मेरे आलोचक कहते हैं कि यह बंदा किसी भी अख़बार में एक साल पूरा नहीं कर सका। मुझे तो यह कोई कमी नहीं लगती। सच कह रहा हूँ कि यदि परिवार के पालन की जिम्मेवारी न हो तो शायद ही कोई आदमी आजकल के अख़बारों में काम करे। धन्ना सेठों के ये बड़े-बड़े अख़बार विचारों के मुर्दाघाट हैं। पत्रकार नहीं हैं आज के अख़बारों में, रोटी के लिए संघर्ष कर रहे ऐसे लोग हैं जो कदम -कदम पर अपनी खुद्दारी से समझौता कर रहे हैं।
मेरा जुगाड़ था- दो रोटियों का और सपने पालने की विलासिता का शौक नहीं रहा, इसलिए कहीं 6 तो कहीं 7 महीनों में लात मार दी अख़बारों को। मैं पत्रकारिता करने आया था, अपनी डाक्टरी छोड़कर, नौकरी करने नहीं। नौकरी तो मैंने सरकार की भी नहीं की। 1983 में तो नौकरी आगे-पीछे घूमती थी। अपना अख़बार निकलने का ब्योंत नहीं रहा। कोशिश भी की थी। और अपने पैसे लगाकर कोई दूसरा मुझे क्यों क्रांति करने देगा। भला हो इस फेसबुक का जिसके कारण पागल होने से बच पा रहे अन्यथा, दिमाग फट जाता ।
रोहतक के पत्रकार Satish Tyagi के फेसबुक वॉल से





