: आज के दौर में डीडी मिश्र उर्फ देवेन्द्र दत्त मिश्र जैसा पुलिस अधिकारी बन पाना बहुत मुश्किल है : आज हम आपको दिखाते हैं एक लाजवाब फिल्म। नाम है शूल। मनोज बाजपेई इस फिल्म के हीरो हैं और रवीना टंडन हैं इसकी हिरोइन। यह दोनों इस फिल्म में पति-पत्नी हैं। लेकिन चौंकिये मत, इसमें बेडसीन नहीं है। दरअसल, यह फिल्म है अराजकता के खिलाफ एक पुलिसिये की जंग की, जो विधानसभा में उसके द्वारा एक विधायक की सरेआम हत्या पर खत्म होती है।
लेकिन पात्र भले ही बदल जाएं, कहानी तो लखनऊ से सौ फीसदी जुड़ती है। जी हां, आप शायद सही सोच रहे हैं। फिल्म का यह मामला लखनऊ में फायर सर्विसेज के डीआईजी और वरिष्ठ आईपीएस ऑफिसर डीडी मिश्र से तनिक जोड़ कर देखिये, साफ अहसास हो जाएगा कि यहां लगी पुलिसिया आग कितनी गंभीर है।
कोई बात नहीं, अगर आपने यह फिल्म नहीं देखी। हम आपको बताते हैं कि इस फिल्म में क्या है। समाज में फैली भयंकर गुंडागर्दी से जब एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर समर प्रताप सिंह अपनी छह साल की मासूम बेटी की जान से हाथ धो बैठता है। पिता उसे झुकने को तैयार करने के लिए उसे विधायक नेता के सामने हाथ गिड़गिड़ाता है जिसने उसे हत्या के एक मामले में बेगुनाह फंसा कर जेल भेजा होता है।
पिता की करतूत से झगड़ कर वह खुद की लड़ाई लड़ने निकलता है तो अपनी पत्नी का मरा चेहरा देखता है। मदद मांगने पुलिसवालों के पास जाता है तो वे बिके हुए निकलते हैं। बेहाल होकर वह बगावत पर निकलता है तो उसे अपने खुद के ही एक बेइमान साथी का कत्ल कर विधानसभा में जबरिया घुसना पड़ता है जहां वह अपराधी विधायक चिल्ल-पों कर रहा होता है। उस विधायक को समर वहीं गन-प्वाइंट पर लेकर अपनी बात सदन से भावुक अपील के बाद आखिरकार उस विधायक को गोली मार देता है। फिल्म इसके बाद कुछ नहीं बताती।
लेकिन बाद की कहानी अगर आप जानना चाहते हों तो यूपी आइये। यहां उसके बाद की ही नहीं, उससे छूटी कहानी भी आपको मिल जाएगी जो उस फिल्म में नहीं है। मसलन, बिहार के हालातों पर बनी इस फिल्म का यूपी से तारतम्य। सवाल और भी हैं, जघन्य अपराधी विधायक को विधानसभा में गोली मारने की हालत यूपी में क्यों नहीं है। क्या जघन्य अपराध केवल हत्या या सार्वजनिक अपराध के ही होते हैं या फिर सामाजिक और राजनीतिक-आर्थिक भी। क्या समर प्रताप सिंह की ही यह कहानी है, या यूपी में घर-घर की यह हालत है। अब ज्यादा जानकारी चाहें तो सीधे चले आइये डीडी मिश्र के मामले पर जिन्हें भ्रष्टाचार और पुलिस विभाग में फैली भ्रष्टाचार की प्राणघातक बीमारी का विरोध करने पर खुद को ही बीमार साबित कराने पर मजबूर होना पड़ा और चार दिनों तक वे गंभीर मानसिक रोगी बताकर दफ्तर से जबरिया मेडिकल कालेज के मनोरोग विभाग में भर्ती कराये गये और जब डॉक्टरों ने उन्हें रिहा किया तो सत्ता के मद में चूर यूपी सरकार और उसकी टोपी-अफसरशाही ने उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर लिया।
