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दिल्ली

मैं, मेरे लेफ्टी दोस्त, राजनीति की बात, केजरीवाल का साथ

Sheetal P Singh : ये सब अकस्मात हुआ, हो रहा है। सारे/अधिकांश दोस्त लेफ़्टी हैं। भावुक पर ज़िद्दी। खासे पढ़े लिखे। विद्वानों में उनका शुमार। और अन्ना का जन लोकपाल आन्दोलन शुरू हुआ। संयोग भी अनिवार्यता भी कि जेपी और वीपी के आन्दोलनों में अजब तरीक़े से भागीदारी रही। जेपी के समय मसें भीग रही थीं, अप्रतिम उत्साह पर समझ नहीं थी। कुछ बहा ले जाने वाला दौर दौरा, बह लिये। मोहल्ले के जनसंघियों ने ककहरा पढ़ाया। जनता दल की सरकार बनते न बनते एक दो बार शाखा तक भी पहुँचा पर मन की बेचैनी कुछ ज़्यादा साफ़ साफ़ समझने में लगी थी कि लेफ़्टी मिल गये।

Sheetal P Singh : ये सब अकस्मात हुआ, हो रहा है। सारे/अधिकांश दोस्त लेफ़्टी हैं। भावुक पर ज़िद्दी। खासे पढ़े लिखे। विद्वानों में उनका शुमार। और अन्ना का जन लोकपाल आन्दोलन शुरू हुआ। संयोग भी अनिवार्यता भी कि जेपी और वीपी के आन्दोलनों में अजब तरीक़े से भागीदारी रही। जेपी के समय मसें भीग रही थीं, अप्रतिम उत्साह पर समझ नहीं थी। कुछ बहा ले जाने वाला दौर दौरा, बह लिये। मोहल्ले के जनसंघियों ने ककहरा पढ़ाया। जनता दल की सरकार बनते न बनते एक दो बार शाखा तक भी पहुँचा पर मन की बेचैनी कुछ ज़्यादा साफ़ साफ़ समझने में लगी थी कि लेफ़्टी मिल गये।

फिर क्या था, मरहूम सव्यसांची की पतली किताबों से हावर्ड फ़ास्ट की असली किताबों ने जीत लिया। दिल दिमाग़ से लेफ़्टी हो गये। फिर क्या था, छात्र/नौजवान आन्दोलन में होल टाइमरी। दुनिया देश ज़िला शहर गाँव सब बदलने के सपने में रात कब बीतती और सुबह कब आती पता ही न चलता कि एक दिन बच्चों ने जगाया- उनके स्कूल थे जहाँ फ़ीस लगती थी/ड्रेस चाहिये थी, कापी किताबें भी और…….।

लिहाज़ा पत्रकार बनने में आ लगे। यहीं मिले वीपी। इलाहाबाद उपचुनाव में क़रीब पहुँचने का संयोग हुआ फिर दूर न हो पाये। इस बीच पत्रकारिता के बाद व्यापार आज़माया और संयोग देखिये दो पैसे कमा भी लिये।

ये दो पैसे झंझट का सबब हैं। रिश्तेदार और चाटुकार इन्हें निबटा देने की युक्ति बताते रहते हैं।

"भाई साहब लोकसभा में अबकी आइये, मुलायम तो आपको जानते ही हैं, नहीं तो करोड़ दो करोड़ मायावती के मुँह पर मारिये पर टिकट ले आइये"।

"सर एक चैनल लान्च कीजिये, पत्रकारिता भी राजनीति भी और पैसा भी "।

इसी सब के बीच अन्ना रामलीला मैदान पर जन लोकपाल बनवाने बैठ गये। मन लग गया। देखा देश का मन भी वहीं था।

दोस्तों ने चेताया, संघ का खेल है, केजरीवाल आरक्षण विरोधी है, पैसा कौन फूँक रहा है? कुछ विदेशी हाथ, NGO लाबी और न जाने क्या क्या बताते/समझाते रहे पर दिल लग गया।

बाद में जब अन्ना को एक टीम केजरीवाल से अलग कर ले गई तो मेरी समझ ने मुझे केजरीवाल के साथ रखा।

मज़ा ये है कि शर्तों के साथ ही सही, लेफ़्टी दोस्त भी अब साथ आ रहे हैं धीरे धीरे।

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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