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”मैं दया तो कर सकती थी, लेकिन उसके पेट भरने का इंतजाम नहीं कर सकती थी”

अभी एक दिन पहले घर पर सबका जलेबी खाने का मन हुआ तो मैंने कहा लाओ आज मैं ही ले आती हूं और थोड़ा टहलना भी हो जाएगा। इलाहाबाद में सुबह सुबह जलेबी खाने का बड़ा प्रचलन है। मैं थोड़ा ईधर उधर टहल कर एक जलेबी की दुकान पर पहुंची। देखा एक छोटा बच्चा जिसकी उभ्र लगभग १२-१३ साल की रही होगी भट्ठे पर चढ़ी कढ़ाई से जलेबी छान रहा था। मासूम सांवला चेहरा, आंखों में कोई चमक नहीं, चेहरे पर कोई भाव नहीं, पसीना टप टप उसके बदन से चू रहा था। जितना लम्बा उसका कद नहीं उससे ज्यादा लम्बा छन्ना था।

अभी एक दिन पहले घर पर सबका जलेबी खाने का मन हुआ तो मैंने कहा लाओ आज मैं ही ले आती हूं और थोड़ा टहलना भी हो जाएगा। इलाहाबाद में सुबह सुबह जलेबी खाने का बड़ा प्रचलन है। मैं थोड़ा ईधर उधर टहल कर एक जलेबी की दुकान पर पहुंची। देखा एक छोटा बच्चा जिसकी उभ्र लगभग १२-१३ साल की रही होगी भट्ठे पर चढ़ी कढ़ाई से जलेबी छान रहा था। मासूम सांवला चेहरा, आंखों में कोई चमक नहीं, चेहरे पर कोई भाव नहीं, पसीना टप टप उसके बदन से चू रहा था। जितना लम्बा उसका कद नहीं उससे ज्यादा लम्बा छन्ना था।

वैसे तो राह चलते रो़ज ही भूखे नंगे बच्चों को देखती हूं लेकिन शायद इतनी फुर्सत नहीं होती कि ये सोचो कि बच्चा चिलचिलाती धूप में, भरी बरसात में, कड़ाके की ठड़ में सड़कों पर यूं क्यों टहल रहा है। किसी स्कूल के गेट के अंदर क्यों नहीं, किसी पार्क में क्यों नहीं, या किसी घर के आंगन में उछल कूद क्यों नहीं कर रहा। मगर आज शायद फुर्सत में थी। और अचानक शायद मेरे अंदर का पत्रकार जाग गया था, मैंने उससे पूछा तुम्हारी उम्र क्या है? उसने सपाट सा जवाब दिया १३ साल। मैंने आगे पूछा, तुम हलवाई की दुकान पर वो भी आँच के सामने बैठ कर काम क्यों कर रहे हो, इसपर उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उससे कोई सवाल नहीं पूछा बल्कि बिना कारण उसे एक तमाचा मार दिया हो।

पत्रकार होने के नाते नहीं बल्कि एक इंसान होने के नाते मुझे एक झटका लगा मेरे दिमाग ने कहा तुम्हारा सवाल गलत था। खेलने की उम्र में वो बच्चा वहां अपनी खुशी से काम नहीं कर रहा होगा, ये मुझे सोचना चाहिए था। मैं अपनी गलती का एहसास करते हुए जो व्यक्ति गल्ले पर बैठा था उसकी तरफ मुखातिब हुई। मैने उससे कहा, 'आपको पता नहीं है, इतने छोटे बच्चे से काम करवाना जुर्म है। वो ऐसे मुस्कुरा दिया जैसे मैंने कोई जोक सुना दिया हो। अरे मैडम आप कहां इस पचड़े में पड़ती हैं। अभी से काम सीखेगा तो आगे चलकर अपने गरीब मां बाप और छोटे भाई-बहन को दो वक्त की रोटी तो दे सकेगा। अभी तो इसके यहां खाने के भी लाले पड़े हैं, वो तो मैंने दया करके इसे काम पर रख लिया वर्ना ये छंटाक भर का छोकरा क्या काम करेगा। उसने मेरी बोलती बन्द कर दी और मेरे ज्ञान को ठेंगा दिखा दिया।

