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मोदी के सामने कौन?

प्रधानमन्त्री पद के लिए कांग्रेस से कौन? यह इस चुनाव की विशेषता नहीं है. इस चुनाव की विशेषता यह है कि मोदी के सामने कांग्रेस से कौन ? जी हाँ, सोलहवें लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने कांग्रेस से कौन? ये प्रश्न जितना राजनीति के पंडितों के मस्तिष्क को मथ रहा है उतना ही आम जनता के दिलो-दिमाग में भी कुलबुला रहा है कि मोदी जी के मुकाबले में दूसरी ओर से कौन? आज के हालात को देखते हुए इस बात को ऐसे कहना होगा कि मोदी जी को टक्कर देगा कौन? सर्वसाधारण को समझ में आ रहा है कि राहुल गांधी ही प्रधानमन्त्री पद के कांग्रेसी उम्मीदवार होंगे. अगर होंगे तो फिर घोषित कब होंगे? घोषित होंगे भी या न होंगे? या फिर ऐन मौके पर बनने आ जायेंगे प्रधानमन्त्री और अभी काम चला लेंगे किसी और के नाम से?

प्रधानमन्त्री पद के लिए कांग्रेस से कौन? यह इस चुनाव की विशेषता नहीं है. इस चुनाव की विशेषता यह है कि मोदी के सामने कांग्रेस से कौन ? जी हाँ, सोलहवें लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने कांग्रेस से कौन? ये प्रश्न जितना राजनीति के पंडितों के मस्तिष्क को मथ रहा है उतना ही आम जनता के दिलो-दिमाग में भी कुलबुला रहा है कि मोदी जी के मुकाबले में दूसरी ओर से कौन? आज के हालात को देखते हुए इस बात को ऐसे कहना होगा कि मोदी जी को टक्कर देगा कौन? सर्वसाधारण को समझ में आ रहा है कि राहुल गांधी ही प्रधानमन्त्री पद के कांग्रेसी उम्मीदवार होंगे. अगर होंगे तो फिर घोषित कब होंगे? घोषित होंगे भी या न होंगे? या फिर ऐन मौके पर बनने आ जायेंगे प्रधानमन्त्री और अभी काम चला लेंगे किसी और के नाम से?

गुजरात का मोदी पहले तो भाजपा का मोदी बना और अब देश का मोदी बन गया है. इसलिए आज इस नाम  की लहर को अतिशयोक्ति माने तो इसके कहर की बात को तो मानना ही पडेगा. मोदी के कहर से आतंकित है कांग्रेस, यह दिनदहाड़े साफ़ दिख रहा है. कायदा तो कहता है कि चूंकि नरेन्द्र मोदी भाजपा के प्रधानमन्त्री के रूप में सामने आ चुके हैं तो कांग्रेस को भी अपने प्रत्याशी की घोषणा करनी चाहिए. पर सवाल ये है कि कांग्रेस घोषणा करे तो किसकी करे?

यह सवाल उस दूसरे सवाल से अधिक अहम हो जाता है कि कांग्रेस अपने प्रधानमन्त्री की घोषणा कब करे ? कोई होना भी तो चाहिए  जिसका मोदी जैसा कद हो, मोदी जैसा नाम हो, मोदी जैसी उपलब्धियां जिसके पास हों – अगर इन तीनो स्तरों पर तौलें तो कांग्रेस की टीम में  इस तरह का कोई खिलाड़ी नज़र नहीं आता सिवाए एक के. लेकिन वह चेहरा मात्र राजनैतिक वरिष्ठता के मानक पर ही मोदी के समकक्ष खडा हो सकता है, आज के दौर में मोदी के कद को छूने का दुस्साहस उसका भाग्य भी नहीं कर सकता. हम यहाँ बात कर रहे हैं मनमोहन सिंह की.

