इस वर्ष की दो बड़ी विशेषताएं रही हैं। पहला, जनता की सामूहिक चेतना में व्यापक बदलाव जो कि आने वाले दिनों में काफी सकारात्मक भूमिका निभाएगा और दूसरा वर्ष के उत्तरार्ध में सरकार की लगातार गिरती साख। साख गिरने का कुछ कारण तो कुछ घटनाओं को लेकर था लेकिन जो बची-कुची इज़्जत थी वह सरकार के अदूरदर्शी नेताओं ने गलत संदेश देकर ख़त्म कर दी।
खाद्य सुरक्षा बिल 64 वर्ष के शासनकाल का शायद सबसे बड़ा जनोपयोगी कानून बनने जा रहा है। बल्कि यूं कहें कि समूचे विश्व में सीधी डिलीवरी का इतना बड़ा कोई प्रयास नहीं हुआ है। लेकिन यू.पी.ए सरकार और इसके “समझदार मैनेजरों” में सरकार के अच्छे कार्यों का भी श्रेय लेने की समझ नहीं है। यह बिल भी संसद में ठीक उसी दिन लाया गया जिस दिन विवादास्पद लोकपाल बिल सदन के पटल पर रखा गया लिहाज़ा मीडिया में और संपूर्ण देश में लोकपाल बिल पर जम कर चर्चा हुयी। खाद्य सुरक्षा बिल जिसमें कि एक रुपए से तीन रुपए तक या रियायती दरों पर लगभग 70 करोड़ लोगों को अनाज देने की सरकारी प्रतिबद्धता थी, चर्चा में नहीं रही। यू.पी.ए-2 के अब तक के शासनकाल में शीर्ष पर बैठे लोगों में राजनीतिक सूझ-बूझ की बेहद कमी नज़र आती है। विश्वास नहीं होता कि यह वही कांग्रेस का नेतृत्व है जिसे कई दशकों तक शासन चलाने का अनुभव रहा है।
उदाहरण के तौर पर सत्ता में बैठे लोग लगातार जनभावनाओं को समझने में चूक करते रहे, भ्रष्टाचार के खिलाफ उभरे जनांदोलन को भांप नहीं पाए और प्रारम्भ से ही एक “एडवरसेरियल”(विरोधात्मक भाव) अख़्तियार कर लिया। पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटाले में कलमाड़ी को बचाने की कवायद करते रहे। दूसरी ओर जब टूजी स्पेक्ट्रम के राज़ का पर्दाफाश सी.ए.जी नाम की एक बहुत ही विश्वसनीय संस्था के द्वारा किया गया तब प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक और कपिल सिब्बल से लेकर दिग्विजय सिंह तक सभी ने उस संस्था की निंदा करनी शुरू कर दी, उनके अधिकारों को ही चुनौती दे डाली। हौसला यहां तक बढ़ा कि सुप्रीम कोर्ट में एटॉर्नी जनरल ने कह डाला कि सर्वोच्च अदालत अपनी सीमा में रहे। कुल मिलाकर जो भ्रष्टाचार की बात करे वह सरकार के ख़िलाफ।
इस बीच अन्ना हज़ारे आते हैं, एक विश्वसनीय गांधीवादी व अराजनीतिक चेहरे के रूप में जनता के लिए, सरकार को यह रास नहीं आया। जिन रामदेव का सजदा करने के लिए सरकार के चार बड़े मंत्री एयरपोर्ट पहुंचे थे उन्हीं की चौकड़ी ने पलटी मारी और अन्ना को जेल भेज दिया। सोच में निरंतरता न होने का ही दोष था कि रामदेव को पहले सजदा करते हैं और उन्हीं रामदेव को धरना स्थल से उठा फेंकने के लिए पुलिस भेजते हैं।
दरअसल समस्या जनभावनाओं को न समझने वाले नेताओं की है। “जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई” चिदंबरम, कपिल सिब्बल से मनमोहन सिंह तक दरअसल कभी भी उस नीचे के वर्ग की भावनाओं, तकलीफों व अपेक्षाओं से बाबस्ता नहीं रहे हैं। इनकी योग्यता अंग्रेज़ी बोलकर दूसरे के तर्कवाक्यों को काटने से अधिक कुछ नहीं रही है लिहाज़ा उनके हाथ में नीति-निर्धारण दिया जाना ही अपने-आप में एक जोखिम भरा फैसला था। नतीज़ा यह हुआ कि सरकार जाने-अनजाने में ही जनभावनाओं से दूर होती गयी और अंत में यह भाव वहां तक पहुंच गया कि जो भ्रष्टाचार उन्मूलन आंदोलन व अन्ना के साथ, वह सरकार का दुश्मन।