मेरी ऩजर में या कानून की ऩजर में ये जुर्म है, मगर उसके तर्जुबे के हिसाब से वो उसके पेट भरने का इंतेजाम कर रहा था। मैं उसे कानून और कुछ योजनाओं के बारे में समझा सकती थी, मगर मैं उसके पेट भरने का इंत़जाम नहीं कर सकती थी, इसलिए मैं अपना सा मुंह लेकर अपनी जलेबी की थैली उठाई और चली आई। मगर मन जलेबी की मिठास पाने के बजाय किसी तरहा की कड़वाहट से भर गया। ये उस शहर का हाल है जिसका कोई माई बाप नहीं होता। क्योंकि महानगरों को छोड़कर सिवाय चुनावी दौर के छोटे शहरों पर किसी का ख्याल जाता ही नहीं (खैर ये मुद्दा अलग है)। दिल्ली बम्बई जैसे शहरों में भी जाने कितने मासूम रोड़ पर बिलखते दिखते हैं, वहां तो बड़ी-बड़ी संस्थाओं से लेकर राजनीतिक सिपहसलार तक मौजूद हैं, मगर सिवाय कानून बनाने के उनकी सुध लेने वाला कौन है। कुछ दिन पहले नेहरू जी कि पुण्य तिथि थी, उसपर कई लेख पढ़े, नेहरू जी को बच्चों से बेहद प्रेम था, वो बच्चों में देश का भविष्य देखा करते थे और भी जाने क्या क्या।

ये सच भी है कि चाचा नेहरू के नाम के आगे चाचा ही इस लिए लगा कि उन्हें बच्चों से प्रेम था। मगर म़जाक ये है कि चाचा नेहरू के इस भारत देश में सबसे ज्यादा बाल मजदूर हैं। आजादी के इतने सालों बाद भी गरीबी स्तर न कम हो रहा है और न ही गरीबी के कारण मासूम बच्चों का दम तोड़ता बचपन। बाल मजदूरी को जुर्म बनाने से पहले सरकार ने उनके पुर्नावास के बारे में क्या सोचा? और अगर सोचा तो उसपर अब तक अमल कितना किया गया। भूखे पेट भजन कब होता है। इसमें कोई शक नहीं कि सरकार ने बहुत सारे योजनाएं बना दिया है, करोड़ों का बजट भी पास हो जाते हैं, मगर वो कहां जा कर बंदरबांट हो जाते हैं इसपर कोई कड़ी कार्यवाही नहीं की जाती।

आंनबाड़ी से लेकर सरकारी सकूलों तक सब कुछ गड़बड़झाला है। सरकारी स्‍कूल से मास्टर नदारत, आंगनबाड़ी से अन्न और खाद्य पदार्थ नदारत। लड़का गरीब है उसे उसके १० प्रमाण पत्र देना हैं। उसे प्रमाण पत्र को कैसे बनवाया जाये इसकी जानकारी नहीं है, जैसे तैसे संबंधित ऑफिस में पहुंच जायें तो उसको बनवाने के लिए उसे घूस देना है। इतनी सारी योजनाओं का क्या लाभ जब संबधित व्यक्ति लाभान्वित ही न हो। बाल मजदूरी का जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने १९८६ में चाइल्ड लेबर एक्ट बनाया और काम करने की न्यूनतम आयु १४ वर्ष कर दी। सरकार ने आठवीं तक की शिक्षा भी नि:शुल्क कर दी, मगर गरीबी का दामन इतना विस्तृत है कि इस योजना ने भी दम तोड़ दिया।

बच्चों के माता पिता सिर्फ इस वजह से उन्हें स्‍कूल नहीं भेजते क्योंकि उनके स्कूल जाने से आमदनी कम हो जायेगी। माना जा रहा है कि ६० मिलियन बच्चे बाल मजदूरी का शिकार हैं, अगर ये आंकड़े सच हैं तब सरकार को अपने काम की और योजनाओं की पुनः समीक्षा करनी चाहिए। बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए कुछ ठोस कदम सरकार को और कुछ आम नागरिक को भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी मानकर कदम उठाने चाहिए। गरीबी को जड़ से खत्म करने के लिए शिक्षा के महत्व को समझना बेदद जरूरी है, जो शिक्षा की उम्र से आगे निकल चुके हैं, यानि जो १४-१५ साल की उम्र के हो उन्हें बेसिक शिक्षा के साथ-साथ रोजगार संबधी शिक्षा भी मुहैया कराना जरूरी है। गरीबी एक अभिशाप है, मगर सरकार और समाज द्वारा यदि कुछ ठोस कदम उठाये जाये तो सुधार संभव है।

लेखिका श्‍वेता शर्मा इलाहाबाद में पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं.

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