1999 की बात है…संसद का मानसून सत्र चल रहा था…अचानक एक दिन दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो के सभी लोगों को निर्देश मिला कि वे आइएनएस बिल्डिंग के दफ्तर की बजाय गोलमार्केट के क्लासिक हाउस वाले दफ्तर में दस बजे मिलें। सूचना ये भी थी कि दैनिक भास्कर के निदेशक गिरीश अग्रवाल सबसे मिलकर कोई जरूरी सूचना देंगे। तब इन पंक्तियों का लेखक भी दिल्ली ब्यूरो में संवाददाता के तौर पर कार्यरत था। नियत वक्त पर दफ्तर में पहुंचे ब्यूरो के संवाददाताओं से गिरीश अग्रवाल ने परिचय दाढ़ी वाली एक शख्सियत से कराया।
वे रवींद्र शाह थे…दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो के नए संपादक। उसके पहले दिल्ली ब्यूरो की जिम्मेदारी शरद द्विवेदी के जिम्मे थी। जैसा कि अक्सर होता है…बदलाव के वक्त रवींद्र शाह कुछ लोगों को भले लगे और कुछ के लिए बहुत अक्खड़ और बदतमीज। संपादक बनते ही रवींद्र शाह ने सबसे पहला फरमान ये सुनाया कि सब लोग ब्यूरो में दस बजे आएं…क्योंकि मीटिंग तभी होगी। इसके पहले तक लोगों को ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे दफ्तर आने की आदत थी। रवींद्र शाह ने दूसरा फरमान सुनाया- सबके वीकली ऑफ फिलहाल खत्म। सवाल उठे तो जवाब था- अब तक दिल्ली ब्यूरो काम नहीं कर रहा था। अब काम करेगा। अगले दिन उनका एक नया फरमान, दिल्ली ब्यूरो राजनीतिक खबरें छोड़कर ऑफ बीट स्टोरी करे।
राजनीति कवर करने की आदत विकसित कर चुके ब्यूरो के पत्रकारों के लिए ये परेशानी भरा फैसला था। लेकिन झक मारकर सबको वही करना पड़ा, जो रवींद्र शाह एसाइन करते। लोग गुस्साते…उनकी आलोचना करते…लेकिन काम करना ही पड़ता। इस तरह उनके बारे में एक धारणा विकसित होती जा रही थी कि उन्हें पत्रकारिता की समझ नहीं है, वे बदतमीज हैं और वे राजनीतिक ब्यूरो को गड़बड़ करने आए हैं।
रवींद्र शाह के नहीं रहने के बाद जाड़े का वह दिन याद आता है, जब उनसे अपनी पहली भिड़ंत हुई थी। इस खाकसार की बड़ी बेटी तब घुटनों के बल चलती थी। एक दिन वह बाथरूम में घुस गई और पानी अपने उपर गिरा लिया। इससे वह बुरी तरह बीमार पड़ गई। उसकी परिचर्या में रात भर जागना पड़ा और मैं भी बीमार पड़ गया। तब आज की तरह न तो अपने पास फोन होता था न ही उतने पैसे। घर से नियत वक्त पर दफ्तर के लिए निकला। लेकिन युसूफ सराय जाते-जाते नहीं लगा कि दफ्तर में सही-सलामत रह पाएंगे। बुखार और दर्द बढ़ता जा रहा है। युसूफ सराय में उतर कर एक फोन बूथ से उन्हें फोन मिलाया और छुट्टी मांगी। उन्होंने छुट्टी देने से इनकार कर दिया। तब इतना गुस्सा आया कि गुस्से में ही मैं गोल मार्केट के दफ्तर पहुंच गया। दफ्तर में अपनी सीट पर जाकर इस्तीफा लिखा और रवींद्र शाह के कमरे में जाकर उनके मेज पर दे मारा।
