पत्रकार रवींद्र कुमार यानी मेरे आत्मीय रवींदर भैया इस दुनिया में नहीं हैं। मेरे करियर में उनका जो योगदान रहा है, उसकी व्याख्या करना मेरे लिए असाधारण चुनौती है। बड़े भाई और सच्चे मार्गदर्शक की तरह उन्होंने हमेशा प्रोत्साहित किया और आईएएननएस समाचार एजेंसी से मुझे उस जमाने में जोड़ा था जब नौकरी इतनी आसानी से नहीं मिलती थी। रवींद्र कुमार यानी मेरे जैसे अदना पत्रकार के ‘रवींदर भैया’, के गंभीर रूप से बीमार पड़ने की खबर कुछ महीनों पहले तब मिली थी जब वे अचानक एक दिन आपात स्थिति में वैशाली के पुष्पांजलि अस्पताल में पहुंचा दिए गए।
उनका ब्लड शुगर लेवल 700 के स्केल को पार कर चुका था, इसलिए डाक्टरों ने उन्हें कई पारखी चिकित्सीय उपकरणों के घेरे में कैद कर रखा था। जब इस पंचतारा अस्तपाल के कमरे में उनसे मिलने पहुंचा तो वे परमहंस भाव से एक ऐसी किताब के पन्नों में डूबे मिले जिसमें ज़िंदगी और मौत के समीकरण का गहन दार्शनिक विश्लेषण था। मैने पूछा, भैया यह क्यों पढ़ रहे तो उन्होंने अपनी सहज भोली मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ‘‘भाई, जिंदगी से जब ज्यादा उम्मीद करोगे तो मौत का अहसास बहुत सताएगी।‘’ मैंने कहा, ‘’आपको जब कुछ हुआ ही नहीं है तो फिर मौत और जिंदगी के दर्शन में आप क्यों फंस रहे हैं?‘‘ उन्होंने कहा, ’’शुगर लेवल काफी था और उसने कुछ न कुछ तो शारीरिक अहित कर ही दिया होगा।’’
बातचीत के इस क्रम में उनके बड़े भाई धनंजय जी, जिन्हें प्यार-सम्मान से हम सब धन्नु भैया कहते हैं, कमरे में दाखिल हुए। उनके चेहरे पर आश्वासन का भाव था और उन्होंने रवींदर भैया की ओर मुखातिब होकर कहा कि तुम बिल्कुल ठीक हो, भगवान के प्रति आभार प्रकट करो। इस आश्वस्ति के साथ मैं वापस घर लौटा कि अब वे खतरे से बाहर हैं और जिंदगी और करियर की पटरियों पर उसी शाश्वत-सहज मुस्कान के साथ फर्राटे लगाते मिलेंगे।
पर, यह तो उनकी ज़िंदगी का अर्द्ध-विराम भर था। उनकी ख़बर मैं अक्सर फोन से लेता रहता था। एक दिन किसी सूत्र से पता चला कि उनका लीवर डैमेज हो गया है। यह खबर मेरे लिए अविश्वसनीय सी थी। मैंने उन्हें सीधे फोन लगाया और उन्होंने फौरन इसकी पुष्टि करने में कोई हिचक महसूस नहीं की कि खबर सही है।
इस पूरे वाकये को वे जिस सहजता और साफगोई और साहस से बयां कर रहे थे, उस पर मुझे हैरत हो रही थी। वे इस बीमारी का ज़िक्र ऐसे कर रहे थे जैसे खांसी और बुखार का ज़िक्र कर रहे हों। फिर, इसी क्रम में उन्होंने कहा कि धनंजय भैया ने कम से कम खर्च में लीवर ट्रांसप्लांट करवाने की व्यवस्था कर ली है और मैं बिल्कुल ठीक हो जाऊंगा। इस बीमारी का खौफ जहां कइयों को मौत के अहसास से दो-चार कराता है, वहीं रवींदर भैया इस जानलेवा बीमारी की औकात को धता बताते हुए अपने पुराने अंदाज में बात कर रहे थे।
बातचीत के किसी पड़ाव पर उन्होंने मुझे यह कभी नहीं बताया कि उनकी बीमारी दिन पर दिन मौत के बहाने में बदलती जा रही है, और इसलिए जब मुझे भड़ास के माध्यम से उनकी त्रासद मौत की खबर मिली तो मैं सन्न रह गया। समझ में नहीं आया कि इस पर क्या प्रतिक्रिया दूं। एक ऐसे शख्स की श्रद्धांजलि लिखने बैठा हूं जिसने अपनी जिजीविषा और सहज-बेफ़िक्र मुस्कान से भनक तक नहीं लगने दी कि मौत उनके इतने करीब है।
वर्ष 2000 में उनसे मेरा परिचय धनंजय भैया के जरिए हुए था। तब रवींदर भैया को एक ऐसे पत्रकार की जरूरत थी जो आईएएनएस में उनके लिए दो घंटे नियमित फ्रीलांस काम कर सके। मुझे जब उन्होंने यह आफर दिया तो मैंने यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया। बाद में जब नवभारत टाइम्म की नौकरी मुझे मिली तो उन्होंने मुझे मुबारकबाद देते हुए इस नौकरी को स्वीकार कर लेने की इजाजत दे दी। नवभारत टाइम्स में अभी सात-आठ महीने ही बीते थे कि यहां से मेरी विदाई की पृष्ठभूमि रवींद्र भैया ने तैयार कर दी। आउटलुक हिंदी से जब उन्होंने जुड़ने का फैसला किया तो उन पर आईएएनएस हिंदी सेवा को एक भरोसेमंद व्यक्ति के हवाले करने की जिम्मेवारी आ गई। एक दिन अचानक वे टीओआई बिल्डिंग पहुंचे और मुझे साथ लेकर बाहर आए।
उनके पास एक प्रस्ताव था और यह था आईएएनएस हिंदी सेवा प्रमुख के तौर पर आईएनएस से जुड़ने का प्रस्ताव। उन्होंने मुझे अधिकारपूवर्क कहा कि तुम्हें आज ही इस्तीफा देकर आईएनएसएस चलना होगा। आफर अच्छा था और फिर चूंकि आईएएनएस अपना पुराना अड्डा था, इसलिए मुझे फैसला लेने में कोई हिचक नहीं हुई। आज भी आईएएनएस और मेरा रिश्ता अटूट बना हुआ है और इसका विशेष श्रेय रवींदर भैया उर्फ रवींद्र कुमार को भी जाता है।
वे चले गए और अपने पीछे अखंड जिजीविषा एवं जीवट की एक प्रेरक कहानी छोड़ गए हैं। उनके शोकसंतप्त परिवार से मिलने जाऊंगा, पर भाभी जी, उनकी दो मासूम बेटियों, बिलखती मां और उनके अन्य परिवार जनों का सामना करना आसान नहीं होगा, क्योंकि हमारा रिश्ता पारिवारिक भी रहा है।
तरुण कुमार 'तरुण'
पत्रकार
आईएएनएस





