इस सूची के मायने क्या हैं ? यह कैसी रैंकिंग है ? इनके कामों का विश्लेषण किस तरह किया गया है ? क्या एक छोटे से दायरे में ऐसी रैंकिंग संभव है ? यदि है तो इसकी विश्वसनीयता कितनी है ? क्या आज मीडिया मालिक-संपादक दर असल किसी जन-प्रतिबद्धता के लिए काम करते हैं ? मुझे लगता है कि वे सिर्फ और सिर्फ पैसे के लिये काम करते हैं। भोग विलास, यश और बड़े नेताओं और अधिकारियों से मेल जोल, बस। बाकी तो सब आई-वाश है।
ये मीडिया महारथी नहीं बल्कि मीडिया के पण्डे हैं जो गरीब जनता का मांस नोंच नोंच कर खाने को उद्दत हैं। धनाढ्य तबके की सेवा इनका प्राथमिक कर्म है, तब यह रैंकिंग क्या इन्हीं सब करतूतों और कुकर्मों के मद्देनजर बने गई है ? अगर ऐसा है तो आप बधाई के पात्र हैं अन्यथा भर्त्सना के। अभी भी वक़्त है अपनी समझ साफ़ कर लो कर्मकांड और पाखण्ड के साथ ही चलन है तो सीना तान के चलो। शायद जनता के साथ आप चल भी न सकेंगे।
शैलेन्द्र चौहान






