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इलाहाबाद

ये वर्दी पर घटता भरोसा है या आम लोगों का फूटता गुस्सा?

इलाहाबाद। ये पुलिस के प्रति आम लोगों का घटता भरोसा है या उनके गलत कारनामे को लेकर फूटता गुस्सा। इलाहाबाद में पुलिस दबंगों के हाथ लगातार पिट रही है। चार अप्रैल को शिवकुटी के थानेदार पर दिनदहाड़े फायरिंग, उसके सात दिन पहले शहर के प्रमुख इलाका सिविल लाइंस में सीओ पर हमला, साथ खड़े कई दारोगा और बड़े अफसरों का तब गूंगा बने रहना, बाद में उसी सीओ को मामला सलटाने का दबाव, करेली के एसओ पर फायरिंग, कुंडा में जियाउल हक का कत्ल…। सिलसिला थमा नहीं। पुलिस का चेहरा लगातार बदल रहा है। इसकी अनदेखी खतरनाक है।

इलाहाबाद। ये पुलिस के प्रति आम लोगों का घटता भरोसा है या उनके गलत कारनामे को लेकर फूटता गुस्सा। इलाहाबाद में पुलिस दबंगों के हाथ लगातार पिट रही है। चार अप्रैल को शिवकुटी के थानेदार पर दिनदहाड़े फायरिंग, उसके सात दिन पहले शहर के प्रमुख इलाका सिविल लाइंस में सीओ पर हमला, साथ खड़े कई दारोगा और बड़े अफसरों का तब गूंगा बने रहना, बाद में उसी सीओ को मामला सलटाने का दबाव, करेली के एसओ पर फायरिंग, कुंडा में जियाउल हक का कत्ल…। सिलसिला थमा नहीं। पुलिस का चेहरा लगातार बदल रहा है। इसकी अनदेखी खतरनाक है।

आठ अप्रैल को यमुनापार के मांडा पुलिस पर हमला, थाने की जीप ड्राइवर के चोट लगते ही साथ गए पुलिसकर्मियों का वहां से भागना। इसी दिन गंगापार के सोरांव थाने के दो सिपाहियों को दबंगों ने वर्दी उतरवाने और नौकरी खा जाने की धौंस देकर आरोपी को हिरासत से छुड़ाने की कोशिश की। घटनाएं महत्वपूर्ण नहीं, महत्वपूर्ण है तो इस तरह की लगातार होती वारदातें और उनकी रोकथाम के लिए प्रभावी कदम का न उठाया जाना। अनदेखी की वजह क्या है? क्या किसी बड़ी वारदात का इंतजार है?

गुंडे-मवालियों से परेशान लोग पहले पुलिस के पास जाते थे। उनको वर्दी पर भरोसा था। पुलिस को देखते ही अपराधी भी भाग खड़े होते थे। पुलिस आमजन के साथ खड़ी होती और आमजन पुलिस के साथ। और शायद इसी भाव को लेकर यूपी में मित्र-पुलिस का प्रयोग किया गया था। पर अब? अगर आप पूर्वाग्रह की जंजीर से बंधे नहीं है तो जिले के कुछ खास चुनिंदा थानों और सार्वजनिक स्थल पर टहल जाइए। वहां दिखेगा पुलिस का असली रंग। यहां एसएसपी से लेकर कई कानून व्यवस्था के रखवालों के कागजी आंकड़े उन्हें मुंह चिढ़ाते नजर आने लगते हैं। दावा है कि असलियत देख आपकी आंखें खुल जाएंगी। कई हिस्ट्रीशीटर थाना चला रहे हैं। पुलिस उनके आगे नतमस्तक खड़ी है। विश्वास न हो तो इलाहाबाद के नवाबगंज थाना पर ‘रिसर्च’ कर डालिए। एक से बढ़कर एक दिलचस्प कारनामे…। शोध करने वाले को पीएचडी तक मिल सकती है। जनता को दिख रहा है अफसरों को काहे नहीं? सीओ, एसपी तक हालात से समझौता करते दिख रहे हैं।

