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यशवंत हिजड़ों के लिए अपना जीवन व्‍यर्थ गंवा रहे हैं!

यशवंत सिंह को फंसाने की खबर पढऩे के बाद से मैं असमंजस की स्थिति में हूं। मैं समझ ही नहीं पा रहा कि क्या करूं? कभी मन कहता है कि धरना-प्रदर्शन कर हाय-हाय या मुर्दाबाद-मुर्दाबाद कर दो, तो कभी मन कहता है कि हथियार रूपी कलम से ही काम चलाओ, इस सबके बीच यह भी सोच रहा हूं कि गलती करने वाले इंसान को गलती का अहसास करा दिया जाये, तो वह मान लेता है, लेकिन जो जानबूझ कर गलती करता है, उसे तो पता ही है कि वह गलती कर रहा है, ऐसे व्यक्ति को गलती का अहसास कराने में अपनी ऊर्जा का क्षय करना ही है। यही बात यशवंत को फंसाने के मामले में लागू होती है, क्योंकि यशवंत को सुनियोजित तरीके से फंसाया गया है, तो किसी भी तरह के आंदोलन का या लिखने का पुलिस या शासन पर क्या असर पड़ेगा?

यशवंत सिंह को फंसाने की खबर पढऩे के बाद से मैं असमंजस की स्थिति में हूं। मैं समझ ही नहीं पा रहा कि क्या करूं? कभी मन कहता है कि धरना-प्रदर्शन कर हाय-हाय या मुर्दाबाद-मुर्दाबाद कर दो, तो कभी मन कहता है कि हथियार रूपी कलम से ही काम चलाओ, इस सबके बीच यह भी सोच रहा हूं कि गलती करने वाले इंसान को गलती का अहसास करा दिया जाये, तो वह मान लेता है, लेकिन जो जानबूझ कर गलती करता है, उसे तो पता ही है कि वह गलती कर रहा है, ऐसे व्यक्ति को गलती का अहसास कराने में अपनी ऊर्जा का क्षय करना ही है। यही बात यशवंत को फंसाने के मामले में लागू होती है, क्योंकि यशवंत को सुनियोजित तरीके से फंसाया गया है, तो किसी भी तरह के आंदोलन का या लिखने का पुलिस या शासन पर क्या असर पड़ेगा?

अधिकांश सही मामलों में दोषी कभी नहीं पकड़ा जाता, क्योंकि योजनाबद्ध तरीके से इंसान चारों दिशाओं में देख कर सतर्कता से कार्य करता है। ऐसे व्यक्ति को कानून तो क्या पड़ोसी तक को हवा नहीं लगती कि वह क्या कर रहा है, लेकिन शक्तिशाली लोगों से पंगा लेने पर बिना कुछ किये ही व्यक्ति को कई बार कानून के मकड़जाल में फांस लिया जाता है। चूंकि सुनियोजित ढंग से फांसा जाता है, इसलिए कानून का असर पूरा का पूरा होता है, जिसमें अचानक फंसने वाला व्यक्ति फडफ़ड़ा कर मूर्छित होने की दशा में पहुंच जाता है। दु:ख फंसने का नहीं, बल्कि खुद के निष्क्रिय होने का होता है, क्योंकि व्यक्ति सक्रिय होता, तो उसे कोई फंसा ही नहीं सकता था।

यशवंत के प्रकरण में यह तो साफ हो ही गया है कि उन्हें कानूनी शिकंजे में फांसा गया है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता भी बनेगा, साथ ही इस प्रकरण से यह भी साफ हो गया है कि यशवंत नपुंसकों के लिए लड़ रहे थे, क्योंकि हिंदुस्तान में उनके जितने फैन हैं, उनमें आधे भी यशवंत के पक्ष में खुल कर बोलने/लिखने लगें, तो सरकारें हिल जायेंगी, फंसाने वाले बिल में छिपे नजर आयेंगे और खुद ही बयान देंगे कि यशवंत ने कुछ नहीं किया। फिलहाल यशवंत के साथ जो खुल कर खड़े हैं, उन्हें ही मैं साहसी मानता हूं, बाकी सब हिजड़े हैं, क्योंकि यशवंत के साथ खड़े होने का यही एक समय है, अन्यथा यशवंत को भी लगेगा कि वह अपना जीवन इन हिजड़ों के लिए व्यर्थ ही गंवा रहे हैं। चालीस-पचास हजार रुपये की नौकरी कर के यशवंत भी परिवार के साथ खुशहाल जिंदगी गुजार सकते हैं।

खैर, गुलामी की जंजीरों में जकड़े मतलब प्रिंट/इलेक्ट्रानिक मीडिया संस्थानों में नौकरी करने वालों से किसी तरह के साथ की आशा इसलिए भी नहीं करनी चाहिए कि उनमें साहस होता, तो नाम छुपा कर और यशवंत के कंधे पर बंदूक रख कर क्यूं चला रहे होते? फिलहाल मैं अपनी बात कहता हूं। मैं हर तरह से यशवंत के साथ हूं और मुझे आज भी यह प्रचंड विश्वास है कि यशवंत चरित्रहीन या रंगदारी वसूलने वाला गुंडा नहीं, बल्कि इतिहास रचने वाला महापुरुष है और इतिहास रचने वाले को सूली पर लटकाने की परंपरा रही है, इसलिए जेल से बाहर आने के बाद यशवंत को सूली पर लटकने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

लेखक बीपी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. इनसे संपर्क 8979019871 के जरिए किया जा सकता है.


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