आज भड़ास के चार साल पूरे हो चुके हैं लेकिन जितने अल्प समय में भड़ास4मीडिया ने नाम कमाया हैं, मैं समझता हूँ किसी भी पोर्न वेबसाइट के द्वारा उतना नाम नहीं कमाया जा सकता. चूंकि एक पुरानी कहावत हैं कि दाग तो चाँद में भी हैं. हम तो केवल इंसान हैं उसी तर्ज पर कुछ यशवंत सिंह भी हैं. कहते हैं कि आरोप तो कृष्ण पर भी लगे हैं. वह तो भगवान थे तो फिर यशवंत तो सिर्फ एक इंसान हैं, सो आरोप लगना लाजिमी है. आज हम बात करते हैं जेल की. जेल को समाज घृणित नज़रों से देखता हैं, लेकिन हम शायद यह नहीं सोचते कि जेल में हमारे इष्ट कृष्ण ने जन्म पाया हैं तो फिर जेल गलत कहाँ हैं. इसी तरह से बात शराब की तो अब तक शराब मुस्लिम समाज में हराम थी लेकिन उपयोग मुस्लिमों में सबसे ज्यादा है.
भारत के अन्दर एक समाचार पत्र समूह हैं. जिसका नाम इंडियन एक्सप्रेस हैं. बताते हैं कि अभी इंडियन एक्सप्रेस ऐसा समूह था जो कि सरकारें खा जाया करता था लेकिन हाल में ही सेना के एक मामले में इस समाचार पत्र समूह की भी जमकर किरकिरी हुयी. दांत निपोरकर घिघियाई हंसी हंसने वाले प्रभु चावला विश्वसनीय पत्रकारों में गिने जाते थे, इसलिए वह आजतक में सीधी बात चलाते थे, लेकिन टूजी स्कैम घोटाला उन्हें खा गया और शायद अब उन्हें पूछने वाला और सही मायने में कहा जाये तो सूंघने वाला कहीं नज़र नहीं आ रहा हैं.
बरखा दत्त की विश्वसनीयता भी ख़तम हो चुकी हैं. इसका जीता जागता उदाहरण यह है कि मीडिया का ही एक छात्र बरखा दत्त के खिलाफ एक कार्यक्रम में खुलकर हमला बोल चुका हैं. टूजी स्कैम की खबर भड़ास से ही साभार लेकर चौथी दुनिया ने 'बड़े पत्रकार बड़े दलाल' के नाम से प्रकाशित की थी. और अगर देखा जाये तो आज मीडिया उस वेश्या की तरह बिक चुका है, जिसमें कुछ पल के लिए वह अपना सर्वस्व अपने साथ हम बिस्तर होने वाले को दे देती है. आज जब मीडिया २४ घंटे बिकने के लिए तैयार हैं. तो ऐसे दौर में यशवंत पर आरोप लगाना मेरे हिसाब से जायज नहीं होगा क्योंकि एक वेबसाइट को आज के महंगाई के दौर में चलाना आसान नहीं हैं. यही कारण है कि यशवंत मेरी नज़र में उसी तरह से बेदाग़ हैं जिस तरह से चाँद में दाग होने के बाद भी वह बेदाग़ दिखकर अपनी चाँदनी बिखेरता नज़र आता हैं.
चूंकि एक वेबसाइट को चलाने में तमाम तरह की समस्याएं आती हैं और धन का इंतजामात करना पड़ता हैं, उस हिसाब से यशवंत बेदाग़ नज़र आ रहे हैं. आज पत्रकारिता इस कदर सस्ती हो चुकी है कि वह यूपी की पुलिस की तरह एक शराब के क्वार्टर में बिकने के लिए तैयार है. उस दौर में चार साल बड़े-बड़े संपादकों से पंगा लेकर भड़ास को चलाना वाकई काबिले तारीफ़ हैं. आज यशवंत जी ने इस भड़ास के माध्यम से जितने दोस्त बनाये हैं मैं समझता हूँ उस से कहीं अधिक दुश्मन भी उन्होंने बनाये हैं. कोई उन्हें अमर उजाला का भगोड़ा कहता हैं तो कोई कुछ और, लेकिन जब किसी की खबर लग जाती हैं, तब वह इसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाकर यह कह डालता है कि भड़ास तो भड़ास हैं इसका कोई सरोकार नहीं हैं. लेकिन मेरे मायने में भड़ास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक उचित माध्यम हैं, जो कि मजदूरों से भी कम वेतन पर काम करने वाले पत्रकारों के शोषण की आवाज को उठाने का एक बेहतरीन मंच है. हाँ एक बात तो मैं यह कहना भूल गया कि अगर देखा जाये तो इन सब बड़े पत्रकार रुपी दलालों से यशवंत भाई महान हैं, जबकि उनके पास इन संपादकों की तरह अर्जित की गयी अकूत संपत्ति नहीं हैं.
लेखक अभिषेक सिंह आगरा के निवासी हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.
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