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रमन सिंह से ऐसे कृपण व्यवहार की उम्मीद न थी

छत्तीसगढ़ सरकार राहत में है, क्योंकि प्रदेश में आंदोलनरत लाखों शिक्षाकर्मी अपने आपको संकट में फंसा पा संघर्ष छोड़ शरणागत जो हो लिए। राज्य निर्माण की ग्यारहवीं वर्षगांठ पर सरकारी विकास की ऊंची उड़ान के यशोगान के बीच शिक्षाकर्मियों द्वारा निकाले जा रहे अपने अभाव की कराह का ‘गुस्ताख’ स्वर सरकार को खासा कर्कश जो लगा। लिहाजा ‘एस्मा’ से लेकर गिरफ्तारी और बर्खास्तगी के डंडों की जो रेलमपेल मचाई, उससे संघर्ष के मैदान में सूपड़ा ही साफ हो गया।

छत्तीसगढ़ सरकार राहत में है, क्योंकि प्रदेश में आंदोलनरत लाखों शिक्षाकर्मी अपने आपको संकट में फंसा पा संघर्ष छोड़ शरणागत जो हो लिए। राज्य निर्माण की ग्यारहवीं वर्षगांठ पर सरकारी विकास की ऊंची उड़ान के यशोगान के बीच शिक्षाकर्मियों द्वारा निकाले जा रहे अपने अभाव की कराह का ‘गुस्ताख’ स्वर सरकार को खासा कर्कश जो लगा। लिहाजा ‘एस्मा’ से लेकर गिरफ्तारी और बर्खास्तगी के डंडों की जो रेलमपेल मचाई, उससे संघर्ष के मैदान में सूपड़ा ही साफ हो गया।

दबी हुई जुबानों से दो साल बाद बगावत का स्वर न फूटे, इस खातिर दस फीसदी वेतन बढ़ोतरी का बताशा भी आंदोलनकारियों के मुंह में ठूंस दिया गया है। सरकार के कर्णधार गद्गद हो सकते हैं कि एक बड़ा आंदोलन पनपने से पहले ही उनके कौशल से समाप्त हो गया, लेकिन इस आंदोलन की बुनियाद में मौजूदा सवाल अनुत्तरित है और वह सवाल महज दो लाख शिक्षाकर्मियों के भविष्य से नहीं, बल्कि इस देश और प्रदेश के भविष्य से जुड़ा हुआ है। और यह सवाल शिक्षाकर्मियों को वेतन या मिलने वाली सुविधा का नहीं, वरन इस समूची ‘शिक्षाकर्मी नाम की व्यवस्था’ का है।

जीवन का यह व्यावहारिक अनुभव तो कोई अनपढ़ गंवार भी जानता है कि किसी भी इमारत के कंगूरे कितने ही मजबूत और खूबसूरत क्यों न हों, यदि उस इमारत की नींव कमजोर है, तो वह अधिक दिनों तक नहीं टिकी रह सकती। लेकिन दुर्भाग्य इस देश और प्रदेश का कि हमारे भाग्य नियंता सत्ताधीश इस यथार्थ को पूर्णत: भुला बैठे हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के शासनकाल में प्रारंभ हुआ ‘शिक्षाकर्मी’ नामक प्रयोग विरासत में इस राज्य को मिला। यह ‘प्रयोग’ अब दीमक का प्रकोप बन हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था और पीढ़ी को खोखला करता जा रहा है।

हर साल शिक्षकों के स्थान पर विद्यालयों में बड़े पैमाने पर भर्ती किए जा रहे शिक्षाकर्मियों के ऊपर हमारे नौनिहालों को गढ़ने की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। जिस कुम्हार के हाथों को अभाव का पोलियो मार चुका हो, उसके बनाए घड़ों का हश्र क्या होगा। यह विकास की कौन सी परिभाषा है कि जिस शिक्षक के कंधों पर देश का भविष्य तैयार करने की महती जिम्मेदारी है, उसे इस कार्य के एवज में मिलने वाला वेतन हमारे हुक्मरानों को पानी पिलाने वाले चपरासी से भी कम है।

