मुझे एक क्षीण-सी आशा थी कि केदारजी इस मसले (वर्धा की बेहूदा और खरदिमाग ढंग से संपादित-प्रकाशित कल्पनाशून्य पत्रिकाएं पढ़ते ही क्यों हैं?) को लेकर अपनी ओर से कुछ न कुछ कहेंगे और वह सही सिद्ध हुई. वे इन्टरनेट और ब्लॉग-विश्व से अनभिज्ञ हैं और ई-मेल आदि भी नहीं करते, किन्तु इस प्रकरण को लेकर उनके कुछ शुभचिंतकों ने उन्हें सूचना दी और उन्होंने तत्काल आज सुबह मुझे फोन किया.
उन्होंने मुझसे एक भावनापूर्ण बातचीत में अधिकृत किया है कि मैं नेट के ज़रिये उनकी तरफ से सभी हिंदी लेखकों और निराला-प्रेमियों को सूचित कर दूं कि उन्होंने अलाहाबाद के अपने भाषण में निराला की 'तुलसीदास',' राम की शक्ति-पूजा' और 'महाराज शिवाजी का पत्र' सरीखी कविताओं को लेकर मेरी दृढ आपत्ति का उल्लेख अवश्य किया था किन्तु यह क़तई नहीं कहा था कि विष्णु खरे के लिए निराला "अपाठ्य" हैं.
केदारजी का कहना है कि उनके उस वक्तव्य को असावधान और ग़ैर-जिम्मेदाराना ढंग से प्रकाशित-अनूदित कर दिया गया है. इस प्रकरण पर गहरा दुःख प्रकट करते हुए उन्होंने मुझसे तथा अन्य सैकड़ों निराला-प्रेमियों से इस भ्रान्ति के लिए मार्मिक शब्दों में हार्दिक खेद व्यक्त किया है.केदारजी ने यह भी कहा है कि वे उपयुक्त सार्वजनिक अवसर और मंच पर भी इस ग़लतबयानी का खंडन और निराकरण करेंगे.
हमारे वरिष्ठ और प्रिय कवि केदारनाथ सिंह के इस स्पष्टीकरण और खेद-प्रकाश के बाद, जो उनके अनुमोदन के लिए उन्हें पढ़ कर सुना दिया गया था, मुझे उम्मीद है कि इस प्रसंग पर आगे कोई विवाद नहीं होगा. फिर भी इसे सत्यापित करने के लिए कोई चाहे तो उनसे उनके टेलीफोन पर संपर्क कर सकता है, किन्तु ध्यान रहे कि केदारजी की मां कलकत्ता में गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं.
जाने-माने साहित्यकार और पत्रकार विष्णु खरे की तरफ से भड़ास4मीडिया को भेजा गया पत्र.