इससे पहले कि हम कांग्रेस की विकल्पहीनता की भीड़ में से उसके विकल्प की संभावना तलाशें, एक बार पहले आज की वस्तुस्थिति पर गौर कर लेते हैं. भाजपा ने युद्ध का बिगुल बजा दिया है, मोदी का कैम्पेन शुरू हो गया है और कांग्रेस अभी भी सोच-विचार में डूबी है. वास्तव में कांग्रेस सोच-विचार में डूबी है या मोदी के हर कदम की नाप-तौल में व्यस्त है, ये बात दीगर है पर दिखता तो यही है कि उस तरफ उलझन भरी खामोशी छाई हुई है. ये तो हुई आज की हालत, आज के बाद के हालात कैसे होंगे या हो सकते हैं,  इस पर तीन तरफ़ा विचार-मंथन चल रहा है – एक कांग्रेस याने यूपीए की तरफ से, दूसरा भाजपा याने एनडीए  की तरफ से तीसरा वोटर याने जनता की तरफ से.

जो भी हो, एक बात तय है कि आने वाले दिनों में समीकरण लगातार बदलेंगे. परेशानी और उलझन में पड़ी कांग्रेस कई ऐसी चालें चल सकती है जो किसी की भी उम्मीद से जुदा हो सकती हैं क्योंकि खुद कांग्रेस के सामने ऐसी स्थिति आ गई है मोदी की वजह से.  मोदी टक्कर देंगे ये तो सबको पता था पर मोदी आंधी बन जायेंगे, ऐसा नहीं सोचा था कांग्रेस ने.

कांग्रेस के सामने हैं पांच राज्यों के चुनाव और फिर आम चुनाव. इन चुनावों के मद्देनज़र भाजपा ने अपने पत्ते साफ़ कर दिए जो उसकी समझदारी थी और ये समझदारी कांग्रेस पर भारी पड़ी. अब कांग्रेस को  या तो पांच राज्यों के पहले अपने प्रधानमन्त्री की घोषणा करनी होगी, वह आम चुनाव तक इसे लटकाए नहीं रख सकती.  अभी कुछ दिन तो कांग्रेस यह कह कर टालने वाली है कि हम समय आने पर अपने प्रधानमन्त्री पद के प्रत्याशी की घोषणा करेंगे. पर उसे इस सच्चाई से दो-चार होना ही पडेगा कि बिना अपने पीएम प्रत्याशी की घोषणा के आगे बढना संभव नहीं होगा.

इसलिए कांग्रेस एक काम ये कर सकती है कि अभी एक काम चलाऊ प्रत्याशी घोषित कर दे और असेम्बली चुनावों के बाद उसका चेहरा बदल दे यानी कि प्रधानमन्त्री पद का नया प्रत्याशी घोषित कर दे. असेम्बली इलेक्शंस के परिणामो को नज़र में रख कर परिस्थिति के अनुसार दूसरा प्रत्याशी अर्थात कांग्रेस का दूसरा प्रधानमन्त्री घोषित हो सकता है और फिर तीसरा प्रत्याशी घोषित किया जा सकता है आम चुनावों के बाद जो कि ऊँट किस करवट बैठा है, इसे देख कर निर्धारित होगा.

अगर रणनीति का यह नक्शा सामने रख कर कांग्रेस आगे बढ़ेगी तो उसे तीन अलग अलग प्रधानमंत्रियों की तलाश करनी होगी. अब कांग्रेस तो जनता को अभी बताने से रही कि ये तीन चेहरे कौन से हो सकते हैं, पर हम इस विषय में विचार कर सकते हैं. और इसके लिए हमें तर्कों व परिस्थितियों पर सामान रूप से सही बैठने वाली नज़र दौडानी होगी जो कांग्रेस के उन तीन चेहरों को सामने लाये जो तीन स्तरोंपर मोदी का मुकाबला कर सकें. अब हम अगर आज से आगे बढ़ते हुए इन तीनो चेहरों को एक के बाद एक बे-नकाब करेंगे तो वो ज़रा मुश्किल होगा बनिस्बत इसके कि हम सीधे चलें २०१४ के चुनावों के बाद के परिदृश्य पर और फिर वहां से वापसी करनी शुरू करें आज की तारीख तक. हमारे लिए कांग्रेस की रणनीति का अध्ययन करने का सही तरीका यही होगा कि हम उलटे चलें. कांग्रेस की राजनैतिक चालें यदि सही-सही समझनी हों तो उन्हें उलटा करके समझना चाहिए तब वे सीधे समझ में आ जाती हैं.

