मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने अपनी किताब “इंडिया फ्रॉम मिडनाईट टू द मिलेनियम’’ के पेज नंबर 40 पर अपना अनुभव साझा किया है कि कैसे अप्रैल,1975 में 19 वर्ष की उम्र में एक फ्रीलान्स पत्रकार रहते हुए उन्होंने युवाओं की एक पत्रिका के लिए बेरोकटोक सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय जाकर इंदिरा गांधी का इंटरव्यू किया था. इतना ही नहीं एक मित्र जो उनके साथ यूं ही जाना चाहता था उसने एक बैग में दिखाने के लिए एक टेप रेकॉर्डर रख लिया ताकि सब को लगे कि वो भी काम से आया है. जब गांधी के प्रेस सेक्रेटरी एच वाई शारदा प्रसाद से थरूर ने पूछा कि क्या उनका मित्र भी उनके साथ अन्दर जा सकता है तो उन्होंने जवाब दिया – क्यूं नहीं?
थरूर खुद कहते हैं कि उस बैग में बम भी हो सकता था पर उस जमाने में इन बातों पर कोई ध्यान भी नहीं देता था. 1999 के कंधार विमान अपहरण कांड के कवरेज में नेपाल के प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेने का मेरा अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा. महज़ आई कार्ड दिखाने पर प्रधानमंत्री से साक्षात्कार की अनुमति मिल गई थी.
अब समय बदल गया है. हर राजनीतिक पार्टी में मीडिया सेल है. मीडिया रणनीति बनती है. कई स्तर पर प्लानिंग होते हैं. और इन सब के बीच बड़े नेता पत्रकारों के साथ आंखमिचोली का खेल खेलते हैं. मुश्किल सवालों के जवाब प्रवक्ता देते हैं. स्टार नेता अपने आभामंडल से बाहर निकलना जरूरी नहीं समझते. उनकी आवाज दूर से आती है. सवाल-जवाब का हिस्सा बनने से उनकी छवि मानो कमतर हो जाएगी.
अंग्रेजी चैनल के एक बड़े पत्रकार हाल ही में पटना आए थे. उनसे मैं अपनी जानकारी के लिए पूछ बैठा कि क्या नरेन्द्र मोदी मीडिया के सवालों का जवाब देते हैं? उन्होंने एक किस्सा सुनाया. तब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं हुए थे और दिल्ली में पार्टी का काम देखते थे. एक दिन किसी विषय पर चर्चा करने के लिए अरुण जेटली को उनके चैनल में आना था लेकिन किसी कारणवश वो नहीं पहुंच पा रहे थे. तब नरेन्द्र मोदी को फोन मिलाया गया और आने का आग्रह किया गया. नरेन्द्र मोदी समझ गए कि किसी गेस्ट ने मना कर दिया है इसलिए उन्हें बुलाया गया है. मोदी ने उस पत्रकार से पूछ भी लिया कि क्या किसी ने मना कर दिया है इसलिए उन्हें बुलाया गया है? पत्रकार ने महज़ इतना कहा कि आप आ जाइए. उन्होंने पूछा कि गाड़ी कहां है? पत्रकार ने कहा कि आप टैक्सी ले लीजिए और आ जाइए. मोदी ने जान-बूझकर कहा कि उन्हें किसी के ना आने पर बुलाया गया है ना कि खुद से. ऐसा इसलिए कहा कि कोई उन पर कृपा नहीं कर रहा बल्कि वो खुद आकर उन्हें ऑब्लाइज कर रहे हैं. ये तब की बात थी. अब उन्हें स्टूडियो बुलाना तो दूर, इंटरव्यू करना भी अपने आप में चुनौती है.
मान लिया कि स्टूडियो में आना या इंटरव्यू करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि बहुत सारे चैनल हैं और वो कहां जाएं, कहां नहीं जाएं. पर प्रेस कान्फ्रेन्स बुलाकर पत्रकारों के सवाल नहीं लेना, ये क्या सही है? पटना में नरेन्द्र मोदी 2 नवम्बर को मिशन सांत्वना पर आए थे. शाम में एयरपोर्ट पर गुजरात वापस जाने के क्रम में वीवीआईपी लॉंज आए. बहुत मशक्कत के बाद रोड पर ही प्रेस को खड़ा कर दिया गया. काफी चेकिंग हुई. पहली बार बिहार पुलिस के अधिकारियों ने पत्रकारों का चेकिंग किया, फिर दूसरी बार गुजरात पुलिस ने, फिर आखिरी बार सीआईएसएफ वालों ने. इस बीच धक्का-मुक्की के बाद छोटी सी जगह पर करीब चार घंटे के लंबे इंतज़ार के पश्चात मौका मिला नरेन्द्र मोदी से रूबरू होने का.
