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यूपी में बड़े नेताओं को हाशिये पर करके बीजेपी ने अपना नुकसान किया

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव अब कुछ हफ़्तों के अंदर हो जायेंगे. विधानसभा चुनाव के पहले के समीकरण इतनी तेज़ी से बदल रहे हैं कि किसी भी राजनीतिक समीक्षक के लिए नतीजों के बारे में इशारा कर पाना भी असंभव है. इसके बावजूद कुछ बातें बिलकुल तय हैं. मसलन सत्ताधारी पार्टी से नाराज़ लोगों की संख्या के बारे में कोई भी आकलन नहीं लगाया जा सकता. छः महीने पहले तक यह माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी सबसे मज़बूत पार्टी थी, आज इस बात को कहने वालों की संख्या में खासी कमी आई है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव अब कुछ हफ़्तों के अंदर हो जायेंगे. विधानसभा चुनाव के पहले के समीकरण इतनी तेज़ी से बदल रहे हैं कि किसी भी राजनीतिक समीक्षक के लिए नतीजों के बारे में इशारा कर पाना भी असंभव है. इसके बावजूद कुछ बातें बिलकुल तय हैं. मसलन सत्ताधारी पार्टी से नाराज़ लोगों की संख्या के बारे में कोई भी आकलन नहीं लगाया जा सकता. छः महीने पहले तक यह माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी सबसे मज़बूत पार्टी थी, आज इस बात को कहने वालों की संख्या में खासी कमी आई है.

जब अन्ना हजारे का रामलीला मैदान वाला कार्यक्रम चल रहा था और कलराज मिश्र और राजनाथ सिंह की उत्तर प्रदेश में यात्रायें चल रही थीं तो लगने लगा था कि बीजेपी का कार्यकर्ता भी चुनाव में सक्रिय रूप से तैयार है. उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र की बिरादरी वाले चुनाव की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं. लेकिन जब से बीजेपी ने राज्य के दिग्गजों को चुनाव मैदान में उतार कर उनकी औकात नापने की योजना बनायी है, बीजेपी के लोग निराश हैं. उनका कहना है कि जिन लोगों के कारण आज उत्तर प्रदेश में पार्टी के दुर्दशा हुई है उनको जनता दुबारा झेलने को तैयार नहीं है.

उधर कलराज मिश्र और राजनाथ सिंह के जो समर्थक अपने नेताओं की हनक बनाने के लिए सक्रिय नज़र आ रहे थे, अब ठंडे पड़ गए हैं. लगता है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ऐसी को योजना बना ली है कि बीजेपी के यूपी वाले नेताओं को जीरो कर के दोबारा पार्टी को मज़बूत बनाया जाये़गा.  हो सकता है इसका आगे चल कर लाभ भी हो लेकिन फिलहाल तो आज बीजेपी बिलकुल पिछड़ी नज़र आ रही है. बीजेपी आलाकमान का एक और फैसला भी ख़ासा मनोरंजक माना जा रहा है. उमा भारती को यूपी में सक्रिय करके पता नहीं बीजेपी वाले क्या हासिल करना चाहते हैं. लेकिन उनकी इस रणनीति के कारण यूपी के बीजेपी नेता और कार्यकर्ता बहुत निराश हैं. सुना है कि उमा भारती  राज्य की मुख्यमंत्री बनने की योजना भी बना रही है. जो भी हो, कुल मिलाकर हालात ऐसे बन गए हैं कि लगता है कि बीजेपी लड़ाई से बाहर हो गयी है.

कांग्रेस ने अजित सिंह को साथ लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ सीटें जीतने के प्लान पर काम शुरू कर दिया है. हो सकता है कि इसका फायदा कांग्रेस को मिल जाए. केंद्र सरकार का बैकवर्ड मुसलमानों को दिया गया साढ़े चार प्रतिशत का आरक्षण भी एक मज़बूत चुनावी नुस्खा है. लोकसभा २००९ में भी देखा गया था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलमान कांग्रेस की ओर खिंचे थे. अगर इस बार भी उन्हें लगा कि कांग्रेस बीजेपी को कमज़ोर करने में प्रभावी भूमिका निभाने जा रही है तो कांग्रेस के हाथ मुसलमानों के वोट आ सकते हैं.

ऐसी हालत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजित सिंह और कांग्रेस मिलकर बहुजन समाज पार्टी को असरदार चुनौती दे सकेंगे. राज्य के बँटवारे के बारे में विधानसभा में प्रस्ताव पास करवाकर मायावाती ने कोशिश की थी कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में अजित सिंह समेत सभी पार्टियों को कमज़ोर कर दें लेकिन केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने जिस सिलसिलेवार तरीके से मायावती के प्रस्ताव का जवाब भेजा है उसके बाद अखबार पढने वाले  लोगों की समझ में आ गया है कि मायावाती का इरादा चुनावी समीकरण बदलने का ही था और कुछ नहीं. वे केवल चुनावी नारा दे रही थीं. उनके प्रस्ताव में कोई दम नहीं था. ऐसी हालत में लगता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनको अजित सिंह और कांग्रेस के गठबंधन से ज़बरदस्त चुनौती मिलेगी.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक और दिलचस्प बात सामने आ रही है. वह यह कि मुलायम सिंह यादव भी इस इलाके में कुछ क्षेत्रों में बहुत ही प्रभावशाली नज़र आ रहे हैं, हालांकि पहले उनको यहाँ जीरो माना जा रहा था. ऐसा लगने लगा है कि कुछ इलाकों में वे मायावाती से नाराज़ वोटरों को अपनी तरफ खींच लेने में कामयाब हो जायेंगे. अगर ऐसा हुआ तो उनका कोर समर्थक मुसलमान उनका साथ  देने से कोई परहेज़ नहीं करेगा. कुल मिलाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आज की जो राजनीतिक हालत है उसमें लगता है कि मुसलमानों की मदद की ताक़त के कारण कांग्रेस-अजित सिंह और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार मायावती की पार्टी के उम्मीदवारों को धकियाने में सफल हो जायेंगे.