तब चलिए २०१४ के चुनावों के बाद वाले दिन चलते हैं. ३१ मई २०१४ के बाद याने जून-जुलाई के महीने में.  चुनावों के बाद का दिन याने परिणाम का दिन एक ऐसा दिन होगा जिसकी प्रतीक्षा सभी को है विशेषकर स्वतंत्र भारत के इतिहास को. कदाचित भारत भाग्य विधाता का नया चेहरा वह भी देखना चाहता है. काल के गाल में समाते भारत के गौरव-गरिमा की लाज कौन रखेगा, शायद इसका इंतज़ार उसे भी है ! २०१४ के चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की रणनीति पर विचार करना बेमानी तब न होगा जब वह चुनाव के पराजय-स्थल पर न खड़ी हो, भले ही विजेता न भी हो पर पराजित न हो अर्थात सरकार बनाने की तिकड़मी हालत में हो. उस दशा में   हम इसे कांग्रेस की जीत नहीं,  कांग्रेस की भारी जीत कहेंगे क्योंकि आज चल रही बयार तो हालात को इसकी इजाज़त नहीं देती. तब भी कांग्रेस इस तरह कामयाब हो जाए तो ये कामयाबी मामूली तो बिलकुल ही नहीं ठहराई जा सकती.

अब इस हालत में जब कांग्रेस रथ-सवार-सरकार बनाने जा रही हो याने कि कई घोड़ों पर सवार सरकार का रथ तैयार हो रहा हो तो उसका सारथी कौन होगा ? सबसे पहले हम इस पर विचार करते हैं. यहाँ एक आम आदमी की सोच कांग्रेस की उस दिन की अंतिम सोच का मुकाबला करती है. याने कि उस हालत में कांग्रेस के प्रधानमन्त्री होंगे उसके युवराज अर्थात राहुल गांधी. न कांग्रेस को इस पर कोई आपत्ति होगी न उसके सरकारी रथ के घोड़े इस पर कोई हील-हुज्जत करेंगे.  और तब हो जायेगी ताजपोशी शहजादे की. या इस बात को बिना लाग-लपेट के कहें तो ऐसे कहेंगे कि यदि कांग्रेस को मिली सरकार बनी या कांग्रेस की मिली-जुली सरकार बनी तो दोनों ही हालत में भारत के अगले प्रधानमन्त्री राहुल गांधी होंगे.

अब उसके ज़रा पहले आते हैं याने कि असेम्बली चुनावों के बाद और आम चुनावों के पहले. यहाँ आम चुनावों की जंग के लिए सेनापति का चयन किसका हो, ये प्रश्न  उत्तर की अपेक्षा रखता है. इस प्रश्न का उत्तर पांच राज्यों के असेम्बली चुनावों के  परिणामो पर निर्भर करता है. यदि ये चुनाव परिणाम  कांग्रेस-सापेक्ष हुए तो सेनापति का बदलाव नहीं होगा और असेम्बली चुनावों में कांग्रेस के प्रधानमन्त्री पद का प्रत्याशी आम सभा चुनावों के लिए भी कांग्रेस का प्रधानमन्त्री बना रहेगा. किन्तु यदि ये चुनाव कांग्रेस को धराशायी करने वाले परिणाम सौंपते हैं तो ये चेहरा बदल जाएगा. .

इस पड़ाव पर आकर कांग्रेस को अपना नया क्षत्रप चुनना होगा जो आमसभा चुनावों में कांग्रेस की नैया पार लगा सके. अब यहाँ कांग्रेस के पास क्या विकल्प है ? क्या राहुल गांधी ? यदि तब राहुल गांधी तो आज क्यों नहीं ? इसका उत्तर एक ही है – राहुल गांधी मोदी के मुकाबले के मोहरे नहीं हैं इसलिए न तब और न ही आज राहुल गांधी को इस जंग में उतारा जाएगा. राहुल को दांव पर नहीं लगाया जा सकता. हार से पूरी नाक कटेगी कांग्रेस की.

