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सुख-दुख...

मैगजीन से अकारण ही त्याग-पत्र देने के लिए कहा गया, तो आप इसे मेरा इस्‍तीफा ही समझें

मैं पिछले 8 वर्षों से दैनिक भास्कर के मैग्ज़ीन डिवीजन में काम कर रही हूं और अपेक्षा के अनुरूप मेरे काम का स्तर भी ठीक रहा है। मेरी ज्वॉइनिंग के समय मुझे किसी भी प्रकार की स्पष्ट निर्धारण यानि गुजराती, हिंदी या अंग्रेजी भाषा के लिए अनुवादक या किसी संबंधित मैग्ज़ीन के लिए मेरी नियुक्ति गई है, ऐसा स्पष्टीकरण करके नहीं की गई थी। उस समय सिर्फ हिंदी अहा! ज़िंदगी ही अस्तित्व में थी और उसी के लिए मेरी नियुक्ति की गई थी।

मैं पिछले 8 वर्षों से दैनिक भास्कर के मैग्ज़ीन डिवीजन में काम कर रही हूं और अपेक्षा के अनुरूप मेरे काम का स्तर भी ठीक रहा है। मेरी ज्वॉइनिंग के समय मुझे किसी भी प्रकार की स्पष्ट निर्धारण यानि गुजराती, हिंदी या अंग्रेजी भाषा के लिए अनुवादक या किसी संबंधित मैग्ज़ीन के लिए मेरी नियुक्ति गई है, ऐसा स्पष्टीकरण करके नहीं की गई थी। उस समय सिर्फ हिंदी अहा! ज़िंदगी ही अस्तित्व में थी और उसी के लिए मेरी नियुक्ति की गई थी।

मैं लगातार तीनों मैग्ज़ीनों के लिए काम करती रही हूं। दो वर्ष पूर्व गुजराती मैग्ज़ीन बंद होने के बाद से मैं हिंदी के लिए काम करती रही हूं और नियमित मेरे लेख भी प्रकाशित होते रहे हैं। मैग्ज़ीन में मेरे लेख का प्रकाशित होना इस बात का स्पष्टीकरण है कि मेरी नियुक्ति किसी एक मैग्ज़ीन के लिए नहीं की गई थी। वर्तमान समय में कुछ स्वास्थ्य संबंधी समस्या के कारण मेरे अवकाश कुछ ज्यादा हो गए हैं, परंतु पिछले 8 साल के रिकॉर्ड को भी देखा जाना चाहिए।

अब मेरे लिए जो स्थितियां संस्था में बनाई जा रही हैं, उनके बारे में भी बताना जरुरी समझती हूं। मेरे नियमित कार्यालय आने पर मुझे कोई काम नहीं दिया जाता है। कार्यालय साथी किसी कार्यक्रम में साथ जाएं तो मुझे सूचित करना भी जरुरी नहीं समझा जाता है। यह नीति विभाग प्रमुख के द्वारा भी की जाती है, यानी एक तरह का छुआछूत भरा भेदभाव करना। मुझे अकारण ही त्याग-पत्र देने के लिए कहा गया है। मेरे विभाग प्रमुख से बात करने पर ज्ञात हुआ कि यह काम प्रशासनिक शाखा का है। वहां संपर्क करने पर पता चला कि यह भोपाल से कहा गया है। कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
    
एक ओर तो विभाग में नई नियुक्तियों के लिए विज्ञापन दिया जा रहा है, जो काम मैं भी करती थी और अभी भी कर सकती हूं। त्याग-पत्र मांगने का कारण जानने पर यह बताया गया है कि आप गुजराती के लिए थे और वह बंद हो चुकी है (इसका भी कोई लिखित में आदेश नहीं दिया गया है)। मेरा कहना है कि उसे बंद हुए तो लगभग 2 साल हो चुके हैं, क्या संस्था में बिना उपयोगिता के दो साल तक कर्मचारी को रखा जाता है?

सभी कारण, किसी भी ओर से मेरे द्वारा की गई किसी भी गलती या काम के प्रति मेरे समर्पण को कम नहीं आंकते है। यदि मेरे काम को लेकर शिकायत है तो विभाग प्रमुख द्वारा गलत काम करने वाले को लिखित में नोटिस दिया जाता है। अगर ऐसा ही होता तो मेरे खिलाफ बहुत से नोटिस जारी हो जाने चाहिए थे। मुझे त्याग-पत्र देने में कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि आप इसे मेरा त्याग-पत्र ही समझें। मैं तो सिर्फ यह जानना चाहती हूं कि –

1. क्या बिना किसी कमी के किसी भी व्यक्ति को संस्था से निकाला जाना चाहिए?

2. क्या इस तरह से संस्था की साख पर असर नहीं पड़ता कि एक ओर तो नई भर्तियां निकाली जा रही हैं और दूसरी ओर उसी पद के व्यक्ति को निकाला जा रहा है, वो भी बिना कारण?

3. क्या यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि पुराने लोगों को निकाल कर अपने समर्थकों को यहां नियुक्त किया जा रहा है ताकि विपरित परिस्थितियों में संस्था पर दबाव बनाया जा सके?

4. क्या मेरे विभाग प्रमुख को दो साल बाद याद आया कि मुझे तो गुजराती मैग्ज़ीन बंद होने के समय ही निकाल दिया जाना चाहिए था? यदि ऐसा है तो ऐसे व्यक्ति, जो दो साल तक बिना काम के कर्मचारियों को वेतन देते हैं, तुरंत बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए, क्योंकि यह तो संस्था के नुकसान की बात है।

कोषा गुरुंग

मैं किसी भी व्यक्ति की बुराई या नुकसान की बात नहीं कर रही हूं। मैं तो सिर्फ अपने निकाले जाने के कारण को समझ नहीं पा रही हूं। या तो नियुक्ति के समय मुझे यूं ही रख लिया गया, जो कि नियुक्त करने वाले की मूर्खता दर्शाता है या फिर निकालते समय किसी तरह की कोई दुश्मनी निकाली जा रही है, जो उसका घमंड दिखाता है। आशा है आप मेरे दर्द को समझेंगे और भविष्य में किसी कर्मचारी के साथ ऐसा न हो इसके लिए कुछ पुख्ता व्यवस्था करेंगे। यही उम्मीद और धन्यवाद के साथ!

सादर,

कोषा गुरुंग

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