Kanwal Bharti : राजकिशोर ने 'जनसत्ता' में लिखा है कि अगर राजेन्द्र यादव नहीं होते, तो कँवल भारती और ……(अमुक अमुक) को कौन छापता? मैं यह तो जानता हूँ कि राजकिशोर दलित-स्त्री विरोधी हैं, पर मैं यह नहीं जानता था कि वह राजेन्द्र विरोधी भी है. इसीलिए उन्होंने राजेन्द्र यादव को दलित-स्त्री के दायरे में ही समझा, उन्हें लोकतान्त्रिक विचारक के रूप में समझना ही नहीं चाहा.
वह लिखते हैं कि राजेन्द्र यादव का लेखन और हंस आलू-भिन्डी हो गया था, पर राजकिशोर जी, आप क्यों मुर्ग-मुसल्लम नहीं बन सके? इतना लिखने के बाद भी आप अपना कोई स्थान नहीं बना सके. मैं राजकिशोर आपको बता दूँ कि राजेन्द्र यादव बनने के लिए फौलाद का सीना चाहिए. और मैं यह भी आपकी जानकारी के लिए बताना चाहता हूँ कि राजेन्द्र यादव ने मुझे तब छापा था, जब मेरी एक दर्जन किताबें छप चुकी थीं. किसी बड़ी लकीर को मिटाना आपके बश का नहीं है राजकिशोर जी, हो सके तो उससे बड़ी लकीर खीँच कर दिखाएँ.
दलित चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.
Vimal Kumar : किसी भी लेखक का मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन संतुलित तरीके से किया जाना चाहिए. शोक के समय हम अक्सर अतिरेक कर देते हैं. विष्णु खरे के शोक पर लोगों ने प्रतिक्रिया जाहिर की थी. अब कुछ लोगों ने राजकिशोर की टिप्पणी पर भी प्रतिक्रिया पेश की है. राजकिशोर जी ने राजेंद्र यादव को निराला अंबेडकर और फुले की तरह युगप्रवर्तक बताया है.
राजेंद्र जी का निःसंदेह बड़ा योगदान है. कमलेश्वर और मोहन राकेश से अधिक. क्योंकि हंस ने उन्हें बड़ा बनाया. राकेश से अधिक आयु उन्होंने पायी. कमलेश्वर से अधिक बौद्धिक क्षमता और तीखापन उनके लेखों में रहता था. पर राजकिशोर जी ने थोडा अतिरेक किया. संभव है जो लोग यादव जी के साथ थे उनका भावनात्मक रिश्ता हो और जिनकी रचनाएं छपीं, वे कृतज्ञ हों पर निर्मला जैन ने सही कहा कि कुछ खोटे सिक्के भी चलाये. दरअसल किसी लेखक का मूल्यांकन पूरी परम्परा और इतिहास बोध के साथ करना चाहिए. न अतीत में सब कुछ महान था न वर्तमान के नायक ही महान नायक हैं..
पत्रकार और साहित्यकार विमल कुमार के फेसबुक वॉल से.






