लेखन के पहले दौर में ही मुझे काफिर बना दिया गया था। एक लेख सरिता में लिखा था और एक पांचजन्य में लिखा था। कानपुर में इन दोनो लेखों पर बवाल हो गया। प्रदर्शन भी हुआ और अखबारों की प्रतियां भी जलाई गईं। यहां तक तो ठीक रहा मगर एक सांसद ने यह मामला लोकसभा में उठा दिया तो सरकार को लगा कि वास्तव में मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस लगी है।
इधर यह सब हो रहा था और उधर बिरादरी का एक खेमा जो मेरा विरोधी था इस खेमे में अधिकतर करखनदार थे जो बिरादरी पर अपना वचर्स्व चाहते थे इधर मेरी ओर बिरादरी का आम आदमी था। ये लेख उन के पल्ले पड़ गए तो उन्होने नमक मिर्च लगा कर मेरे खिलाफ फतवा ले लिया जिसमें मुझे काफिर करार दे दिया गया। उन लोगों ने यह फतवा भारी संख्या में हिंदी और उर्दू में छपवा कर जहां भी मेरे संपर्क थे उन सभी जगह भिजवा दिया ताकि मैं बिरादरी में अपनी गतिविधियां न चला सकूं। मगर इस फतवे का मेरी और मेरे समर्थकों की सेहत पर कोई असर नही पड़ा। हमारी सामाजिक गतिविधियां जारी रहीं। कारण यह था कि इन लोगों के जो भी विरोधी थे वे सब मेरे पास एकजुट हो गए.
उधर मामला सरकार के पास भी था तो पता नहीं किन किन विभागों के लोग मेरे पास आने लगे और कुरेद कुरेद कर पूछने लगे कि मैंने किस के कहने पर यह सब लिखा है। इन मेंकई अपने को सीआईडी का बताते तो कुछ एलआईयू का बताते तब मुझे इन बातों का पता नहीं था सो बहुत डर रहा था किसी से मदद भी नही मांग सकता था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। अपने लिखे पर पछता रहा था मगर जो छप गया उसे कैसे मिटाया जा सकता था। बिरादरी वालों से तो निपट लेता मगर सरकरी अमले से कैसे निपटा जाए यह समझ नहीं आ रहा था। कोई एक सरकारी सज्जन आए और मुझसे कहा कि मैं अपनी सुरक्षा के लिए सरकार से कहूं। यह एक और नया तमाशा हो जाता। एक समस्या यह भी थी कि जेब में पैसा भी नहीं था। परिवार के लोग भी परेशान थे। घर पर रोजाना नए नए लोग आ रहे थे। हां कुछ जनसंघी और आर्य समाज के लोग मेरी बड़ी आव भगत करते थे मगर किसी प्रकार की सहायता वे भी नहीं कर पा रहे थे। मुख्य समस्या सरकारी अमले की थी उनका प्रयास यही था कि मैं किसी का नाम ले कर बता दूं कि उस के इशारे पर मैं ने लिखा था मगर ऐसा कुछ भी नहीं था तो उन्हें बताता क्या।
एक शर्मा जी थे, दादरी के ही रहने वाले थे। इंटर कालेज में वह संस्कृत पढाते थे। शर्मा जी को सीबीआई में नौकरी मिल गई तो वे कालेज छोड़ कर चले गए। एक दिन उन का बुलावा आया तो उन से घर पर मिला। शर्मा जी तब सीबीआई में डिप्टी डायरेक्टर थे। हुआ यह था कि मेरी फाइल शर्मा जी के पास इस आशय के लिए आई थी कि क्या धार्मिक भावनाओं को आहत करने का मामला बनता है। शर्मा जी ने बताया कि मामला गंभीर है फाइल मेरे पास आई तो मैंने तुम्हारा नाम देख कर इसे अपने पास ही रख लिया। शर्मा जी ने कहा कि अभी तुम्हारा कैरियर आरंभ भी नहीं हुआ और तुम ने यह बवाल कर दिया अगर फंस गए तो तुम्हारा पूरा परिवार बर्बाद हो जाएगा। ये अखबार वाले भी तुम्हारी मदद नही कर पाएंगे क्योंकि ये

अपने बचाव में लग जाएंगे। मैं बहुत घबरा गया तो शर्मा जी ने कहा अब मामला मेरे पास है तो चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अगर मेरी मानो तो धार्मिक मामलों पर कलम चलानी बंद कर दो सामाजिक मामलों पर लिखो, तुम अच्छा लिखते हो। अब क्या होगा मैंने पूछा तो शर्मा जी ने कहा कि अब कुछ नहीं होगा मामला शांत हो जाएगा। मेरी रिपोर्ट पर ही आगे कुछ हो सकता है और मैं नहीं चाहूंगा कि मेरा कोई शिष्य संकट में फंसे। अब तुम निश्चिंत होकर जाओ और इस तरह के मामलों में टांग मत फंसाना।
शर्मा जी की बात में दम था क्योंकि मेरे पास न तो पैसा था और घर की हालत भी बहुत अच्छी नहीं थी। बिरादरी वाले पहले ही पीछे पड़े थे सो मैंने शर्मा जी की बात गांठ बांध ली और धार्मिक विषयों से तौबा कर ली। शर्मा जी अब इस संसार में नही हैं मगर उन्होने मुझ पर जो उपकार किया वह मैं नहीं भुला सकता ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। अगर शर्मा जी सहायता न करते तो पता नही मेरा क्या हाल होता।
लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है: सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207
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