दिल्ली और देहरादून के राजनैतिक गलियारों में एक बार फिर यह सुगबुगाहट चल पड़ी है कि उत्तराखण्ड में विजय की भ्रष्ट सरकार के कारनामों तथा निकाय चुनावों में करारी पराजय से परेशान कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश की बागडोर किसी दूसरे सक्षम व्यक्ति को सौंपने का मन बना लिया है। आगामी लोकसभा चुनाव-2014 को दृष्टिगत रखते हुए यह एक तरह से उसकी मजबूरी भी है; क्योंकि उक्त चुनावी वैतरणी को पार करना उसके अपने अस्तित्व के लिए कितना आवश्यक है, यह जगजाहिर है।
अब जबकि उत्तराखण्ड में सत्ता परिवर्तन अवश्यंभावी हो गया है तो अपने पहाड़ विरोधी रवैये के चलते यहां के विकास में सदैव एक प्रकार से बाधक बनने के लिए कुख्यात और पूरे पहाड़ी समुदाय में ‘अंडा तिवारी’ के तौर पर बदनाम नारायण दत्त तिवारी अपने राजनीतिक अज्ञातवास से अचानक यहां की सत्ता के रंगमंच पर प्रगट होने को आतुर हैं। बल्कि इसे यों कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा कि वह हरीश रावत की राह में एक बार फिर रोड़ा बन कर खड़े होने जा रहे हैं। इसके लिए बहुत उच्चस्तरीय रणनीति तैयार हो चुकी है। पिछले दिनों दिल्ली में सोनिया गांधी से हुई उनकी मुलाकात को मीडिया मैनेजमेंट में अव्वल तिवारी खेमे द्वारा बड़ी सफाई से यह प्रचारित किया जाने लगा है कि सोनिया ने तिवारी से एक बार फिर उत्तराखण्ड की बागडोर संभालने का आग्रह किया है।
अब तिवारी के सलाहकार और मीडिया में बैठे इन घाघ लोगों से पूछा जाना चाहिए कि जिस तिवारी ने उत्तराखण्ड में अपने मुख्यमंत्रित्व काल में कांग्रेस संगठन तथा यहां के लोगों के लिए एकदम अनजान अपने चहेतों को रेवड़ियों की तरह लाल बत्तियां बांटीं, उससे यहां के आमजन को क्या लाभ हुआ? बल्कि लाल बत्तियों की मुक्त-हस्त से की गई उस लुटाई में तिवारी इतने बदनाम हुए कि 24 साल की एक छोकरी ने देहरादून में मीडिया के सामने खुद को लाल बत्ती से नवाजे जाने की पृष्ठभूमि का खुलासा कर इन महाशय की ऐसी पोल खोल दी थी कि अगला अगर शर्मदार आदमी होता तो चुल्लू भर पानी में डूब मरता। इस खुली लूट ने न केवल पार्टी संगठन को नुकसान पहंचाया, बल्कि उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार के मामलों के साथ ही यह भी एक कारण बन गया था, अगले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का।
इसके बाद उत्तर प्रदेश की तरह उत्तराखण्ड में भी काग्रेस का बेड़ा गर्क कर तिवारी ने आंध्र प्रदेश की गवर्नरी पाने में कामयाबी हासिल तो कर ली परन्तु वहां जो गुल इन्होंने खिलाये, उसका नतीजा भी बड़ी जल्दी सबके सामने आ गया। तिवारी को उनकी काली करतूतों के कारण हैदराबाद के राजभवन से निकाल बाहर किया गया। इसके लिए आंध्र के लोग बधाई के पात्र हैं; क्योंकि जो कुकर्म वर्षों से उत्तरी भारत में किया जा रहा था, उसे दक्षिण के इस राज्य की स्वाभिमानी जनता ने कतई सहन नहीं किया और वहां के राजभवन में हो रहे उस पापाचार को सबके सामने लाकर तिवारी की शराफत का पर्दाफाश कर दिया।
रसिकजनों के बीच अपनी रासलीलाओं के लिए चर्चित रहे नारायणदत्त तिवारी के लिए तो यहां तक कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में उनके मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा जिला होगा जिसमें उनकी एक-दो प्रेमिकाएं न हों। पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रो. शेरसिंह की पुत्री उज्ज्वला शर्मा से पैदा हुए तिवारी के पुत्र रोहित शेखर को अपने पैतृत्व का मामला सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाना पड़ा था, यह कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं है। उत्तराखण्ड में भी तिवारी का पिछला कार्यकाल बेहद चर्चित रहा। स्टैला डेविड कांड लोगों को अभी तक याद है, जिसके चलते इनके वर्षों पुराने एक निजी सचिव को संदिग्ध परिस्थितियों में बाथरूम में मृत अवस्था में पाया गया था और जिसे तिवारी के मीडिया प्रबंधन-कौशन ने तब दबा दिया था।