अगर गहराई से विश्लेषण करें तब पाएंगे कि मनरेगा अभी तक सीधी डिलीवरी का, जिसमें कि सरकार सीधे रोज़गार का सृजन करके पैसा ग्रामीण बेरोज़गारों को देती है, एक बेहद जनोपयोगी योजना रही है। लेकिन भ्रष्ट राज्य सरकारों के हाथ इसका क्रियान्वयन न होने की वजह से अपयश भी केंद्र सरकार के खाते में चला गया। सूचना का अधिकार जनसशक्तिकरण का एक क्रांतिकारी कदम है लेकिन सरकार में बैठे अंग्रेज़ीदान नेता इसे भी भुना नहीं पाए।
जहां भ्रष्टाचार को लेकर तापमान बढ़ता रहा वहीं महंगाई ने इस जनाक्रोश को और हवा दी। जिस सरकार के पास रिकॉर्ड 241 मिलियन टन अनाज़ पैदा हुआ हो, जिस सरकार के पास 65 मिलियन टन का खाद्यान्न रिज़र्व हो (जो कि समान्य से तीन गुना ज्यादा है) और जिस सरकार को अभावग्रस्त किसानों के आत्महत्या की खबरें लगातार आती रही हो, उस सरकार के कार्यकाल में महंगाई आसमान छू जाए, इसका सीधा मतलब था कि रायसीना शक्तिपीठ पर काबिज़ मनमोहन-चिदंबरम-कपिल सिब्बल की तिकड़ी को बदलते जनमत को समझने की क्षमता नहीं थी।
लोकपाल बिल को भी लेकर यही हुआ। प्रधानमंत्री अगर लोकपाल में शामिल हो जाते हैं तो कोई क़यामत-वरपा नहीं होगी लेकिन आज़ादी से ही नेहरू के आभामण्डल से प्रभावित कांग्रेसियों को यह बात गले नहीं उतरती कि प्रधानमंत्री की भी कोई जांच कर सकता है। लिहाज़ा 1968 से 1988 तक के पहले जो चार लोकपाल विधेयक आए उनमें प्रधानमंत्री को लोकपाल की जद में नहीं रखा गया। 1988 के बाद चार अन्य लोकपाल बिल गैर-कांग्रेसी सरकारों ने दिए और उन सभी में प्रधानमंत्री को शामिल किया गया। यह अलग बात है कि लोकपाल न तब पास हुआ न उसके बाद के चार बिलों में पास हुआ। कहने का मतलब, राजनीतिक वर्ग 43 साल से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ एक निर्णायक लड़ाई के मूड में कभी नहीं रहा।
आज भी सत्ता पक्ष और राजनीतिक वर्ग द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि क़ानून सड़क पर नहीं बनता। यह सही है कि क़ानून सड़क पर नहीं बनता लेकिन जनता के पास रास्ता क्या था? अगर क़ानून सड़क पर नहीं बनता तब क़ानून बनाने वाले को तो सड़क पर लाया जा सकता है। जनता वही करने की चेतावनी दे रही है। खाद्य सुरक्षा बिल देश में बढ़ती अमीरी-गरीबी की खांई को कुछ कम करने का एक बड़ा ज़रिया हो सकता है। भारत जैसे देश में जहां कि जितनी अमेरिका की पूरी आबादी है उतने लोग रोज़ शाम को भूखे सोते हैं, सस्ते दाम पर अनाज उपलब्ध कराना किसी भी सरकार की नेक-नियति को उसकी स्थायी राजनीतिक सुग्राह्यता के रूप में जनता में पेश किया जा सकता था लेकिन आज संदेश यह जा रहा है कि सोनिया न होतीं तब मनमोहन एण्ड कंपनी इस बिल को कभी पास ही न होने देती। क्या संभव है कि सोनिया के मैनेजर कम से कम पार्टी के इस गिरते ग्राफ को रोक सकें? 
लेखक एनके सिंह वरिष्ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्लॉग पोस्टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के दैनिक भास्कर में भी प्रकाशित हो चुका है.






