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”मेरे पास जेल जाने का दूसरा कोई विकल्‍प नहीं था”

यशवंत जी, कुछ लोग वैचारिक मतभेद को दुश्मनी और नफ़रत का रूप देते समय इतने गुस्से में होते हैं कि उनको सामनेवाले को नष्ट करने के लिए झूठ की कोई भी सीमा लांघना मंज़ूर होता है. दिमाग से अंधे लोग कहानियाँ गढ़ लेते हैं और किसी को बदनाम कर देते हैं. मुझे अफसोस है कि ऐसे ही किसी ने भड़ास फॉर मिडिया के माध्‍यम से मुझे खलनायक बना दिया है. पर सच कुछ और है मित्र..

यशवंत जी, कुछ लोग वैचारिक मतभेद को दुश्मनी और नफ़रत का रूप देते समय इतने गुस्से में होते हैं कि उनको सामनेवाले को नष्ट करने के लिए झूठ की कोई भी सीमा लांघना मंज़ूर होता है. दिमाग से अंधे लोग कहानियाँ गढ़ लेते हैं और किसी को बदनाम कर देते हैं. मुझे अफसोस है कि ऐसे ही किसी ने भड़ास फॉर मिडिया के माध्‍यम से मुझे खलनायक बना दिया है. पर सच कुछ और है मित्र..

आप देख लीजिये मुंबई में पत्रकारिता के नाम पर कुछ लोग क्या कर रहे हैं? अभी मैं पहचान छिपा कर मसला आपके सामने रख रहा हूँ – एक महिला पत्रकार को पता होता है कास्टिंग काउच का मगर वो क्या भूमिका निभाती है इस मेल से समझा जा सकता है -: (यह जानकारी संबंधितों को दी जा चुकी है)

I am too busy loving some beautiful women around me nd I don't have any spare love to give to … ( Film maker)

I know you like only foreigners now. All firangs you like. (Female Journalist answers)

मेरा जेल जाना भी आवश्यक था क्यूंकि आशाराम बापू जैसे संत जेल में रह रहे बच्चों और किशोरों के लिए कुछ योजनायें चला रहे हैं… देश में ३ करोड़ साधु-संत हैं और देश की जेलों में लगभग ४५ लाख बच्चे और किशोर बंद हैं… उनको बचाया जाना ज़रूरी है और किस तरह उनको साधू-संतों की सहायता से मुख्य धारा में लाया जा सकता है, क्या योजना होनी चाहिए – ये सब समझाना-जानना मेरे लिए ज़रूरी है. मेरी जेल यात्रा सुविचारित थी, जिस तरह भेजा गया वो रास्ता अवश्य उचित नहीं था… पर मेरे पास विकल्प भी नहीं था.

आपने छपा है – ''राजेश झा जैसा व्‍यक्ति समाज में कलंक जैसा है, जिसके चलते चलते संभ्रांत महिलाओं का जीना मुश्किल हो जाता है. जिस तरह की मानसिक प्रताड़ना इसने महिला पत्रकार को दी है, अगर कोई उनकी जगह कोई दूसरा होता तो आत्‍महत्‍या कर चुका होता.'' यशवंत जी, महाराष्ट्र-बिहार-उडीसा के आदिवासियों को असम भेज कर बांस के सामग्रियों को बनाने का तरीका सीखने और उनको बेच कर जीवकोपार्जन करने के लिए मैं वित्तीय सहायता देता हूँ… हर साल ५-६ लोग छह महीनों की ट्रेनिंग के लिए जाते हैं. भगवान की  कृपा से २७ बच्चियों के रहने-खाने-पढ़ने में मैंने कुछ योगदान किया है. पिछले १०-१२ सालों में मैं देवघर महोत्सव और मंदार हिल महोत्सव के द्वारा अपने जन्म स्थल के लोक कलाकारों को देश-विदेश से जोड़ने की योजना चला रहा हूँ… मुझे गर्व है कि मैं संत-गृहस्थ का जीवन जीता हूँ… आत्मप्रशंसा की बात नहीं आप आ के मेरी जीवन-शैली देख जाइएगा कभी… किसी सिरफिरी की बातों में यकीं से पहले किसी बड़े और रचनात्मक पत्रकार से मेरे बारे में जानकारी मंगा लेते… मैं आज भी मात्र २५०० रुपये में अपना गुज़ारा करता हूँ और शेष धन जरूरतमंदों की सहायता में व्यय करता हूँ या Folk Art – Craft के प्रिजर्वेशन और रिकार्डिंग में.

