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सुख-दुख...

युद्धस्व विगतज्वर: … निश्चिंत होकर युद्ध करो..

Yashwant Singh : काफी दिनों बाद कल वरिष्ठ पत्रकार कुमार संजॉय सिंह के यहां पहुंचा. काफी देर तक बैठा बतियाता रहा. गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित जनसत्ता अपार्टमेंट वाले उनके घर में. यहां घर के दरवाजे और भीतर दीवारों पर कई पठनीय चीजें टंगी मिलीं, यह बैनर भी. इसे देख-पढ़ कर काफी देर तक हैरान परेशान सोचता रहा, ये क्या लिखा है, क्यों लिखा है. खुद से बातें करता रहा. फिर लगा, सही कहा है आदरणीय श्रीकृष्ण जी ने.

Yashwant Singh : काफी दिनों बाद कल वरिष्ठ पत्रकार कुमार संजॉय सिंह के यहां पहुंचा. काफी देर तक बैठा बतियाता रहा. गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित जनसत्ता अपार्टमेंट वाले उनके घर में. यहां घर के दरवाजे और भीतर दीवारों पर कई पठनीय चीजें टंगी मिलीं, यह बैनर भी. इसे देख-पढ़ कर काफी देर तक हैरान परेशान सोचता रहा, ये क्या लिखा है, क्यों लिखा है. खुद से बातें करता रहा. फिर लगा, सही कहा है आदरणीय श्रीकृष्ण जी ने.

ज़िंदगी को संपूर्णता में तो वही जीता है जो भरपूर युद्ध करता है या भरपूर प्रेम करता है या भरपूर त्याग करता है या भरपूर शांति जीता है.. और, जो भी करो पूरी निश्चिंतता, तल्लीनता, संपूर्णता के साथ.. जब तक आप भरपूर युद्ध नहीं कर लेते, तब तक आप भरपूर शांति के सुख को समझ ही नहीं सखते. संभव है, युद्ध करते आप मारे जाएं. कोई फर्क नहीं. इस ब्रह्मांड में खासकर धरती पर स्थित चेतन तन मन वालों के नष्ट होने का कोई समय नहीं है. कहो बम गिरे, गैस लीक हो और लाखों हजारों मारे जाएं. कहो भूकंप आए, सुनामी आए, बाढ़ आए और लाखों मारे जाएं. तो, अगर खुद चुने गए युद्ध में निश्चिंत होकर लड़ते हुए मारे जाते हैं तो यह सुखद और शानदार मौत होगी. जी गए या जीत गए तो फिर भरपूर शांति जीने का गिफ्ट बाउचर लौटानी में मिलेगा. जीवन को वो क्या जानें जिनने पूरी जिंदगी जीने की कोशिश करने में गुजार दी और आज भी डर रहे हैं कि कहीं जीवन जाया न हो जाए… गीता पढ़ते हुए अर्जुन और श्रीकृष्ण संवाद को जितनी बार पढ़िए, उतनी बार नया अर्थ दे जाता है.

बचपन में गांव पर बाबा जब रोजाना नहाकर दोपहर का खाना खाने से पहले एक-एक घंटे गीता और रामायाण का स्वांतसुखाय पाठ किया करते थे तब हम बच्चे अगल-बगल बैठकर उनके बोले पढ़े गए का अर्थ धार्मिक भाव से ज्यादा लेते थे, सीखने-समझने या जीवन दर्शन मानने के रूप में कम. पर अब जब इन्हें पढ़ो तो लगता है कि ये जीवन दर्शन ज्यादा हैं, धार्मिक ग्रंथ कम. वो कहा भी गया है कि न कि जाकी रही भावना जैसी..

खैर… बात यहां कर रहा था वरिष्ठ पत्रकार कुमार संजॉय सिंह का जो इंडिया टुडे, एनडीटीवी आदि जगहों पर रह चुके हैं और फोकस व हमार टीवी के लांचिंग एडिटर इन चीफ रहे हैं. उनके हाथों किसिम किसिम के पराठे खाकर और उनकी ढेर सारी बातें सुनकर कल दिन बन गया.

कुमार संजॉय सिंह

कुमार संजॉय सिंह

काफी दिनों से संजॉय सर मेनस्ट्रीम मीडिया से बाहर अपनी घर-गृहस्थी के दुख-सुख में उलझे-तल्लीन हैं. उनका आह्वान भी मैंने किया कि.. का चुप साधि रहा बलवाना… पर वो आजकल की मीडिया के हालात से काफी दुखी और परेशान दिखे. कहने लगे, अब न पत्रकार हैं और न पत्रकारिता. सब मार्केटिंग वाले हो गए लगते हैं. मीडिया के मालिकान भी अब किसी सरोकार के कारण अखबार या चैनल नहीं ला रहे बल्कि उनके अपने निहित स्वार्थ हैं जिसे वो अपने एडिटर इन चीफ को मोहरा बनाकर पूरा करना चाहते हैं. ऐसे हालात में कुछ अपना ही शुरू करना ज्यादा उचित सही है.

उनके घर से जब लौटा तो मेरे मन-मस्तिष्क में जाने क्यों यही गूंजता रहा… युद्धस्व विगतज्वर: … निश्चिंत होकर युद्ध करो… युद्धस्व विगतज्वर: … निश्चिंत होकर युद्ध करो..

रात जब घर लौटकर सोने को हुआ तो यूं ही मन में कुछ लाइनें कुलबुलाने लगीं… सो, लिख लिया….

हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…
हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…

अक्सर यह जब खयाल आता है…
दिल-दिमाग में शोर बढ़ जाता है…

तब बार-बार खटकने लगता है… मन कहता… कोई गंभीर गड़बड़ जरूर है…
इसी कारण निहित स्वार्थी मनुष्य, और मनुष्य केंद्रित बड़बड़ चहुंओर है…
इससे आगे जब सोचने को जाता हूं तो जाने क्यों आध्यात्मिक हो जाता हूं…
जाने कितना कुछ है ब्रह्मांड में.. जाने कितना कुछ अनदेखा अबूझ है…
जितना सुलझाया है हमने सब कुछ, उतना ज्यादा उलझा यहां सब कुछ…
इतना बड़ा विशाल वृहत्तर महासमुद्र महाआकाश महान सृष्टि में चुपचाप…
घटता बढ़ता मथता हंसता गाता रोता जाता आता जाने कैसे कैसे पदचाप…
कोई ले जाए पकड़ कर आदम जात से दूर… अनजानों के पास बहुत दूर
जहां न हो कोई बात न हो कोई दिन रात ना ही कोई सुख-दुख और साथ…

अक्सर यह जब खयाल आता है…
दिल-दिमाग में शोर बढ़ जाता है…

हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…
हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


भड़ास तक अपनी बात [email protected] पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

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