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यूपी में सपा और भाजपा के बीच घिनौना गठजोड़ हो चुका है : कमर वहीद नक़वी

Qamar Waheed Naqvi : उत्तर प्रदेश से अब तक जो भी ख़बरें सामने आयी हैं, उनसे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि वहाँ समाजवादी पार्टी और बीजेपी में घिनौना गँठजोड़ हो चुका है, ताकि 2014 के चुनाव में दोनों को फ़ायदा पहुँच सके. मुज़्फ़्फ़रनगर में जिस तैयारी के साथ और जितने सुनियोजित तरीक़े से दंगा भड़काया गया, जिस प्रकार एक फ़र्ज़ी वीडियो को गाँव-गाँव तक फैलने दिया गया, जिस प्रकार दोनों ओर के दंगाई तत्वों को लगातार आम लोगों को भड़काते रहने की छूट दी गयी, जिस प्रकार सरकार का पूरा तंत्र सब कुछ देखते हुए भी जानबूझ कर सब कुछ अनदेखा करता रहा, उसके बाद भी अगर किसी को समझ न आये कि दंगों की साज़िश के पीछे कौन है और यह साज़िश रचने का उद्देश्य क्या है, तो फिर ऐसी 'मासूमियत' पर क्या कहा जाय.

Qamar Waheed Naqvi : उत्तर प्रदेश से अब तक जो भी ख़बरें सामने आयी हैं, उनसे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि वहाँ समाजवादी पार्टी और बीजेपी में घिनौना गँठजोड़ हो चुका है, ताकि 2014 के चुनाव में दोनों को फ़ायदा पहुँच सके. मुज़्फ़्फ़रनगर में जिस तैयारी के साथ और जितने सुनियोजित तरीक़े से दंगा भड़काया गया, जिस प्रकार एक फ़र्ज़ी वीडियो को गाँव-गाँव तक फैलने दिया गया, जिस प्रकार दोनों ओर के दंगाई तत्वों को लगातार आम लोगों को भड़काते रहने की छूट दी गयी, जिस प्रकार सरकार का पूरा तंत्र सब कुछ देखते हुए भी जानबूझ कर सब कुछ अनदेखा करता रहा, उसके बाद भी अगर किसी को समझ न आये कि दंगों की साज़िश के पीछे कौन है और यह साज़िश रचने का उद्देश्य क्या है, तो फिर ऐसी 'मासूमियत' पर क्या कहा जाय.

1. क्या यह अकारण है कि सपा सरकार के एक साल के शासन में उत्तर प्रदेश में सौ से ज़्यादा छोटे-बड़े दंगे हो जाते हैं? जो उत्तर प्रदेश इतने दिनों से बिलकुल शान्त था, वहाँ अचानक दंगों की बाढ़ क्यों आ गयी? हो सकता है कि आपका जवाब हो कि यह अखिलेश सरकार की विफलता और निकम्मेपन के कारण हो रहा है. जी नहीं, यह एक डिज़ाइन के तहत हो रहा है. कैसे? अगला बिन्दु देखिए.

2. मुलायम सिंह यादव अचानक आडवाणी के गुण गाने लगते हैं, सुषमा स्वराज और आडवाणी को मुलायम अच्छे लगने लगते हैं! मुलायम संकेत देते हैं कि बीजेपी अगर साम्प्रदायिकता की राजनीति छोड़ दे तो उसे वह समर्थन दे सकते हैं! (यह बयान तो मीडिया के लिए था, इसकी असलियत आप भी समझते होंगे).

3. वरुण गाँधी के विरूद्ध कोई आरोप प्रमाणित नहीं होता. सारे सरकारी अफ़सर, पुलिसवाले और सारे गवाह अदालत में पलट जाते हैं, सारे सबूत रातोंरात ग़ायब हो जाते हैं!

4. 84 कोसी परिक्रमा की नूरा कुश्ती सौहार्दपूर्वक सम्पन्न हो जाती है.

5. प्रदेश के जिन इलाक़ों में बीस-पच्चीस साल से कोई तनाव नहीं हुआ था, वहाँ ख़ूनी दंगे होने लगते हैं.

6. लखनऊ में 17 साल बाद शिया-सुन्नी एक बार फिर एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाते हैं.

7. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश जानबूझ कर 'गोल टोपी' पहन कर मीडिया के सामने आते हैं और दंगों पर चिन्ता जताते हैं. साम्प्रदायिक दंगों के बाद कोई मुख्यमंत्री ऐसी ख़ास टोपी पहन कर सामने आता है तो वह मुसलमानों और हिन्दुओं को क्या सन्देश देना चाहता है?

ज़ाहिर-सी बात है कि इतनी सारी चीज़ें यों ही अचानक नहीं हो जातीं. सपा चाहती है कि मुसलमान उसके साथ गोलबन्द हो जायें और ग़ैर-यादव, ग़ैर-दलित हिन्दू बीजेपी के साथ चला जाये. इससे दोनों को फ़ायदा होगा. कैसे? यादवों व मुसलमानों को गोलबन्द कर सपा जितनी ज़्यादा से ज़्यादा सीटें 2014 में जीतेगी, उतना ही वह नयी सरकार के गठन को प्रभावित करने की स्थिति में होगी. कुछ ज़्यादा सीटें आ गयीं तो मुलायम अपने प्रधानमंत्री बनने का दावा भी पेश कर सकते हैं. इस स्थिति में न भी पहुँच सके, तो नयी सरकार के गठन में भरपूर सौदेबाज़ी वह करना चाहते हैं.

उधर, बीजेपी के लिए सीटें जिन राज्यों से बढ़ सकती हैं, वे हैं उत्तर प्रदेश, बिहार व राजस्थान, जहाँ उसके पास काफ़ी कम सीटें हैं. जैसे उत्तर प्रदेश से उसके पास सिर्फ 10 सीटें हैं. बिहार में 12 और राजस्थान में 4. राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निकम्मेपन के कारण बीजेपी काफ़ी आश्वस्त दिखती है. लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार को लेकर उसका दम फूल रहा है, इसलिए दोनों राज्यों में अचानक दंगे होने लगे!

बहरहाल, बीजेपी उत्तर प्रदेश से जितनी ज़्यादा सीटें जीत पायेगी, वह दिल्ली के लक्ष्य के उतना ही क़रीब पहुँचेगी. इस बात को लेकर बीजेपी के अन्दर भी किसी को मुग़ालता नहीं कि पार्टी इतनी सीटें ला सकेगी कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन जायें, लेकिन बीजेपी में सब यह मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा, जिसकी ज़मीन ऐसे दंगों से तैयार की जा रही है और इससे बीजेपी को लगता है कि उसकी सीटें काफ़ी बढ़ सकती हैं. अगर इतनी सीटें आ गयीं कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन सकें तो ठीक, वरना बीजेपी कोई और 'सर्वमान्य' नेता पेश करे और सरकार बनाये. ऐसे में उसे सहयोगी दलों की ज़रूरत पड़ेगी, तो नीतिश की जगह मुलायम क्या बुरे हैं? वक़्त आ गया है कि जनता इस घिनौनी राजनीति को समझे.

लेखक कमर वहीद नक़वी वरिष्ठ पत्रकार और आजतक न्यूज चैनल के पूर्व न्यूज डायरेक्टर हैं.

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