मैं ४४ वर्ष का हूँ और ५० वर्ष की आयु के बाद मेरा नेटवर्क इतना बड़ा हो चुका होगा कि १५०-२०० राजेश झा इस देश में निस्वार्थ काम कर रहे होंगे. मेरे १५ बच्चे-बच्चियां माध्यमिक स्तर की पढ़ाई कर रहे हैं वे मेरी आशा पूरी करेंगे… मैं उन सबका धर्म पिता हूँ लेकिन मैंने किसी का नाम और जाति परिवर्तन नहीं किया है… मेरा सपना लोखंडवाला में २-३ फ़्लैट और  कार तक सीमित नहीं है… और न ही ये इतना महत्वपूर्ण है कि मैं अपना व्यक्तित्व खो कर जीयूं …कुछ अति महत्वकांक्षी पत्रकार अपराधियों के लिए काम करते हैं… मैं कुछ ऐसे विषय पर काम कर रहा हूँ जो पत्रकारिता के नाम पर हर तरह की दलाली और गन्दगी से अपने घरवालों के नाम करोड़ों की संपत्ति बनाने और हर तरह के अपराध को बढ़ावा देने में लगे पत्रकारों को नंगा कर देगा, इसीलिए मुझे बदनाम किया जा रहा है. आपने भी बिना तथ्यों की पूरी पड़ताल किये उटपटांग बातें छाप दी हैं.

मैं सभी मुद्दों पर अभी खुल कर बात नहीं करूंगा क्यूंकि मामला न्यायालय के विचाराधीन है लेकिन आपसे जानना चाहूँगा कि – किस आधार पर आपने लिखा है कि मीरा रोड की महिलाओं ने मिल कर मुझे मारा था… यह घटना कब की है? किन महिलाओं ने मारा? कुबेर टाइम्‍स अखबार के आखिरी सिपाही मैं और श्री हरीश पाठक (जो अभी राष्ट्रीय सहारा पटना में सम्पादक हैं) थे… जिसने ये बात लिखी है दरअसल उनको ही ४-५ महीने पहले नौकरी से निकला गया था… आप पता कर लीजियेगा. हरीश जी स्थानीय सम्पादक थे कुबेर टाइम्‍स, मुंबई के… मैं मुख्य उपसंपादक था और बिजनेस-राजनीति तथा सिनेमा तीनों के अलावा हरीश जी विशेष रिपोर्टिंग भी मुझसे कराते थे.

आपने प्रकाशित किया है – ''यह आदमी इस कदर साइको है कि महिलाओं को छेड़खानी करने में इसको आनंद आता है… इसने एक वरिष्‍ठ पत्रकार पत्‍नी के साथ भी छेड़खानी की थी, जिसके बाद उन्‍होंने संजय निरुपम से कहकर इस आदमी को सबक सिखवाया था. छह-आठ महीने ठीक रहने के बाद फिर से यह लड़कियों और महिलाओं को परेशान करने लगा….'' किस वरिष्ठ पत्रकार की पत्नी के साथ मैंने छेड़खानी की है साहब, जरा नाम तो बताइये?

श्री संजय निरुपम जी से मिले मुझे 10 साल से अधिक समय हो गया है, हम एक दूसरे का आदर करते हैं… उन्होंने मुझे कब क्या सबक सिखाया बताइयेगा ज़रा?… मैं गैर राजनीतिक सोच का हूँ इसलिए उन सबसे मिलने की वजह नहीं है… मैं श्री कुमार प्रशांत – श्री निलय उपाध्याय – प्रो हूब्नाथ और १४ राष्ट्रीय सम्‍मान प्राप्त बीर साहब जैसे लोगों के सांगत का आदमी हूँ…. कहाँ झूठे प्रेम कथाओं – बिखरावों की कहानी लिखनेवाली फिल्म पत्रकारों की बात में आप जैसा आदमी बहक जाता है…  इन गिरे हुए लोगों को भड़ास क्यूँ महत्त्व दे रहा है?

आपने छापा है – ''इस पर आरोप है कि यह राइटर-डाइरेक्‍टर बनकर काम दिलाने के नाम पर लड़कियों को फांसता था.'' कहाँ, क्या आरोप है? किसने लगाया? मैं उन लोगों पे आत्मकथात्मक वृतचित्र बनाता हूँ जिन पे कोई नहीं बनाता.. जैसे – बिहार की ८५ वर्षीय लोक गायिका पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी, बिहार का एक कुम्हाकार जिसे राष्ट्रपति कलाम शिल्प -गुरु से सन्मानित करते हैं… अमेरिका से लौट आये अभय बंग-रानी बंग जो एक रुपये में आज भी इलाज करते हैं.. सुदूर महाराष्ट्र के आदिवासियों के बीच रहते हैं… मेरी फिल्म में अभिनय करने जैसा कुछ होता ही नहीं तो कौन लड़की एक्ट्रेस बनाने के लिए मेरे पास आयेगी और सोयेगी? आशा है आपका उत्तर मिलेगा, आप मेरे इस पत्र को भी जगह देंगे/ प्रकाशित करेंगे और मेरे खिलाफ जो ४ कहानियां छापी गयी हैं उनको भी पोस्ट से हटा देंगे.

सादर

राजेश झा

पत्रकार एवं डोक्युमेंट्री फिल्म निर्माता

मुंबई

[email protected]


इस बारे में जानकारी के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक करें – महिला पत्रकार से छेड़खानी

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