अब अगर 87 साल के एक चरित्रहीन व्यक्ति, जिस पर पत्नी के जीवित रहते दूसरी महिलाओं के साथ अवैध सम्बंध रखने की बात सार्वजनिक हो चुकी हो, और जो आज न तो अपने आप से उठ सकता हो, न बैठ सकता हो और न ही चल-फिर सकता हो, को कांग्रेसी शीर्ष नेतृत्व उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनाता है, तो यह बेशर्मी की हद ही कही जायेगी। ऐसे निर्लज्ज और सत्ता-लोलुप नेताओं के कारण ही तो देश तथा समाज का बेड़ा गर्क हो गया है। ऐसे लोगों को सत्ता से दूर रखने में ही सबकी भलाई है। और फिर उत्तराखण्ड में नारायणदत्त तिवारी को उनके चन्द चमचों और सत्ता के दलालों के अलावा पूरा पहाड़ी समुदाय कतई पसन्द नहीं करता है। अब भला ऐसे व्यक्ति को बतौर मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड की जनता पर दुबारा कैसे थोपा जा सकेगा।
इस पर्वतीय प्रदेश के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी केवल उसे ही सौंपी जा सकती है, जिसमें सांगठनिक क्षमता के अलावा एक जन-नेता की तरह उसकी साफ-सुथरी छवि भी हो। लोकप्रियता एक अतिरिक्त पैमाना हो सकता है, जिसकी उत्तराखण्ड के वर्तमान दौर के कांग्रेसी नेताओं में लगभग अभाव दिखाई देता है। फिर भी अगर पार्टी हाइ-कमान ने विवेक तथा दूरदर्शिता से काम लिया तो एक ही चेहरा यहां के सभी कांग्रेसी नेताओं में अब तक के रिकॉर्ड के हिसाब से जो अव्वल दिखाई देता है, वह है-हरीश रावत। वैसे भी प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर आज कांग्रेसी खेमे में दूसरा ऐसा कोई मोहरा नहीं है जो उनके पासंग के बराबर भी बैठता हो। कहने को तो अपने तौर पर बड़े-बडे़ तुर्रम खां यहां भरे पड़े हैं लेकिन जनता और पार्टी को उनसे कोई फायदा नहीं।
यदि देखा जाये तो राज्य गठन के समय और उससे भी पहले इस पर्वतीय क्षेत्र में रसातल में जा चुकी कांग्रेस को सत्ता के शीर्ष पर बैठाने वाले अकेले हरीश रावत ही थे, यह शायद पार्टी हाई-कमान भूला नहीं होगा। अपने लोकसभा चुनाव क्षेत्र अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से बड़ी सफाई से निर्वासित किये जाने के बावजूद उन्होंने जिस तरह हरिद्वार जैसे एकदम नये और दूरस्थ क्षेत्र में भी चुनाव जीत कर दिखाया, उससे न केवल उनके विरोधियों के हौसले पस्त हो गये, बल्कि उनका राजनैतिक कद भी काफी ऊँचा हो गया। उत्तराखण्ड की कांग्रेसी राजनीति में अब तक कम-से-कम दो ऐसे अवसर आ चुके हैं, जब यहां की सत्ता की बागडोर उनके हाथों से (एक प्रकार से छीन कर) केवल जातीय आधार पर दूसरों को थमा दी गयी। दोनों बार कांग्रेस नेतृत्व के फैसलों से यहां के आमजन को बेहद निराशा हुई।
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल जो पीछे छूट जाता है, वह यह कि समस्या किसी रावत, किसी तिवारी या कांग्रेस, भाजपा अथवा किसी दूसरे का हर्गिज नहीं है। प्रश्न है उततराखण्ड के आमजन, जल, जंगल और जमीन का। जिसके लिए यहां के लोगों ने वर्षों तक जनांदोलन चलाया और शहादतें दीं। सन् 1939 से राज्य बनने तक न जाने कितनी बार लोगों ने बड़े-बड़े कष्ट इसके लिए उठाये, मगर पृथक राज्य बनने के बावजूद ‘मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की’। आज पहाड़ का आम आदमी अपने को ठगा-सा महसूस करता है। इसकी परवाह देहरादून से लेकर दिल्ली तक किसी को नहीं है। है क्या?
श्याम सिंह रावत
हल्द्वानी (नैनीताल)