मध्य उत्तर प्रदेश में इस बार मुलायम सिंह यादव कोई भी चांस नहीं ले रहे हैं. उन्होंने यादव बहुल एटा में अपनी चुनावी सभाओं की शुरुआत की. उस चुनाव सभा के पहले और बाद में वहां आये लोगों से बात करने का मौक़ा मुझे मिला था. और ऐसी धारणा बनी थी कि हालांकि मुलायम सिंह की बहू फिरोजाबाद से चुनाव हार गयी थी लेकिन अब माहौल बदल गया है. पिछड़े और मुसलमान उनके साथ हैं जो उनकी पार्टी को उनके अपने इलाके में बढ़त दिलाने में सफल रहेंगे. यहाँ अजित सिंह का कोई प्रभाव नहीं है लेकिन कुछ इलाकों में कांग्रेस नज़र आ रही है लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अपने इलाके में मुलायम सिंह यादव मायावती की पार्टी को सीधी चुनौती देंगे. और शायद बहुत सारी सीटों पर बढ़त भी दर्ज करें. ज़ाहिर है कि जाट बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके में हुए घाटे को वे यहाँ बराबर कर लेंगे.

सरकार बनाने की असली शक्तिपरीक्षा अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश में होने वाली है.  इस इलाके में अमेठी और रायबरेली में तो कांग्रेस मज़बूत है हालांकि वहां भी हर सीट पर उनकी जीत पक्की नहीं है. बीजेपी बहुत कमज़ोर है लेकिन मायावती का पक्का वोट बैंक यहाँ ताक़तवर है. करीब तीन महीने पहले जब यह लगता था कि बीजेपी मजबूती से लड़ेगी तो जानकारों ने लगभग ऐलान कर दिया था कि  बीजेपी को हराने के लिए मुसलमान पूरी तरह से बहुजन समाज पार्टी के साथ चला जाएगा लेकिन अब ऐसा नहीं है. बीजेपी के बहुत कमज़ोर हो जाने का नतीजा यह है कि अब मुसलमान के पास कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में से किसी के भी साथ जाने का विकल्प मौजूद है. ज़ाहिर है कि यहाँ भी लड़ाई दिलचस्प हो गयी है. मायावती से नाराज़ वोटर के सामने भी अब समाजवादी पार्टी का मज़बूत विकल्प उपलब्ध है.

इसी क्षेत्र से मायावती ने बहुत सारे भ्रष्ट मंत्रियों और बाहुबली लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. जबकि उन्हीं लोगों की सीट के बल पर पिछली बार उन्हें स्पष्ट बहुमत मिला था. ज़ाहिर है कि वे लोग इस बार मायावती को हराने के लिए माहौल बनायेंगे.  हालांकि मायावाती को हरा पाना बहुत आसान नहीं है क्योंकि उनका कोर वोटर हर हाल में उनके साथ रहेगा. लेकिन इस बात में दो राय नहीं है कि उन्हें हराने के लिए मुलायम सिंह भी एडी चोटी का जोर लगा रहे हैं और पूरी संभावना है कि मायावती से नाराज़ वोटर उनके साथ चला जाए.

पूर्वी उत्तर प्रदेश की भी हालत सत्ताधारी पार्टी के लिए बहुत ठीक नहीं है. शुरू में कहा जा रहा था कि वहां बीजेपी मज़बूत पड़ेगी क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह, सूर्य प्रताप शाही, रमापति राम त्रिपाठी, मुरली मनोहर जोशी आदि बड़े नेताओं की कर्मभूमि है. लेकिन बीजेपी के अध्यक्ष नितिन गडकरी की नई योजना में यह सारे लोग हाशिये पर आ गए हैं और २०१२ विधानसभा चुनाव के पहले तो बीजेपी की हालत बहुत कमज़ोर दिख रही है. ऐसी हालत में मुलायम सिंह यादव फिर भारी पड़ सकते हैं.  लगता है कि जिन कारणों से २००७ में मायावती ने मुलायम सिंह को बेदखल किया था, उन्हीं कारणों से इस बार मुलायम सिंह यादव भी मायावती को कमज़ोर करने में सफल होंगे.

दिसंबर के आख़री हफ्ते में जो राजनीतिक तस्वीर उभर रही है उससे तो यही लगता है कि राज्य की राजनीतिक स्थिति ऐसी है जहां नेगेटिव वोट की खासी भूमिका रहेगी और जो भी अपने आप को मायावती के विकल्प के रूप में पेश करने में सफल हो जाएगा वही लखनऊ की गद्दी पर बैठ जाएगा. राज्य में कुछ वोट काटने वाली पार्टियां भी मैदान में हैं लेकिन लगता है कि जनता की जागरूकता में वृद्धि के मद्दे नज़र वोट काटने वाली पार्टियों की भूमिका भी बहुत कम रह जायेगी. यह अलग बात है कि कुछ उपचुनावों में पीस पार्टी जैसी कुछ छोटी पार्टियों ने अपनी ताक़त दिखायी थी.

लेखक शेष नारायण सिंह जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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