साल दर साल हम शिक्षाकर्मियों की भर्ती कर कुंठित व्यक्तियों का समूह ही तो तैयार कर रहे हैं। किसी भी लोक कल्याणकारी सरकार का प्राथमिक दायित्व है कि वह अपने राज्य के विभिन्न उपक्रम, चाहे वह  सार्वजनिक क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के, समान कार्य का समान वेतन सुनिश्चित करे। लेकिन यहां तो सरकार ही विषमता की रीति नीति को बढ़ावा दे रही है। एक ही विद्यालय में एक नियमित शिक्षक और शिक्षाकर्मी के वेतन में अंतर ढाई गुना से अधिक जा पहुंचा है। इस नीति से वर्तमान में सरकार के खजाने में कुछ रुपए जरूर बच जा रहे हैं, लेकिन खजाने की पेंदी में छेद भी तो होते जा रहे हैं।

किसी भी राज्य की असल पूंजी कागज के नोट नहीं, उसकी अवाम होती है। अवाम को पुरुषार्थी बनाना, प्रतापी बनाना शासन की पहली जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी के तहत अपने नागरिकों को उचित शिक्षा, समुचित स्वास्थ्य सुविधा, पेटभर भोजन और भयमुक्त जीवन सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। सरकार महज एक रुपए किलो चावल की खैरात बांटकर अपने कर्तव्यों की
इतिश्री कर ले, यह उचित प्रतीत नहीं होता। खासकर तब दुख और बढ़ जाता है, जब सत्ता की कमान रमनसिंह जैसे संत स्वभाव और शिक्षा महकमे की जिम्मेदारी बृजमोहन अग्रवाल जैसा दरियादिल मंत्री संभाल रहा है।

जिस खजाने से एक रुपए किलो की खैरात बांटने के लिए हजार करोड़ निकाले जा सकते हैं, वह खजाना शिक्षकों को उनके मेहनताने का वाजिब हक देने के लिए कृपणता क्यों दिखा रहा है? शिक्षाकर्मियों की मांगों को खारिज और हड़ताल को नाजायज ठहराते हुए सरकार का बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ न करने का बयान कोयल के कंठ से कौए के कर्कश स्वर सा प्रतीत होता है। राज्य बनने के बाद से सबका स्तर सुधरा। एंबेसेडर से सफारी गाड़ी हो गई, इकोनामी का सफर बिजनेस क्लास का हो गया। सचिवों-मंत्रियों के वेतन हजारों से लाखों में तब्दील हो गए।

प्रदेश के उद्योगपतियों के बैंक बैलेंस करोड़ों से अरबों में हो गए, लेकिन विद्यालयों में शिक्षक शिक्षाकर्मी होता चला गया। जिस छत्तीसगढ़ में संत कबीर दास जी के माध्यम से ‘गोविंद’ के ऊपर गुरु की महिमा को स्थापित किया गया था, आज उसी प्रदेश में विकास की दौड़ में वह ‘गुरु’ खुद को अपने ही विद्यालय के ‘भृत्य’ से पीछे मौजूद पाता है, तो हम सबका मन खून के आंसू रोता है। उम्मीद करें कि आंदोलन बिना भी सरकार इस सवाल का जवाब खोजेगी और अपनी बंद मुठ्ठी खोलेगी। छत्तीसगढ़ कई मामलों में देश में नंबर वन का खिताब हासिल करता आया है। उम्मीद : शिक्षाकर्मी नामक व्यवस्था को खत्म करने में भी यह राज्य जरूर अव्वल बनेगा।

लेखक डॉ. हिमांशु द्विवेदी हरिभूमि के प्रबंध संपादक हैं.

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