सूबे के ज्यादातर थानों की दशा तेजी से बिगड़ रही है। माहौल विपरीत होते जा रहे हैं। सिपाही-दारोगा की नौकरी करने वाले नए रंगरूट दिल में हौसला लेकर पुलिस में भर्ती होते हैं। पर उनका कायदा चेहरा देखिए। थके-हारे, हालात से समझौता करते, हाई ब्लडप्रेशर, तनाव जैसी बीमारियों से जूझते। इन सबके बीच हैं, घाघ-पुरनिए पुलिस वाले बड़े खिलाड़ी। बड़े से बड़े तोपची के खिलाफ जिस धारा में चाहें दलालों को साथ लेकर फर्जी रिपोर्ट लिखा सकते हैं। शासन-प्रशासन से जुड़े लोग काहे नहीं करते स्टिंग आपरेशन। आईजी साहब, डीजीपी साहब, भेष बदल कर, चेहरा, पद छिपाकर जाइए न किसी थाने में। चाहें तो अपने ही नाम आरोपी बन रिपोर्ट लिखाते खुद को देखेंगे। कई थाने के जीप चालक अपराधियों के लिए बतौर मुखबिर कार्य कर रहे हैं। लगातार कई थानों में रि-पोस्टिंग के नाम पर अपराधियों के हमराही बनने वालों के प्रति पुलिस अफसर बेखबर क्यों हैं?

ज्यादातर थानों में असली ‘पंचायत-राज’ कायम है। मुखबिर कम होते जा रहे हैं, कमाई कराने वाले दलाल नब्बे फीसदी थाने-चौकियों में भरे पड़े हैं। दिनभर दलालों और इलाके के छंटे गुंडों की ‘वर्दी’ के साथ थाने के भीतर ही पंचायत होती है। प्रभावी लोगों के दरवाजे हाजिरी लगाना, सत्ता के करीबी होने की बकैती कर साधारण लोगों को अर्दब में लेना, ड्यूटी का यह प्रमुख हिस्सा बन रहा है। यह मीडिया के लिए एक्सक्लूसिव, ओहदेदार कुर्सी पर बैठे जिम्मेदार लोगों की असलियत जांचने का भी विषय बन सकता है।

कुंडा में ट्रिपल मर्डर होता है। खास यह कि पुलिस अपने एक जाबांज अफसर तक की सुरक्षा नहीं कर पाती। तर्क दिया जा सकता है कि राजा भैया का खौफ है, वहां की जनता मदद को सामने न आती, लेकिन दूसरी जगह भी पुलिस अपने बगल जनता को खड़ा नहीं पाती। क्या पुलिस-मित्र का प्रयोग पूरी तरह फेल रहा या पुलिस आम लोगों का विश्वास ही नहीं हासिल कर पा रही है। असलहाधारी पुलिसकर्मी कई घंटे बाद भी खेतों में दुबके मिलते हैं। एक भी फायर नहीं। क्या था ये? कायरता, मिलीभगत या फिर कुछ और? कुंडा में जांच कर रही सीबीआई तक पुलिस के ‘खेल’ को महसूस करती है और सीबीआई के बड़े अफसर को एक-दो नहीं, बल्कि एएसपी से लेकर अगल-बगल के सभी थानों के इंचार्ज, दरोगा सिपाहियों को बदल डालने की सिफारिश करनी पड़ी। यह तो सूबे में तेजी से चेहरा बदल रही पुलिस का सिर्फ एक नमूनाभर है। लाख टके का सवाल एक बार फिर से मुंह बाए खड़ा जवाब मांग रहा है। देश के प्रमुख सूबे की जाबांज पुलिस को इतना कमजोर बनाने वाले कौन हैं? यूपी की बहादुर ‘शेर-पुलिस’ आखिर किस तरह से बिना दांत और पंजे की बनकर सत्ता के सर्कस और मुट्ठीभर मदारियों के निजी उपयोग का हिस्सा बन हालात से समझौता करने को मजबूर होती जा रही है।

इलाहाबाद से वरिष्‍ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट. दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान में नौकरी के बाद अब फ्री-लांसिंग. इनसे संपर्क मोबाइल नंबर 0955694757 के जरिए की जा सकती है.

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