जैसा कि परम्परा है – पहले वे अपनी बात रखते हैं. अपनी बात खत्म कर नरेन्द्र मोदी मुड़ने लगे. पत्रकार सवाल करने लगे और वो सुनकर भी अनसुना करने लगे. अंदर जाकर लॉंज जो कि बिल्कुल सटा हुआ था, उसमें जाकर बैठ गए. पत्रकारों को समझ में नहीं आया कि आखिर मोदी ने ऐसा क्यूं किया? अगर मीडिया से नहीं बात करनी थी तो प्रेस रिलीज भिजवा देते. या और दिनों की तरह ट्वीट कर देते. सवाल धरे के धरे रह गए. चर्चाएं होने लगीं. क्या मोदी सवालों से बचना चाहते थे?
सवाल कई थे – पहला सवाल ये था कि जिस तरह बिहार के लोगों के आंसू पोंछने आए थे, क्या उसी तरह गुजरात के दंगों और आतंकी घटनाओं में मारे गए लोगों का हाल जानने गए?
दूसरा सवाल बिहार के मुख्यमंत्री ने उनके इतिहास के ज्ञान पर सवाल उठाया है, साथ ही कहा है कि बाहर से आए कचड़े को बिहार की जनता साफ करेगी, इस पर उनका क्या कहना है. ऐसे ही कई सवाल थे. लेकिन मोदी ने सवाल तो दूर पत्रकरों की तरफ एक बार मुड़कर भी नहीं देखा. सभी सोच में पड़ गए आखिर हुआ क्या?
नेताओं को सवाल से बचते हुए देखा है. सवाल कुछ और जवाब कुछ और देते देखा है पर सवाल ही नहीं लेना आज तक नहीं देखा था. एक वक्त था जब नरेन्द्र मोदी के बारे में सवाल नीतीश कुमार से पूछा जाता तब वो या तो सवाल टाल जाते थे या फिर हाथ जोड़कर खड़े हो जाते थे. लेकिन सवाल सुनते ज़रूर थे. मोदी क्या नई परम्परा की शुरुआत कर रहे हैं?
इंदिरा गांधी का ज़िक्र शशि थरूर ने जिस तरह किया है वो तब का दौर था जब किसी फ्रीलांसर के लिए किसी से भी मिलना आसान था, यहां तक कि प्रधानमंत्री से भी. लेकिन बाद में इन्हीं इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी भी लगाया था जिसमें प्रेस की आज़ादी को खत्म करने की कोशिश की गई थी. हालांकि देश में अब इमरजेंसी लगने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता लेकिन नरेन्द्र मोदी का यह रवैया उनकी मानसिकता को समझने के लिए काफी होगा.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कभी-कभी पत्रकारों से ना तो बात करते हैं और ना ही मिलते हैं लेकिन ऐसा किसी खास परिस्थिति में ही करते हैं. या तो उनके पास अनुकूल जवाब नहीं होता है या फिर उस खबर के थमने का इंतजार करते हैं.
उत्तर प्रदेश में मायावती जब मुख्यमंत्री थीं तो वो भी अपनी बात रखने के बाद सवाल नहीं लेती थीं. मायावती ने तो अपने मंत्रियों को भी हिदायत दे रखी थी कि प्रेस से बात ना करें.
सीएनएन-आईबीएन के डेवील्स एडावोकेट कार्यक्रम से भी मोदी वरिष्ठ पत्रकार करण थापर के गोधरा दंगों पर सवाल पूछने से खफा हो 5 मिनट के भीतर ही उठ कर चल दिए.
बीबीसी पर इंटरव्यू के दौरान करण थापर के ही सवालों से तंग आकर तामिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता भी उठ कर जा चुकी हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो तब हद ही कर दी जब वो सीएनएन-आईबीएन के एक शो के दौरान तमतमाते हुए उठ कर चल दीं यह आरोप लगाते हुए कि ऑडिएंस में बैठे हुए विद्यार्थी माओवादी हैं.
आखिर क्या चाहते हैं ये नेता कि पत्रकार उनके राजनीतिक स्ट्रैटजी का हिस्सा बन जाए, अपने आंख, कान बंद कर लें और वही बातें लिखें और दिखाएं जो ये चाहते हैं?
पत्रकार सवाल निजी कारणों से नहीं बल्कि लोगों के लिए पूछते हैं. क्या जनता के प्रतिनिधियों का सवालों का सामना करने से इंकार करना जनता के विरोध में नहीं है ?
संविधान में कई ऐसी बाते हैं जो लोकतंत्र को राजतंत्र से बिल्कुल दूर करता है पर राजनीतिक पार्टियों ने इसकी अनदेखी कर बार-बार गल्तियां कीं हैं. लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को चुने हुए सांसद चुनते हैं पर अब अमरीका की तर्ज पर सीधे प्रधानमंत्री पद का उम्मीद्वार बना दिया जा रहा है. ऐसे में नेता अगर जनता के सवालों से बचने लगे तो फिर राजा और प्रजा के नुमाइंदों में फर्क क्या रहा जाएगा? कांग्रेस का हाईकमान और बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार राजतंत्र का अपभ्रंश ही होग़ा.
लेखक प्रकाश कुमार एबीपी न्यूज के एडिटर (बिहार) हैं. उनका यह लिखा एबीपी न्यूज की वेबसाइट से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.