सन 92 में भारतीय पुलिस सेवा की यूपी शाखा में शामिल हुए थे देवेंद्र दत्त मिश्र। बेदाग दामन और कर्मठ पुलिस अफसर की छवि रखते हैं डीडी मिश्र। उनकी ईमानदारी की एक बानगी देखिये। रिवाज है कि एसपी के घर का खर्च थानेदार उठाते हैं, लेकिन मिश्र ने साग का एक पत्ता तक कुबूल नहीं किया। पारिवारिक समारोहों को सरकारी समारोह बनवाने की प्रथा के विरूद्ध मिश्र ने तो क्राइम मीटिंग में कड़े शब्दों में ऐलान किया था कि कोई भी थाना छोड़कर उनकी बेटी की शादी में नहीं आयेगा। सरकारी काम का प्रयोग सरकारी काम में ही किया, जरूरत पड़ी तो निजी काम के लिए बस या ट्रेन का सफर किया।
अब एक नजर उनकी कर्मठता पर। महाराजगंज में तैनाती के दौरान हुए सांप्रदायिक फसाद पर भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने ज्ञापन लेने के लिए कप्तान को मौके पर तलब करने की मांग की। लेकिन मिश्र नहीं माने, मजबूरन योगी को उनके आवास पर पहुंच कर ही ज्ञापन सौंपना पड़ा। उधर बांदा में तैनाती के दौरान उन्होंने बसपा के कद्दावर नेता दद्दू प्रसाद पर कार्रवाई की और मुकदमा तक दर्ज करा दिया। बड़ा हंगामा हुआ। सरकार ने जांच का जिम्मा आज के एडीजी एके जैन को सौंपा, लेकिन मामला रफादफा कर दिया गया। उस पर तुर्रा यह कि हमेशा ही बेदाग आंचल रखने वाले मिश्र को मायावती सरकार ने प्रतिकूल प्रविष्टि जरूर दे डाली। जबकि दद्दू प्रसाद माया-सरकार में मंत्री हैं। इस ईमानदार अफसर का हौसला तोड़ने के लिए इससे ज्यादा और क्या चाहिए था। इस अफसर ने सीधे माया-सरकार को ही भ्रष्ट करार दे दिया और एडीजी एके जैन को हरमिंदर सिंह नामक एक आईएएस अफसर का हत्यारा तक बता डाला। मिश्र ने कहा कि उसके विभाग में गाडियों की 16 करोड़ की खरीद में बेहिसाब बेइमानी हुई। इस बयान के फौरन बाद उन्हें किसी अपराधी की तरह दफ्तर से उठा कर पागलखाने भेज दिया गया। अब वे अपने ही घर पर नजरबंद हैं। उधर मिश्र पर गृह-विभाग के प्रमुख सचिव कुंवर फतेह बहादुर अनुशासनिक कार्यवाही की प्रक्रिया में जुटे हैं।
यूपी में पुलिस बेहद तनावों में है। चाहे वे चाटुकार हों, या बेधड़क। मायावती की सम्पत्ति की जांच कर रहे थे डीके राय जो कोर्ट के आदेशों के बाद भी तीन साल से सस्पेंड हैं। 91 बैचवाले दार्जिलिंग के दाबा शेरपा और 98 बैचवाले किरण जाधव तो यूपी में नौकरी ही नहीं करना चाहते, सो इस्तीफा दे चुके हैं। मगर सरकार ने जांच के नाम पर बरसों बाद बाद भी उस पर फैसला नहीं किया। 92 बैच के अमिताभ ठाकुर की प्रोन्नति का मामला सरकार लटकाये है। दो साल तक तो उन्हें वेतन तक नहीं दिया गया। जबकि पुलिस भर्ती घोटाले में फंसे कई अफसरों को क्लीनचिट देकर प्राइज पोस्टिंग दी जा चुकी है। अब भ्रष्टाचार पर मिश्र तमके तो सरकार ने उन्हें पागलखाना भेज दिया। यह इशारा ही तो है कि जो सच बोलेगा, वह पागल करार दिया जाएगा।
लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. नए लांच होने वाले न्यूज चैनल यूपी न्यूज के ब्यूरो चीफ हैं. उनका यह लिखा हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.






