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सुख-दुख...

मैं भी अन्य संपादकों की तरह मानता रहता कि यशवंत भड़ास के जरिए अपनी भड़ास निकाल रहे हैं

Shambhunath Shukla : धन्य हैं फेसबुक और भड़ास! अगर फेसबुक नहीं होता तो शायद अखबारी सेवा से मुक्त होने के बाद मुझे भी बाकी सारे संपादकों की तरह किसी न किसी अखबार में फिर खटना पड़ता और अपने मन की बात मैं कभी भी व्यक्त नहीं कर पाता।

Shambhunath Shukla : धन्य हैं फेसबुक और भड़ास! अगर फेसबुक नहीं होता तो शायद अखबारी सेवा से मुक्त होने के बाद मुझे भी बाकी सारे संपादकों की तरह किसी न किसी अखबार में फिर खटना पड़ता और अपने मन की बात मैं कभी भी व्यक्त नहीं कर पाता।

मुझे आज यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि फेसबुक के कारण मुझे ज्यादा लोगों ने जाना और समझा है। इस फेसबुक में लिखने के कारण मैंने bhadas4media के मालिक/संपादक श्री यशवंत सिंह को करीब से जाना और पहचाना वर्ना मैं भी अन्य संपादकों की तरह मानता रहता कि यशवंत भड़ास के जरिए अपनी भड़ास निकाल रहे हैं तथा उनका मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना है।

इस फेसबुक ने मुझे वह पहचान व एक्सपोजर दिया जो मैं दैनिक जागरण, जनसत्ता व अमर उजाला में क्रमश: चंडीगढ़, कोलकाता, कानपुर, नोएडा-दिल्ली, लखनऊ व मेरठ का संपादक बनकर नहीं बना पाया। 2007 से 2008 तक मैं अमर उजाला का राजनीतिक संपादक भी रहा लेकिन सही पहचान बनती है आपकी निर्भीक होकर लिखने से जो मुझे फेसबुक के जरिए मिली। हर जगह तमाम तरह के बंधन थे।

एक जमाने में हर सप्ताह जनसत्ता और अमर उजाला में मेरे लेख छपते थे पर कभी किसी ने मुंबई या कोलकाता अथवा चेन्नई या इटावा, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद या झांसी से फोन नहीं किया कि आपका अमुक लेख पढ़ा था। पर आज आलम यह है कि कई मुख्यमंत्रियों के सचिवालय भी मेरी टिप्पणियों से परेशान हो जाते हैं। टीवी और अखबार के तमाम पत्रकार मुझे फोन करते हैं कि आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। यह अचंभे की बात है कि अखबार अपने ही अखबार की प्रतिभा का सम्मान नहीं कर पाते हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ला के एफबी वॉल से साभार.

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