देखिये, बात बिलकुल साफ़ है यदि कांग्रेस की बात करें तो उसके निर्माण से आज तक  उसका चरित्र एक ऐसे राजनैतिक दल का है जो कब कौन सी चाल चल जाए, कौन सा मोहरा खेल जाए या किस करवट बैठ जाए, अनुमान करना कठिन है. नीति नामक शब्द अमूमन कांग्रेस की व्यवहारिक शब्दावली से गायब हो चुका है. इसलिए यहाँ नीति के शास्त्र पर अनुमान कार्य नहीं हो सकता. तब परिस्थिति के अनुमान के लिए अनीति के आँगन में आइये. कांग्रेस की अनीति का यह आँगन  असीम विस्तार वाला है. इसकी थाह आप आसानी से तो नहीं ले सकते क्योंकि कांग्रेस की संस्कृति में वही पल सकता है और वही फल-फूल सकता है जिसको इस "फ्री थिंकिंग" का गुप्त-ज्ञान भली-भांति हो. यह भारत के आम वोटर के लिए गुप्त है किन्तु भारत के आम कांग्रेसी के लिए ज्ञान है.

इस प्रकार बात बिलकुल साफ़ यह है कि चेहरा कुछ और चाल कुछ – तब बनता है चरित्र कुछ. ये चाल. चेहरा और चरित्र कांग्रेस के कैनवास का है. जब तीनो चीज़ें अलग-अलग हैं याने कि चाल, चेहरा और चरित्र तीनो अलग-अलग हैं तो चित्र स्पष्ट हो जाता है जिसे हम जानते हैं कांग्रेस की रणनीति के रूप में. इसका अर्थ है कि प्रधानमन्त्री के पद के लिए कांग्रेस का चेहरा कोई और एवं प्रधानमंत्री बनने के लिए चेहरा कोई और.. मनमोहन का चेहरा और नेतृत्व नेत्रित्व राहुल का. जी हाँ, करना कुछ ख़ास नहीं है. यदि कांग्रेस की सभी गोटियाँ फिट बैठती हैं अर्थात आमसभा चुनावों में तीन-तेरह करने वाले तीन से लेकर तेरह दलों की सरकार बनाने की स्थिति में यदि कांग्रेस पहुँच जाती है तो बड़े आराम से कांग्रेस अपने सांसदों की एक मीटिंग करवाएगी और आप अगले दिन अखबार में पढेंगे कि मनमोहन साहेब ने प्रधानमन्त्री पद के लिए राहुल गांधी को अधिक योग्य उम्मीदवार घोषित करके स्वयं राहुल का नाम प्रस्तावित किया और इस प्रकार सर्वसम्मति से राहुल गाँधी प्रधानमन्त्री चुन लिए गए.

परंतु यदि पांच राज्यों के चुनाव में चारों खाने चित्त गिरी कांग्रेस को नया विकल्प चुनना पड़ता है तो प्रधानमन्त्री पद के लिए दांव पर लगाए जा सकने वाले कुल चार बड़े चेहरों में से अब दो चेहरे ही बचते हैं. बाकी सभी चेहरे मोदी के बड़े चेहरे के भीतर समा जाते हैं इसलिए कांग्रेस को इन चार बचे-खुचे चेहरों पर ही दांव खेलना होगा. इन चार में से दो चेहरों का हम ज़िक्र कर चुके हैं. एक को सब जानते हैं – युवराज राहुल और दूसरे को लोग तब जानेंगे जब इनके नाम का ऐलान होगा – मनमोहन सिंह. बाकी बचे दो चेहरे, उन्हें जानते तो सभी हैं पर प्रधानमन्त्री पद के लिए उन पर ध्यान नहीं जाता किसी का.

