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यादें (3) : वो जमाना जब दूध सस्ता और मनोरंजन महंगा था!

कभी इलेक्ट्रॉनिक्स चीजें ‘स्टेट्स सिम्बल’ हुआ करती थीं, जिन्हें पाने के लिए हर कोई तरसता था.आज ये सबकी जरूरत बन गई हैं. अधिकतर मिडिल क्लास के पास कलर टीवी, डीवीडी, लैपटॉप, मोबाइल, डीटीएच…, कहें तो सारी आधुनिक गैजेट्स उपलब्ध हैं. बस नहीं है…तो इनका लुत्फ़ उठाने के लिए किसी के पास फालतू समय. हम वैसे वक्त में जी रहे हैं, जिसमें तकनीकी सामान जुटाना किसी के भी बाएं हांथ का खेल है. पर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ करने में सबको कठिन जद्दोजहद करनी पड़ रही है. पैसे खर्चने के बावजूद भी ग्वाले का पानी मिला दूध व सब्जीवाले से, रसायनिक खाद की बदौलत उपजाई गई सब्जियां खरीदना मजबूरी है.

कभी इलेक्ट्रॉनिक्स चीजें ‘स्टेट्स सिम्बल’ हुआ करती थीं, जिन्हें पाने के लिए हर कोई तरसता था.आज ये सबकी जरूरत बन गई हैं. अधिकतर मिडिल क्लास के पास कलर टीवी, डीवीडी, लैपटॉप, मोबाइल, डीटीएच…, कहें तो सारी आधुनिक गैजेट्स उपलब्ध हैं. बस नहीं है…तो इनका लुत्फ़ उठाने के लिए किसी के पास फालतू समय. हम वैसे वक्त में जी रहे हैं, जिसमें तकनीकी सामान जुटाना किसी के भी बाएं हांथ का खेल है. पर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ करने में सबको कठिन जद्दोजहद करनी पड़ रही है. पैसे खर्चने के बावजूद भी ग्वाले का पानी मिला दूध व सब्जीवाले से, रसायनिक खाद की बदौलत उपजाई गई सब्जियां खरीदना मजबूरी है.

शुद्ध दही व घी तो जैसे एंटिक हो चले हैं. और ‘सिंथेटिक मिठाइयों’ के बिना तो, स्वीट्स कॉर्नर के आस्तित्व ही ख़त्म हो जाएंगे. हर गली-कूचे के मोड़ पर पिज्जा, चौमिन, बर्गर बेंचने वाले फ़ास्ट फ़ूड के स्टाल खुल गए हैं. लेकिन अपना जिया तो छांछ वाली ‘लस्सी’ व सोंधी महक भरी ‘दही’ को याद कर अभी भी ललचता है. साथ ही याद आते हैं बचपन के वो दिन, जब आज की तुलना में मामला बिल्कुल उल्टा था. जब मैंने होश संभाला 5 साल की उम्र रही होगी, सन 88 का वर्ष था. वह दौर जब उदारीकरण की सुगबुगाहट में उनींदा भारत ‘इंडिया’ बनने की और अग्रसर था. यानी ‘भारत’ व ‘शाइनिंग इंडिया’ के बीच का वक्त. तब मनोरंजन के तौर पर लोगों के पास सीमित विकल्प थे. भले ही जिला मुख्यालय या बड़े शहरों में में रहने वाले सिनेमा घरों में बड़े परदे पर फिल्मों का लुत्फ़ उठाते, लेकिन गांवों में थियेटर, सर्कस, लौंडा नाच व मेरठ के लुग्दी उपन्यास का बोलबाला था. कुछ शौक़ीन लोग प्रदीप, आज अखबार व सारिका, धर्मयुग, कादंबनी, सरिता, मनोहर कहानियां, माया, इंडिया टुडे, मायापुरी जैसी पत्रिकाएं मंगाया करते. बच्चों में नंदन, चंदा मामा, लोटपोट, बालहंस व कॉमिक्स की धूम थी (इसकी जिक्र यादें (4) में). हां, इतना जरूर था कि कंप्यूटर व संचार क्रांति के आ जाने से गांवों में भी इक्के-दुक्के कुलीन घरों में टेलीफ़ोन की पैठ हो चुकी थी. यहां 18 इंच वाला सनमाईका का ‘श्वेत-श्याम टेलीविजन’ व ‘यूएचएफ’ एंटीना जिसके पास होता, वह आला दर्जे का समझा जाता. जो कि बिजली नहीं रहने पर बैट्री से भी चलता था.

