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यशवंत की गिरफ्तारी उसके जज़्बे को नहीं तोड़ सकती

नयी दिल्ली-एक समय जब यशवंत सिंह ने दैनिक जागरण छोड़ कर दिल्ली में भड़ास ब्लॉग शुरू किया तो किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि यह ब्लॉग आने वाले समय में इतना लोकप्रिय और विश्वसनीय होगा। फिर जल्द ही वह भड़ास4मीडिया ले आये, जिसने पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया, बहुत कम समय में ही भड़ास4मीडिया से हजारों की संख्या में पाठक और लेखक जुड़ गए।

नयी दिल्ली-एक समय जब यशवंत सिंह ने दैनिक जागरण छोड़ कर दिल्ली में भड़ास ब्लॉग शुरू किया तो किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि यह ब्लॉग आने वाले समय में इतना लोकप्रिय और विश्वसनीय होगा। फिर जल्द ही वह भड़ास4मीडिया ले आये, जिसने पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया, बहुत कम समय में ही भड़ास4मीडिया से हजारों की संख्या में पाठक और लेखक जुड़ गए।

यशवंत ने न्यू मीडिया की बढ़ती ताक़त का बखूबी इहसास कराया। मीडिया से जुड़ी हर छोटी बड़ी खबर को भड़ास पर ला कर, उन्होंने अपने मज़बूत नेटवर्क की भी शक्ति हम सब के सामने रखी। मीडिया के साथ साथ आम ख़बरों पर भी यशवंत का कटाक्ष लगातार जारी रहा। मैंने १३ वर्ष के अपने छोटे से पत्रकारिता के सफ़र में यशवंत को बड़ी प्रखरता से अपनी बात रखते हुए कई बार देखा और सुना है। यशवंत से जब भी मेरा सामना हुआ, मैंने उन्हें उनके प्रयासों की प्रशंसा करने के साथ ही उन्हें थोड़ा सतर्क रहने की भी सलाह मीठे स्वरों में दी, पर यशवंत सिंह एक निर्भीक पत्रकार के तौर पर ऐसे मशवरों को हलके में लेते रहे और मुस्कराते चेहरे से अपने मन से किसी भी प्रकार के डर को निकालते हुए लगातार आगे बढ़ते चले। अब मुझे यह अफ़सोस है कि काश वह थोड़ा संभल कर पत्रकारिता करते तो आज यह नौबत देखने को नहीं मिलती।

अपनी वेब पत्रकारिता के ज़रिये यशवंत ने जहाँ हज़ारों लोगों की तारीफें बटोरी वहीँ अपने लिए कुछ दुश्मन भी पैदा कर लिए, जो नहीं चाहते के उनकी काली करतूतों का किसी भी तरह से पर्दाफाश हो। मगर एक जुझारू पत्रकार के तौर पर यशवंत बिना किसी द्वेष एवं पक्षपात के लगातार ऐसे लोगों के चेहरे पर से नकाब उतारने का काम करते रहे, जिसका भुगतान आज उन्हें जेल की चारदीवारी के पीछे पहुँच कर कर पड़ रहा है, लेकिन इस घटना ने यशवंत की न्यू मीडिया की पत्रकारिता की बढ़ती हुई शक्ति को भी बखूबी साबित कर दिखाया।

ऐसे बुज़दिल लोगों को जब यशवंत की पत्रकारिता की कोई काट नहीं सूझी तो उन लोगों ने यशवंत पर बेतुके इलज़ाम लगा कर उसको जेल भिजवा दिया। मैं एक पत्रकार होने के बावजूद भी इस बात को बहुत अफ़सोस के साथ कहने को मजबूर हूँ कि आज की पत्रकारिता के दौर में लोग पत्रकार कम और दलाल ज्यादा नज़र आते हैं। ऐसे लोग कभी अपने बॉस को खुश करने में लगे होते हैं तो कभी अपनी पत्रकारिता का धौंस जमा कर दलालों से घिरे दिखाई देते हैं। पत्रकारिता तो उनके लिए बस नाम मात्र ही रह गयी है।

ऐसे पत्रकार भले ही कितने ऊँचे स्थान पर बैठे हों, उनका मश्घला हर किसी को पता होता है। कहीं अच्छा होता कि ऐसे स्वम्भू बड़े पत्रकार अपने अच्छे कर्मों से युवा पत्रकारों के लिए मार्गदर्शक बनते। मगर ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा, और ऐसे समय में यशवंत जिसने न्यू मीडिया की पत्रकारिता को एक नयी दिशा, नयी शक्ति और नयी पहचान दिलाई उसको झूठे मामलो में फंसा कर कुछ लोग अपने बड़े पत्रकार होने का दम भर रहे हैं। आशा है कि यशवंत सिंह जल्द ही निर्दोष साबित हो कर फिर हमारे बीच में होंगे और एक नयी शक्ति के साथ अपनी पत्रकारिता के सफ़र को आसमान की ऊँचाई तक ले जाने में सफल होंगे। यह दुखद घटना यशवंत के मज़बूत इरादों और उसके पाक-साफ़ जज्बों को किसी भी कीमत पर नहीं तोड़ सकती।

लेखक सैयद असदर अली दिल्‍ली के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.


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