आज और आने वाले कल की दुर्गम परिस्थितियाँ कांग्रेस के लिए जिस विवशता को जन्म दे रही हैं उससे उपजे हुए हैं ये दो चेहरे. ऐसे बड़े कारण बन रहे हैं जो इन दो चेहरों को सामने आने पर मजबूर कर रहे हैं. मोदी की टक्कर में वरिष्ठता के स्तर पर  कुछ नेता हैं जैसे मनमोहन, पी चिदंबरम आदि. मोदी के मुकाबले कांग्रेस में यदि कोई चोटी का सितारा है तो वह है राहुल गांधी जो वैसे भी सोनिया की पहली पसंद है. किन्तु लोकप्रियता का ग्राफ देखें तो मोदी जैसा लोकप्रिय नेता न कांग्रेस में है, न भाजपा में और न ही किसी अन्य दल में. मोदी जैसा विकास-पुरुष न तो कांग्रेस में है, न भाजपा में, न ही किसी और दल में. तब उपलब्धियों के अस्त्र-शस्त्रों से लैस इस भाजपाई अर्जुन को ललकारने का दुस्साहस करने के लिए अपना दुशासन कहाँ से लाये कांग्रेस ? यक्ष प्रश्न यही तो है.

इस यक्ष प्रश्न का इलाज भी है कांग्रेस के पास. सवाल ये नहीं कि अपने इस ट्रम्प कार्ड से कांग्रेस अवगत नहीं है, बलिक सवाल ये है कि कांग्रेस इस दुविधा में है कि इसका इस्तेमाल करे या न करे. दुविधा ये भी है कि दूसरे बेहतर विकल्पों को भी तलाशा या तराशा जाए. कांग्रेस के रणनीतिकार सर जोड़ कर आजकल यही मंत्रणा कर रहे हैं कि अपने दो ट्रम्प कार्ड्स के इस्तेमाल से पहले तलाश लें, शायद कोई मिल जाए तो ब्रह्मास्त्रों का प्रयोग न करना पड़े. पर मूल तथ्य न उनकी निगाहों से छुपा है न ज़माने की कि मोदी के आगे खड़े होने के लिए कोई धुरंधर महारथी चाहिए, जो फिलहाल ला-पता है. सवाल खड़े होने भर का नहीं है न ही जीतने का है. सवाल है टक्कर देने का, क्योंकि मोदी के सामने किसी दूसरे की जीत की संभावना कम ही है फिर नाक कट जाए और नाम भी मिट जाए इस बुरी  हालत से बचने के लिए हो रही है ये सारी दिमागी मशक्कत. मोदी का करें तो क्या करें ?

अंततोगत्वा जो होना है याने जिसकी अधिकतम संभावना है वो ये कि एक दिन आपको चौंका दिया जाएगा ये खबर सुना कर कि मोदी के मुकाबले कांग्रेस दल की प्रधानमन्त्री पद की उम्मीदवार होंगी श्रीमती सोनिया गाँधी. अरे ये क्या ? ये कैसे ?, वगैरह जैसे सवाल उठेंगे लेकिन ये भी साफ़ हो जाएगा कि अब चुनाव उतने एक तरफ़ा नहीं होंगे जितने मोदी ने कर दिए थे. अचानक मीडिया और कांग्रेस से ये शब्द सुनाई देंगे सारे देश को – देश की बहू आपसे भारत के सुनहरे कल के लिए समर्थन की अपेक्षा करती है ! इंदिरा गाँधी की उत्तराधिकारी भारत की गरिमा सोनिया गाँधी आपसे समर्थन मांग रही है ! गाँधी-नेहरु की परम्परा की उत्तराधिकारिणी सोनिया गाँधी ने देश की अस्मिता बचाने के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी ! अपनी सास, पति और देवर को देश के लिए खो देने के बाद अब सोनिया खुद आहुति बन गयी हैं देश की राजनीतिक बलि-वेदी पर ! श्रीमती गांधी खुद आ गईं मैदान में अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढाने के लिए ! ..आदि आदि. सोनिया की तारीफ़ में कशीदे पढ़े जायेंगे और लगेगा कि सारे कांग्रेस दल में ही नहीं सारे देश में जान फूँक दी हो सोनिया ने. भाजपा समझ जायेगी कि अब २७२+ उतना आसान नहीं.