मेरे गांव में वर्ष 84 में ही बिजली आ गई थी. पर सनमाईका ब्रांड टीवी बाद के दिनों में घर में आया. मैं जब इसे देखने-समझने लायक हुआ तब ‘काका जी कहिन’, डॉ. राही मासूम राजा के उपन्यास पर आधारित ‘नीम का पेड़’, ‘द सोर्ड ऑफ़ टीपू सुल्तान’, ‘तलाश’, ‘व्योमकेश बक्षी’ जैसे धारावाहिक सबकी जुबान पर थे. उन्हीं दिनों नेपाल के दूरदर्शन ने ‘महाभारत’ का प्रसारण शुरू किया. चूंकि मेरा गांव नेपाल की सीमा से नजदीक है. सो यहां का एंटीना भी इस चैनल को  साफ़-साफ़ पकड़ता. दिन में राष्ट्रीय चैनल की तस्वीर की गुणवता काफी घटिया रहती. लेकिन नेपाली चैनल की गुणवता उम्दा होने बावजूद इस पर हिंदी का एक मात्र यहीं कार्यक्रम आता. ‘महाभारत’ देखने के लिए एंटीना को उतर दिशा में यानी नेपाल की तरफ घुमाना पड़ता. हर सप्ताह सोमवार की शाम 7 बजे नेपाल से ‘महाभारत’ का प्रसारण होता. बिजली गुल होने पर कार्यक्रम बाधित ना हो, इसके लिए बाजार से बैट्री चार्ज करा लाकर रखी  जाती. लोगों की संख्या बढ़ने से कमरा छोटा पड़ने लगा तो टीवी ओसारे पर रखा जाने लगा. इस कालजयी धारावाहिक की महिमा कुछ ऐसी फैली कि इसे देखने के लिए करीब 5 किलोमीटर दूर के गांव से भी लोग मेरे दरवाजे पर आने लगे. इस कारण टीवी दरवाजे से बाहर दुआरे पर आ गया. एक बड़ा सा तिड़पाल बिछाया जाता और पूरा दुआर दर्शकों से भर जाता. महिलाओं को आगे की पंक्ति में बिठाया जाता. इस दौरान श्रद्धा व भक्ति के आगोश में लोगों की अलौकिक एकता देखते ही बनती. वे नत-मस्तक होकर टीवी देखने में लीन हो जाते. धारावाहिक में  पात्रों का इतना सजीव चित्रण था कि दोनों हाथ जोड़े कुछ महिलाएं, कभी-कभी भावुक दृश्यों को देख भाव-विह्वल हो आंखों से आंसू भी टपकाने लगतीं.