अचानक हुए इस कागजी हमले को पहले तो उन्होंने भौंचक्क होकर देखा और फिर मुझ पर चिल्ला पड़े- अभी आप बाहर जाइए। लेकिन आप घर मत जाना। बुखार से तप रही हालत में मेरा गुस्सा और बढ़ गया। मेरा जवाब था कि अब मैं भास्कर का गुलाम नहीं रहा, लिहाजा मैं जा सकता हूं। लेकिन उन्होंने जाने नहीं दिया। फिर उन्होंने राजाराम यादव को बुलाया। राजा राम यादव आज भी दैनिक भास्कर में सेवा संपादक हैं। उन्हें पैसे देकर उन्होंने क्रोसीन की गोली, कोल्ड ड्रिंक और पारले जी का एक पैकेट मंगवाया। फिर मुझे अपने कमरे में बुलाया। कमरे में पहुंचा तो उन्होंने मेज पर इंडिया टुडे के तब के अंक का वह पेज खोल रखा था, जिसमें मेरा लिखी एक समीक्षा छपी थी। मेरे अंदर जाने के बाद उन्होंने मुझे बैठने को कहा। बिस्किट बढ़ाया और क्रोसीन दिया। फिर बोले – यार इंडिया टुडे में तुम्हारी समीक्षा पढ़ रहा था। कमाल का लिखते हो, लेकिन टेम्परामेंट तुम्हारा बेहद खराब है। ऐसा कैसे चलेगा।
मैंने भी जवाब दिया कि बुखार से तपता आदमी और क्या कर सकता है। खैर…उन्होंने मेरा इस्तीफा टुकड़ों में फाड़कर डस्टबिन के हवाले किया और छुट्टी पर भेज दिया। इसके बाद मेरे लिए रवींद्र शाह बदल गए थे। चौंकाना उनकी फितरत में शामिल था। कई बार दफ्तर जाते तो उनका फरमान होता, अभी खबर लिखकर दो। अखबार में 11 बजे खबर लिखने का चलन नहीं तो कोफ्त होती। खबर लिख देते तो बोलते घर जाओ और ठीक तीन या चार बजे बस स्टैंड पर मिलना। इतने नंबर की कार आएगी और दो-तीन दिन के कपड़े लेकर बैठ जाना।
2000 के गुजरात के सूखे की कवरेज के लिए कच्छ में एक हफ्ते के लिए मुझे उन्होंने इसी अंदाज में भेजा था। उनके राज में बाहर जाकर जितना रिपोर्टिंग का मौका मिला, उतना दोबारा नहीं मिल पाया। अगर देश को देखने की मेरी थोड़ी-बहुत समझ बनी तो उनके दिए मौके भी मेरे लिए बड़ी वजह रहे। अचानक उनकी मौत की खबर सुनकर अब एक-एक सीन याद आ रहे हैं। तब से लेकर अब तक मेरा उनसे गहरा संबंध बना रहा। ना सिर्फ संबंध, बल्कि भरोसा भी बना रहा। शायद यही वजह है कि जब सहारा का राजस्थान चैनल लांच हो रहा था, तब उन्होंने सबसे प्रमुख सहयोगी के तौर पर मुझे ही चुना था। हालांकि कतिपय कारणों से उनके साथ दोबारा काम करने का मौका नहीं मिल पाया।
अभी पिछले ही हफ्ते हमने उन्हें अपने स्टूडियो में बुलाया था। ग्रुप चर्चा में हिस्सा लेने से पहले मुझ पर गुस्सा गए –‘यार तुमने मेरी आउटलुक में फलां स्टोरी पढ़ी?’ फिर जवाब की परवाह किए बिना बोल पड़े- ‘कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।’ मेरे वे संपादक तो 2000 की शुरूआत में ही नहीं रहे। लेकिन आखिर तक उसी लहजे में हड़काते रहे और मैं उन्हें पहले वाले अंदाज में ही लेता रहा। मिलते ही प्यार भरी डांट जैसे उनकी मेरे लिए पहचान थी। दिल्ली-नोएडा में वे अकेले ही रहते थे। लेकिन जब कभी उनके घर जाना होता था, खुद फलों का नाश्ता बनाते और चाय के साथ पेश करते। आउटलुक में आने के बाद से उनकी जिंदगी में ठहराव आ गया था। अब वे एक बार फिर कुछ नया करने की तैयारी में थे। लेकिन शायद वक्त को ये मंजूर नहीं था।
उमेश चतुर्वेदी