किन्तु फिर यहीं एक दूसरा तथ्य सामने आता है जो सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस के इस जन-भावना को एन-कैश कराने चुनावी अभियान को करारा झटका दे सकता है. यह 'ब्रह्मशर' साधेगी भाजपा, उनको कहना बस इतना ही होगा – 'क्या आप एक विदेशी महिला को भारत का प्रधानमन्त्री बनायेंगे ?'  सारा खेल ख़त्म. आधे से भी अधिक वोट कांग्रेस के भी तितर-बितर हो जायेंगे. और भाजपा का काम बन जाएगा. इसके अलावा उतना ही असर अल्पसंख्यक मूल से सम्बंधित होने का भी पडेगा और सोनिया के वोट उस तरह भी कटेंगे. सोनिया याने कांग्रेस. जो असर सोनिया को पडेगा वही कांग्रेस को भी. इसलिए सोनिया वह कार्ड है जो चरम स्थिति में ही इस्तेमाल किया जा सकता है वो भी सफलता की पूरी आशा के बिना. मनमोहन जैसे घिसे हुए और चिदंबरम बिना चमक और बिना खनक वाले घिसे हुए सिक्के हैं. मनमोहन प्रधानमन्त्री हैं इसलिए लोग उनका नाम जानते हैं पर चिदंबरम गाँव-कस्बों की अधिकतर जनता में अनजाना चेहरा हैं. इसलिए ऐसे नेताओं के मुकाबले मोदी के आगे टिक कर मुकाबला करने वाली कोई हस्ती उस तरफ है तो सोनिया गांधी.

तो ये थे तीन वो चेहरे जो तीन अलग-अलग मौकों पर कांग्रेस द्वारा ज़रुरत के मुताबिक़ कैश कराये जा सकते हैं. मनमोहन असेम्बली चुनाव के पहले, सोनिया लोकसभा चुनाव के पहले और राहुल लोक सभा चुनाव के बाद सीधे-सीधे प्रधानमन्त्री पद के प्रत्याशी के तौर पर सामने आ सकते हैं. अब यहाँ सवाल ये उठता है कि जब सोनिया फायदे का सौदा नहीं तो फिर सोनिया का रिप्लेसमेंट कौन ? कौन है वो चौथा चेहरा जो सही मायनों में ट्रम्प कार्ड है कांग्रेस का?

जी हाँ, ये वो चेहरा है जिसे अब तक कांग्रेस ने इस इस समझदारी में इस्तेमाल नहीं किया था कि न जाने कब किस बुरी घडी में उसकी ज़रुरत पड़ जाए. यह चेहरा इन चारों चेहरों में सबसे अधिक चौंकाने वाला चेहरा है जो प्रधानमन्त्री की कुर्सी का दावेदार बना कर सामने लाया जा सकता है ये चेहरा भी सिर्फ चेहरा ही बनेगा, प्रधानमन्त्री पद पर अंततोगत्वा सुशोभित युवराज ही होंगे बशर्ते कांग्रेस को विजयश्री मिले या सरकार बनाने का तिकड़मी मौक़ा मिले.

कांग्रेस की इन चुनावों में लाज रखने वाला ये चौथा चेहरा है राजकुमारी का. राजकुमारी याने प्रिंसेस याने प्रियंका. प्रिंसेस ऑफ़ कांग्रेस याने प्रिंसेस ऑफ़ इंडिया !    हाँ, प्रियंका को डॉटर ऑफ़ इंडिया बनने से तो कोई नहीं रोक सकता क्योंकि उन्हें इसी रूप में प्रस्तुत करेगी उनकी खानदानी पार्टी. सोनिया देश की बहू तो प्रियंका देश की बेटी. देश के लोग अपने आप को कितना भी होशियार मानें, भावनाओं के ज्वार में उनकी आँखें बंद हो जाती हैं और कुछ देर के लिए तो वे बापू के बन्दर बन जाते हैं. न बुरा देखते हैं, न सुनते हैं न बोलते हैं. सिर्फ भावुकता के समंदर में बहने लग जाते हैं. लेकिन ऐसा कुछ देर के लिए ही होता है. भावुकता हमारी जनता के मन का स्थायी भाव नहीं है. लेकिन इतना भी काफी है. इतनी ही देर में काम हो जाता है. दुनिया बदल जाती है, सरकार बदल जाती है..और वो सब हो जाता है जो कभी-कभी नहीं होना चाहिए.

