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दिल्ली

मोहन सिंह के निधन से समाजवादी पार्टी से ‘समाजवाद’ की अर्थी निकल गई

Vikas Mishra : 'जिस घर में अंधे रहते हों, वहां एक लाठी का होना बहुत जरूरी है।' ये डॉयलाग है फिल्म शराबी का। आज समाजवादी पार्टी के नेता मोहन सिंह के निधन पर बरबस ये डॉयलाग याद आ गया। पहले जनेश्वर मिश्रा गए, फिर मोहन सिंह। अब तो समाजवादी पार्टी से 'समाजवाद' की अर्थी ही निकल गई। (आजतक न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से)

Vikas Mishra : 'जिस घर में अंधे रहते हों, वहां एक लाठी का होना बहुत जरूरी है।' ये डॉयलाग है फिल्म शराबी का। आज समाजवादी पार्टी के नेता मोहन सिंह के निधन पर बरबस ये डॉयलाग याद आ गया। पहले जनेश्वर मिश्रा गए, फिर मोहन सिंह। अब तो समाजवादी पार्टी से 'समाजवाद' की अर्थी ही निकल गई। (आजतक न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से)

Chanchal Bhu : 'मोहन सिंह नहीं रहे' अगर यह खबर सही है तो गलत होना चाहिए था. क्योंकि अब उनकी ज्यादा जरूरत थी. मैं दिल्ली में था. रास्ते में था. अमर उजाला से मनोज जे का फोन आया- आप मोहन सिंह पर एक छोटा सा संस्मरण दे दीजिए. मैं आशंकित हुआ हुआ- क्या हुआ, मोहन जी ठीक तो हैं? उन्होंने बताया हाँ अभी तक तो ठीक हैं पर हालत बहुत ठीक नहीं है. मैंने कहा कि आप अपना ईमेल दे दीजिए, मैं भेज देता हूँ. लौट कर आया तो एक वाकया भेज दिया, पर मन उचाट रहा. थोड़ी देर में शेष नारायण ने सन्देश भेजा- 'मोहन सिंह नहीं रहे'. मन उदास हो गया. तीस पैंतीस साल के रिश्ते. संघर्ष की जिंदगी. सड़क की लाठी. जेल की यात्राएं. एक बारगी दिमाग में एक सवाल उठा, 'मोहन जी के साथ उस पीढ़ी का अंत हो रहा है जो समतामूलक समाज बनाने के लिए हर पल लड़ते रहे? कई नाम जेहन में घूमे. देबूदा (देवब्रत मजुमदार), जनेश्वर मिश्रा, मार्कंडे सिंह ….अब मोहन सिंह …अनेक और नाम जो गुमनामी में चले गए. लेकिन फिर मन को बाँधना पड़ा. नहीं, अभी इस लौ को नहीं बुझने देना है. अगली पीढ़ी आ रही है. आश्वस्त हूँ.

मोहन सिंह से हमारी पहली मुलाक़ात १९६९ में हुई. और तब से लेकर आज तक हम हम जब भी मिलते उसी आत्मीयता से. अभी कुछ दिन पहले की बात है. एयरपोर्ट पर मिल गए. हम भी लखनऊ से दिल्ली आ रहे थे. मिलते ही उन्होंने पूछा- कांग्रेस ने कुछ दिया (कुछ का मतलब कोई पद, ओहदा). हमने कहा, हाँ, उसने हमें चुनाव लड़वाया….'  हम दोनों जोर से ठहाका लगाकर हँसे. चुनाव की एक अंतर्कथा है जिससे वे वाकिफ थे. हुआ यह कि पूर्व राज्यपाल मधुकर दिघे की बेटी की शादी में भाग लेने हम पुने गए थे. मैं और राज बब्बर एक ही कमरे में रुके थे. दोपहर में राज ने बताया कि मुलायम जी आ रहे हैं और सीधे यहीं पहुचेंगे और रात में वापस दिल्ली चले जायेंगे. थोड़ी देर बाद मुलायम जी आये. हम तीनों ने साथ दोपहर का खाना खाया और बतियाने लगे. राज ने हमें इशारा किया- अपने बारे में भी बात कर लो. हमने मुलायम जी से कहा- मैं चुनाव लडूंगा. मुलायम जी ने बड़ी संजीदगी से कहा- अमर सिंह से बात कर लो. यह बात हमें चुभ गयी. हमने कुछ तल्खी में मुलायम जी को बड़ी बेरुखी से कहा- अगर समाजवाद का फैसला अमर सिंह जैसे ही करेंगे तो इससे बेहतर है हम अब अपनी डगर खुद बनाएँ.' भाई मोहन को यह किस्सा याद था. जिस पर हम दोनों हँसे. आज मोहन जी के न रहने की खबर ने उदास किया है. इस उदासी में युवजन आंदोलन के कई पन्ने उड़ रहे हैं. हर पन्ने पर जिन नामों का जिक्र है उनमें मोहन सिंह पहली कतार में हैं. यह सच है कि आज समाजवादी पार्टी का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. जनेश्वर जी के बाद यह आख़िरी नाम था जिसे समाजवादी पार्टी सामने रखकर समाजवादी वजूद का हलफनामा दाखिल करती थी. यह संकट गहरा रहा है. मोहन जी! प्रणाम. (कांग्रेस के नेता चंचल के फेसबुक वॉल से)

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