गांव में मवेशी पालना किसान अनिवार्य कर्तव्य मन जाता है. दादा ने भी दरवाजे पर दो-दो भैंस पाल रखे थे. इस लिहाज से कि एक दूध देना बंद कर देती तो दूसरी वाली ब्याती. इस तरह घर में दूध, दही व घी भरपूर मात्रा में मिलते. दादी मिट्टी के चूल्हे पर कड़ाही में दूध खौला कर पझाने लिए छोड़ देतीं. थोड़ी देर बाद ही उसमें मोटी छाली पड़ जाती. फिर एक बड़े ग्लास में छाली के साथ दूध भरके मुझे पीने को मिलता. उपले की मद्दिम आंच पर नदिया (हांड़ी) में मीठा दही जमाने की कला कोई दादी से सीखे. क्या सोंधी गंध रहती थी, अकेले ही चूड़े के साथ कोई भी एक-आध किलो दही गटक जाए! दादी सालों भर दही से निकलने वाली छाली को एक बर्तन में इकठ्ठा करती रहतीं. फिर ‘रही’ से मथकर उसमें से मक्खन निकालतीं. मक्खन को जब चूल्हे की आग पर खौला कर ठंडा किया जाता तो घी बन जाता. मक्खन गर्म करने के दौरान कड़ाही में पपड़ी जम जाती, जिसे हमलोग दाढ़ कहते. कमाल का स्वाद रहता इसका, घर के सारे बच्चे चटखारे लेकर खाते. दादा पुराने ख्यालात की महिला थीं, सो लड़कियों से ज्यादा लड़कों के प्रति अनुराग रखतीं. वह अक्सर कहां करतीं- ‘गाय के बछड़े व घर के बेटों को दूध पिलाना कभी भी नागा नहीं गुजरता.’ दरअसल इसके पीछे दादी की पारंपरिक सोच थी कि उक्त दोनों ही जीव कमाने वाले होते हैं, जिससे कि गृहस्थी चलती है. दादा ने चारा काटने, भैंसों को खिलाने व अन्य घरेलू कामों के लिए एक नौकर भी रखा था. लेकिन वे नौकर की बजाय खुद पर ज्यादा भरोसा करते थे. कभी-कभार अपने हाथों से ‘लेडीकट्टा मशीन’ से चारा काटने लगते और मैं डोंगे में पुआल व घास लगाता. मैं भी आंशिक रूप से मशीन चलाने में दादा का हाथ बंटा देता. मशीन क्या था बोले तो एक तरह से देहाती जिमखाना, जिस चलाते हुए शरीर का व्यायाम भी हो जाता.

दोपहर के बाद दादा भैसों को चराने के लिए नहर की तरफ ले जाते. वह कहते कि पशुओं को भी सरेह की सैर कराना जरूरी है. इसी बहाने भैंसे घूम-फिर कर लेती हैं व इन्हें खाने को ताजा घास भी मिल जाती है. जिसका सकारात्मक असर इनकी सेहत व दूध पर भी पड़ता है. मैं भी इसी फ़िराक में रहता कि कब दादा भैंस चराने निकले और मैं पीछे-पीछे हो लूं. मां को यह फूटे आंखों नहीं सुहाता था कि मैं गंवार लड़कों जैसा आंवारा घूमता फिरूं. इस बात पर गाहे-बगाहे मुझे डांट-फटकार तो कभी पिटाई भी मिल जाती. लेकिन वो कहते हैं ना कि- ‘जहां चाह होती है, वहां राह भी.’, आखिर मैं कहां मानने वाला था. एक आम देहाती बच्चे की तरह मुझे भी दादा से बेहद लगाव था. दूसरे, मैं चाहे लाख गलतियां कर लूं दादा अक्सर मेरी तरफदारी करने से बाज नहीं आते थे. मैं जैसे ही घर से भाग सरेह में पहुंचता, दादा मुझे भैंस के पीठ पर बैठा देते. भैस जब चरते हुए उबड़-खाबड़ रस्ते से गुजरती तो उसकी मांसल पीठ पर बैठे हुए काफी गुदगुदी होती. उस सुखद अनुभव को कलम से बयां करना नामुमकिन है. लिहाजा भैस की सवारी का यहीं तो आनंद था, जिसका लोभ संवार पाना मेरे लिए कठिन काम था. पर यह विडंबन ही है कि प्रकृति से किसी की ख़ुशी ज्यादा दिनों तक नहीं देखी जाती. कुछ ऐसा ही बुरा मेरे साथ भी हुआ. एक दिन भैंस पर सवार मैं अपनी धुन में मगन था कि उसे बगल की झाड़ियों में कुछ खुरखुराने की आवाज सुनाई दी. अब मुई भैंस ने आंव न देखा ताव और उछलते हुए भागने लगी. इसी चक्कर में उसके पगहा से मेरा हाथ छूट गया. मैं नीचे और भैंस का अगला पैर मेरे बदन पर. वो तो गनीमत था कि उसका पिछला पैर मेरे सीने पर नहीं पड़ा, वरना परलोक सिधारने में कोई हर्ज नहीं था. मामूली चोट व खरोच आने के साथ सही-सलामत बच गया, यहीं सोच भगवान को लाख-लाख बधाईयां दी. फिर तो दोनों कान पकड़ इस मटरगश्ती से तौबा ही कर ली.