भारत की बेटी के नाम पर वोट बटोरे जा सकते हैं. इंदिरा जैसी नाक-नक्श वाली प्रियंका हूबहू उनका रूप धारण कर सकती है जो कि कांग्रेस उनसे करवाएगी. वैसी ही साड़ी पहनकर, सर पर पल्ला ले कर, वैसा ही चौड़े फ्रेम का काला चश्मा लगा कर, इंदिरा की आवाज़ की नक़ल कर के उन्ही के अंदाज़ में भाषण दिलवा कर कांग्रेस थोड़ा परेशान कर सकती है विरोधी दलों को. लेकिन पति के रूप में प्रियंका ने जिसे पाया है वही प्रियंका की काट भी बनेगा. विरोधियों के पास यही एक जवाब होगा प्रियंका नाम के इस  सवाल के जवाब में. रोबर्ट वाड्रा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के गीत गा-गा कर भाजपा देश से पूछेगी कि भ्रष्टाचार से सना क्या यही परिवार मिला है आपको देश का सिरमौर बनाने के लिए? याने कि राजकुमारी प्रियंका भी कुल मिला कर एक फ्लॉप आइडिये से अधिक सिद्ध नहीं होंगी. जो भी हो, कांग्रेस के पास सर्वोत्तम विकल्प जो कि मोदी की आंधी के सामने कांग्रेस का वटवृक्ष बनने का सामर्थ्य रखता है वो है प्रियंका गांधी. बेदाग़ छवि या कहें कांग्रेस की सर्वोत्तम छवि. एक सहज आकर्षण हैं उनके व्यक्तित्व में साथ ही है एक सादगी और सीधापन. प्रियंका आई तो कांग्रेस के वोटों के प्रतिशत में इजाफा तो ज़रूर होगा भले ही वो निर्णायक रेखा से काफी दूर क्यों न  हो.

तो फिर होगा क्या कांग्रेस का ? कांग्रेस का जो हो सो हो.  कांग्रेस की विजय या पराजय की चिंता से पूर्व रणभूमि में उसके संघर्ष की चिंता है,   चिंता ये है कि  मोदी के सामने कौन ? याने कि कांग्रेस से मोदी के सामने कौन ? और इस चिंता के संभावित और स्वाभाविक हल रूप में ये जो चार चेहरे नज़र आते हैं इनमे से तीन तो घर के ही हैं, एक बाहर के हैं .  ये चौथे सज्जन दो बार तो इस्तेमाल हो के काम में आ गए पर तीसरी बार इस्तेमाल हुए तो काम से गए समझो. वैसे भी अब वे तीसरी बार इस्तेमाल होने लायक बचे भी नहीं हैं. उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को और देश की अर्थव्यवस्था ने उनको डुबो दिया. मनमोहन ने देश का मन नहीं मोहा, अपने मौन से अपनी चतुराई और मूर्खता के संतुलन को छिपाए रखा पर कुल मिला कर जो छवि सामने आई वो भी निम्न कोटि की ही निकली. न चिंतन, न कार्य, न व्यक्तित्व न कृतित्व. हर मोर्चे पर फेल मनमोहन कांग्रेस के गब्बर अब नहीं बन पायेंगे बल्कि उसके मैकमोहन बन कर इशारों पर नाचने वाली छवि के साथ अंधेरों के इतिहास में अमर हो जायेंगे.

पारिजात त्रिपाठी का विश्लेषण.

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