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यशवंत को संघर्ष से ही मिली है शक्ति और समर्थन

भड़ास ब्‍लॉग से शुरुआत कर भड़ास4मीडिया तक के सफर में इसके संस्थापक-संचालक यशवंत सिंह ने सच्चाई सामने लाने के जिस ध्येय और संकल्प को लेकर अविचलित और सतत संघर्ष किया है, उसी से उन्हें शक्ति और भड़ास को व्यापक समर्थन मिला है। व्यक्ति हो या संस्था, चुनौतियों से ही चमक मिलती है। कम से कम भारतीय संदर्भ में, खासकर हिन्दी में न्यू मीडिया का ठोस आधार और मजबूत भूमिका बनाने में यशवंत के भड़ास के अवदान को भुलाया नहीं जा सकेगा।

भड़ास ब्‍लॉग से शुरुआत कर भड़ास4मीडिया तक के सफर में इसके संस्थापक-संचालक यशवंत सिंह ने सच्चाई सामने लाने के जिस ध्येय और संकल्प को लेकर अविचलित और सतत संघर्ष किया है, उसी से उन्हें शक्ति और भड़ास को व्यापक समर्थन मिला है। व्यक्ति हो या संस्था, चुनौतियों से ही चमक मिलती है। कम से कम भारतीय संदर्भ में, खासकर हिन्दी में न्यू मीडिया का ठोस आधार और मजबूत भूमिका बनाने में यशवंत के भड़ास के अवदान को भुलाया नहीं जा सकेगा।

परदे में रहकर षड्यंत्र करने और चालें चलने वालों को यशवंत की प्रखरता अगर चुभती रही है और भड़ास4मीडिया के बगैर लाग-लपेट वाले बेबाक अंदाज से उन्हें बेचैनी होती रही है, भय लगता रहा है तो यही स्वाभाविक है, इसमें आश्चर्य लगने जैसा कुछ नहीं है। भेडिय़ाधसान में शामिल होने के बजाय धारा के विपरीत तैरकर हर कदम पर औचित्य को टोकने और एक जिद के साथ दुस्साहस के आखिरी छोर पर जाकर बड़े से बड़े तोपची लोगों को भी उनकी गलतियों के लिए सवालों के घेरे में खड़ा कर देने की आदत ने यशवंत और भड़ास4मीडिया को व्यापक समर्थन की जो ताकत दी है, उसके आगे किसी षड्यंत्र के जरिए यशवंत और भड़ास को न पराभूत किया जा सकता है और न पीछे धकेला जा सकता है।

यशवंत ने संस्कृत के उस प्रसिद्ध नीति कथन सच बोलो-प्रिय बोलो… को आधा ही अपनाया है, …अप्रिय सच मत बोलो के कायल नहीं रहे हैं यशवंत। भड़ास4मीडिया ने बहुतेरे अप्रिय सच उजागर करके अपने ढेर सारे विपक्षी और संभवत: दुश्मन भी बना लिए हैं। राडिया टेप को धारावाहिक रूप से जारी करना, निर्मल बाबा के विभिन्न चैनलों द्वारा प्रायोजित करोड़ों के किरपा-बाजार के सच को कई किस्तों में लगातार उजागर करना तो खैर अभी हाल-फिलहाल के उदाहरण हैं, कारपोरेटी करप्शन के बहुतेरे प्रसंग भी भड़ास4मीडिया के माध्यम से सामने आते रहे हैं। मीडिया के भीतर की गड़बडिय़ां, विभिन्न संस्थानों में पत्रकारों पर ज्यादती, उनके उत्पीडऩ और शासन-प्रशासन व पुलिस द्वारा पत्रकार-अखबार ही नहीं, आम नागरिक के हक पर हमला करने के खिलाफ भी यशवंत और भड़ास4मीडिया ने अनेक बार मोर्चा खोलकर पुरजोर मुहिम चलाई है।

इसलिए किन्हीं की एफआईआर पर जिस तत्परता से पुलिस ने बिना यशवंत का पक्ष जाने-सुने कार्रवाई की, वह बहुत समझ में आनेवाली बात नहीं लगती। यह भी हो सकता है कि एफआईआर दर्ज कराने वाले सिर्फ मोहरे हों और इसके पीछे किन्हीं और लोगों का हाथ हो- कोई साजिश हो। बहरहाल, यशवंत ने स्वयं अपने लिए जो राह चुनी है, वह लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए और मानवाधिकारों के लिए भी जरूरी और इन्हें ताकत देनेवाली है। मुझे यकीन है कि जेल के सीखचों से बाहर आकर यशवंत सिंह पूरी शिद्दत से और शायद ज्यादा हौसले के साथ अपने काम में लग जाएंगे।  

लेखक प्रो. निशीथ राय लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट के चेयरमैन हैं.


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