यशवंत जी, बड़े संस्थानों में काम को लेकर अक्सर आपस में मतभेद चलते रहते हैं. यह एक प्रक्रिया है. इससे बचा भी नहीं जा सकता है. कई बार काम के दबाव-तनाव या ठीक ढंग से काम न होने के चलते सीनियर या प्रशासनिक लोग अपने जूनियरों पर नाराज भी होते हैं. कभी-कभी यह नाराजगी सामने वाले को अच्छी नहीं लगती है. तमाम संस्थानों से आंतरिक बातें आती हैं, कुछ सही होती हैं, कुछ सही नहीं भी होती हैं.
अगर किसी संस्थान की आंतरिक बात लिखी जा रही है तो कम से कम पत्रकार होने के नाते पत्रकारिता के बेसिक चीजों का तो ख्याल रखना ही चाहिए. जो पत्रकारिता के मानदंड हैं, नियम-कानून हैं उनका पालन तो होना ही चाहिए, नहीं तो मामला बिल्कुल एक पक्षीय हो जाता है, जो पत्रकारिता के लिहाज से सही नहीं होता है. मुझे आपके द्वारा लिखे गए खबर के प्रकरण में कोई दोष नजर नहीं आता, पर कम से कम आपको जिसने आरोप लगाया या शिकायत की थी, और जिस पर आरोप लगा था, उससे बात तो करनी चाहिए थी, उसका पक्ष भी सुनना चाहिए था.
प्रत्येक आर्गेनाइजेशन में बास का डांट चलता रहता है, कभी-कभी तो काम को लेकर सुबह से शाम तक डांट पड़ती रहती है. कई समझाने के लहजे में डांटा जाता है तो कई बार यह थोड़ी ज्यादा हो जाती है. हम लोग भी इस स्थिति से गुजरे हैं, पर किसी के चरित्र हनन पर नहीं उतरे. और पत्रकारीय समझ तो यही कहती है कि जिस पर आरोप लगा हो और जिसने आरोप लगाया हो दोनों की बातें सामने आनी चाहिए, पर आपके यहां खबरों के प्रकाशन में इन बातों को ध्यान में नहीं रखा गया है, जो मेरे लिहाज से उचित नहीं है.
जाहिर है जिसे भूख लगेगी वो तो कहेगा या शिकायत करेगा, पर इस भूख या भूखे रखे जाने के कारणों के पीछे की सच्चाई भी तो सामने आनी चाहिए. हम भी काम करते हैं, बहुत लोगों से मतभेद होते रहते हैं, हर किसी को हम न तो समझ सकते हैं और ना ही समझा सकते हैं, परन्तु मतभेद का मतलब तो यह नहीं होना चाहिए कि एकपक्षीय आरोप लगाकर उसके चरित्र की हत्या कर दी जाए. हमे अपने पर लगे आरोपों से कोई आपत्ति नहीं है, पर आपको मुझसे या जिसके बारे में कहा गया है उससे बात तो करनी ही चाहिए थी. इससे खबर की विश्वसनीयता भी बढ़ती और पत्रकारीय मानक भी पूरा होता.
निर्मलेंदु
हमवतन






