संजय ने पकिस्तान में हिदुओं के जीवन को प्रस्तुत करने की सफल और सराहनीय कोशिश की। संजय आज भी स्पोर्ट्स रिपोर्टिंग को अलग तरीके से पेश करने की कोशिश करते हैं

आज भी संजय में वही सहजता है. कोमलता है. शालीनता है. मतलब जैसा वह १८ साल पहले था– जबरदस्त अदब है संजय में। टीवी पत्रकारिता में रहकर भी संजय पठनशील हैं–यह खास बात है। उसे नाम की भूख नहीं, बस काम का जूनून है। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे पत्रकार बनना है–उसके सपनों में विज्ञापन की रुपहली दुनिया थी। मगर उसने समय को स्वीकार किया, समय के सत्य को स्वीकार और आगे चल पड़ा– चरैवति, चरैवति — चलता हुआ व्यक्ति जीवन के माधुर्य को पाता है। यह बात संजय को पता है।

अमरेंद्र किशोर के फेसबुक वॉल से.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...