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रमेश नहीं, फर्म है भास्कर की असली मालिक : आरएनआई

दैनिक भास्कर टाइटिल को लेकर अग्रवाल घराने में मचे घमासान में नया मोड़ आ गया है. कलिनायक किताब के लेखक व प्रकाशक ने आरएनआई में कुछ शिकायतें की थीं. उन्हीं शिकायतों के जवाब के क्रम में आरएनआई ने जो कुछ लिखित रूप से भेजा है, उससे पता चलता है कि दैनिक भास्कर टाइटिल पर किसी एक अग्रवाल का हक नहीं बल्कि एक फर्म को मालिकाना हक है.

दैनिक भास्कर टाइटिल को लेकर अग्रवाल घराने में मचे घमासान में नया मोड़ आ गया है. कलिनायक किताब के लेखक व प्रकाशक ने आरएनआई में कुछ शिकायतें की थीं. उन्हीं शिकायतों के जवाब के क्रम में आरएनआई ने जो कुछ लिखित रूप से भेजा है, उससे पता चलता है कि दैनिक भास्कर टाइटिल पर किसी एक अग्रवाल का हक नहीं बल्कि एक फर्म को मालिकाना हक है.

फर्जी विक्रय पत्र और झूठी जानकारी के जरिए फर्म के नाम की जगह पांच लोगों को दैनिक भास्कर टाइटिल का मालिक बनाए जाने की शिकायत कलिनायक किताब के लेखक व प्रकाशक ने आरएनआई से की थी. पंजीयक (रजिस्ट्रार) न्यूज पेपर, नई दिल्ली को भेजी शिकायत में इन्होंने कहा था कि दिनांक 13-3-1985 की फर्जी विक्रय पत्र और झूठी जानकारी जिला दंडाधिकारी व रजिस्ट्रार न्यूज पेपर को प्रस्तुत करके घोषणा पत्र में भरकर के दैनिक भास्कर के एक मालिक (फर्म) के स्थान पर पांच मालिक रजिस्ट्रार न्यूज पेपर के रिकार्ड में दर्ज करवा दिए गए. इससे प्रेस रजिस्ट्रेशन और बुक्स एक्ट 1867 की धारा 6 का उल्लंघन हुआ है. इस शिकायती पत्र के बाद पंजीयक, समाचार पत्र (आरएनआई) की तरफ से शिकायतकर्ता को जो जवाब भेजा गया, उसमें एक जगह साफतौर पर कहा गया है-

''आरएनआई रिकार्ड के अनुसार टाइटिल दैनिक भास्कर हिंदी डेली भोपाल के लिए सन 1956 में श्री द्वारका प्रसाद अग्रवाल को आवंटित किया गया था. इसके पश्चात द्वारका प्रसाद अग्रवाल के द्वारा झांसी, ग्वालियर और उज्जैन से दैनिक भास्कर का प्रकाशन प्रारंभ किया गया. सन 1972 में द्वारका प्रसाद अग्रवाल ने द्वारका प्रसाद अग्रवाल एंड ब्रदर्स फर्म बनाकर दैनिक भास्कर के सभी विद्यमान संस्करणों का मालिक उसे बनाया. इसके पश्चात द्वारका प्रसाद अग्रवाल एंड ब्रदर्स ने सबसिडरी कंपनियां खोलीं, जैसे कि भास्कर पब्लिकेशन एंड एलायड इंडस्ट्री, ग्वालियर ताकि इसके माध्यम से ग्वालियर का संस्करण चलाया जा सके. और मेसर्स – भास्कर ग्राफिक्स एंड प्रिंटिंग आर्ट प्राइवेट लिमिटेड ताकि इसके द्वारा इंदौर संस्करण चलाया जा सके. ये सब कंपनियां फर्म से लीज (पट्टे) / लायसेंस के आधार पर संचालित की जा रही थीं. सन 1980 के आसपास इन कंपनियों ने घोषणापत्र भरते समय दैनिक भास्कर टाइटिल के असली मालिक फर्म मेसर्स – द्वारका प्रसाद अग्रवाल एंड ब्रदर्स का नाम भरने की बजाय अपना नाम मालिक के रूप में भरना शुरू कर दिया. इस कारण से विवाद उत्पन्न शुरू हुआ और ट्रायल कोर्ट तथा प्रेस रजिस्ट्रेशन अपीलेट बोर्ड में प्रकरण दर्ज हुए. इन प्रकरणों में हर बार आरएनआई ने एक ही बात बार-बार कहा कि फर्म द्वारका प्रसाद अग्रवाल एंड ब्रदर्स ही दैनिक भास्कर समाचार पत्र टाइटिल का मालिक है. पंजीयक, समाचार पत्र के द्वारा दैनिक भास्कर अखबार के पांच मालिक का नाम रिकार्ड में दर्ज किया गया है. यह जिला दंडाधिकारी के द्वारा प्रदत्त और सत्यापित डिक्लेयरेशन (घोषणापत्र) के अभिप्रमाणीकरण व दी गई जानकारी के आधार पर किया गया है. दैनिक भास्कर अखबार के अलग-अलग संस्करणों का पंजीयन रिकार्ड तब तक नहीं बदला जा सकता है जब तक की जिला दंडाधिकारी के द्वारा अभिप्रमाणित घोषणापत्र को धारा 8 (बी) के अंतर्गत निरस्त नहीं कर दिया जाता.''

जाहिर है कि आरएनआई द्वारा दी गई इस जानकारी के बाद कलिनायक प्रकाशन के लोग व रमेश चंद्र अग्रवाल से लड़ाई लड़ रहे दूसरे पक्ष के लोग अब दैनिक भास्कर के अलग-अलग संस्करणों के डिक्लयरेशन पर आपत्ति करेंगे और इसे लेकर लंबी लड़ाई लड़ेंगे. अगर सभी संस्करणों के जिलाधिकारी आरएनआई के पत्र को ध्यान में रखते हुए संशोधित घोषणापत्र जारी कर देते हैं तो दैनिक भास्कर का जो रमेश चंद्र अग्रवाल ग्रुप है, उसमें अन्य अग्रवाल मालिकों की भी बराबर की भागीदारी हो जाएगी. आरएनआई का जो पत्र है, उसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है….

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