समय अपनी रफ़्तार में भागता रहा. और वर्ष 91 में ‘रामायण’ धारावाहिक शुरू हुआ. तब तक देहात के भी अधिकांश घरों में टीवी आ चुका था. लेकिन रंगीन टीवी का ग्लैमर सबके सिर पर चढ़ा हुआ था, कई तरह की बातें सुनने को मिलतीं-  ‘क्या मजा आता है देखने में, सब कुछ असली दीखता है, साफ-साफ व रंगीन.’ मेरे पड़ोस के दादा  पुराने जमींदार थे …और काफी रईसाना मिजाज था उनका. वे जिंदगी को ऐशो-आराम से जीने में यकीन करते मतलब- ‘क्या लेकर आए हो, और क्या लेकर जाओगे.’ यह बात अलग थी कि ठाट-बाट को बरक़रार रखने में उनकी अच्छी-खासी जमीन बिक चुकी थी. सच बोलूं तो… उनकी माली हालत कुछ हद तक प्रेमचंद की ‘पर्दा’ कहानी वाली हो चली थी. उनके दो बेटे थे पर वे दोनों से अलग रहते. पत्नी से बेहद प्यार था उनको और इसी प्यार का वास्ता देकर ओनिडा कंपनी का कलर टीवी घर लाए. पूरे गांव में यह खबर फ़ैल गई. क्योंकि उस समय रंगीन टीवी खरीदना सबके वश की बात नहीं थी. पूरे 20 हजार रूपए खर्च करने पड़ते थे. मैं भी हमउम्र बच्चों के साथ रविवार को उनके घर ‘रामायण’ देखने चला जाता. एक दिन जाने क्या बात हुई कि वे दर्शकों की भीड़ से बेहद खफ़ा हो गए. बड़बड़ाते हुए बोलने लगे- ‘टीवी मैंने अपनी बीवी के लिए ख़रीदा है ना कि गांववालों के लिए.’ फिर उन्होंने बाबा आदम के जमाने की कठैया बंदूक निकाली और ऐसे ही चला दिए. हालांकि गोली भरवी थी और एक  कुत्तिया को जा लगी, बेचारी मौके पर ही बेमौत मारी गई. हम लोग तो वहां से ऐसे भागे कि घर आकर ही रुके.  

वर्ष 92 में डिश एंटीना की पहुंच से केबल चैनलों ने भी अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी. वीसीपी, वीसीआर, फ्रीज, वाशिंग मशीन आदि का वजूद महज शहरों तक ही सीमित था. गांव में लोग इन्हें विलासिता की चीजे समझा जाता. तब दूरदर्शन पर हर शनिवार व रविवार को फिल्में आती थीं, इसलिए हम लोगों को बेसब्री से इस दिन का इंतजार रहता. शादी-ब्याह या अन्य शुभ आयोजनों में मनोरंजन के तौर पर नई फिल्में देखने के लिए वीसीपी व रंगीन टीवी भाड़े पर लाया जाता.

जारी…

लेखक श्रीकांत सौरभ पूर्वी चंपारण से हैं. वे सरोकारी पत्रकारिता व रचनात्मक लेखन के पक्षधर हैं. यह आलेख उनके ब्लॉग 'मेघवाणी' से साभार है. उनसे मो. न. 9473361087 या www.facebook.com/srikant.saurav पर संपर्क कर सकते हैं.


पहला और दूसरा भाग समेत श्रीकांत सौरभ का लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- श्रीकांत सौरभ

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