शंभूनाथ शुक्ल : कल की तरुण तेजपाल से संबंधित मेरी एक पोस्ट पर एक प्रतिष्ठित महिला कथाकार ने मेरे मेसेज बाक्स में आकर रोष जताया है। मैं उनके रोष को समझता हूं और इसीलिए मैने वह पोस्ट हटा भी ली थी। मेरा कहना है कि तरुण तेजपाल को सजा दो। पुलिस उनके साथ कतई नरमी न दिखाए कि वे एक बड़े पत्रकार हैं। जिसका जो दोष है उसका परिष्कार उसे करना ही पड़ेगा। यह भी अच्छा है कि शुरू में इसके लिए उन्होंने प्रायश्चित किया और दुख जताया। लेकिन मेरा यह जरूर कहना है कि फेसबुक पर यह तुलना नहीं की जाए कि आसाराम और तरुण तेजपाल समान हैं।
आसाराम का अतीत दागदार है। उन्हें धर्मगुरु बताना आध्यात्मिकता और धर्म दोनों का अपमान है। उन्होंने न तो किसी धर्म की नींव रखी न कोई सामाजिक शुचिता का पाठ पढ़ाया। वे हिंदू धर्म की किसी भी परंपरा से जुड़े साधु नहीं रहे हैं। उनका धार्मिक चोला उनके आपराधिक कृत्यों को छिपाने की ओट रहा है। अब सामने आ ही रहा है कि किस तरह उन्होंने जमीनें हड़पीं खासकर नदी किनारे की जमीनें ताकि हर बार नदी की धारा के बढऩे अथवा नदी द्वारा बलुअर जमीन छोड़े जाने की दशा में वे और जमीनें हड़प सकें। इसलिए आसाराम के पाप को कम करने के लिए तरुण के पाप को खामखाँ में बढ़ा-चढ़ा कर नहीं दिखाया जाए। यह काम पुलिस का है और पुलिस अगर तरुण को दोषी मानती है तो कड़ी से कड़ी दफाएं लगाकर उन्हें कोर्ट को सौंपे।
पर एक बात का जवाब देना ही पड़ेगा कि अगर एक समुदाय को लगता है कि तरुण के पीछे राजनीति की जा रही है तो उसकी जांच कराई जाए। अल्पसंख्यकों की मांग और उनकी भावना की अनदेखी कभी भी उचित नहीं। राजनीतिकों को भी यह सफाई देनी ही पड़ेगी।
कई अखबारों में संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.
Shahnawaz Malik : यह पहली बार हो रहा है कि संपादक के फंसने पर पूरे संस्थान को घेरा जा रहा है। लेकिन याद रहे कि तहलका ने इससे भी बड़ा हमला भी झेला है। हुक्मरानों की हुक्का पानी बंद करने की तमाम कोशिशों के बावजूद तहलका तब भी डटा रहा। और जब लौटा तो गुजरात समेत कई बड़े स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया। संस्थान और वहां जमे पत्रकारों पर हो रहे शर्मनाक हमले लंपटों की गीदड़ भभकी हैं। आप डटे रहें। शुभकामनायें और समर्थन।
युवा व तेजतर्रार पत्रकार शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से.






