वैसे सामान्यतः अब रवीश कुमार जी का एनडीटीवी पर आने वाला कार्यक्रम प्राइम टाइम नहीं देखता हूँ. लेकिन कल सुबह परसों रात के कार्यक्रम का रिपीट टेलीकास्ट जो सुबह 9 बजे आता है उसे संयोगवश देख लिया था. उसके कुछ समय बाद यशवंत भाई के मार्फत यह जानकारी प्राप्त हुई कि रवीश जी का फेसबुक ट्विट्टर एकाउंट बंद हो गया है और यह भी अटकलें सामने आईं कि शायद एनडीटीवी से उनका कुछ विवाद हो गया है और वह शायद हट रहे हैं.
इस जानकारी को लेकर कोई बहुत ज्यादा परेशान या व्याकुलता तो नहीं रही. क्योंकि यह सब तो आम बातें है, मीडिया में होता रहता है. लेकिन फिर भी एक उत्सुकता के नाते प्राइम टाइम को को देखना पड़ा, पर हाँ देखा आज सुबह के रिपीट टेलीकास्ट में ही. रवीश जी उसी अंदाज़ में मौजूद थे और दिग्विजय सिंह के बयान को लेकर कांग्रेस के सत्ता द्वय केन्द्र पर विमर्श कर रहे थे.
अब इससे पहले उस चर्चा पर आता हूँ जिसमें यह कहा जा रहा था कि रवीश जी को एक दिन पहले के कार्यक्रम में अरविन्द केजरीवाल जो आजकल आम आदमी पार्टी “आप” बनाकर राजनीति में उतर पड़े हैं उनके पक्षधर के रूप में दिखे. खैर कभी देश में भ्रष्टाचार को लेकर राजनैतिक जमात और लोकतंत्र को ही निशाने पर रखने वाले “आप” लोगों का लोकतंत्र के वास्तविक रास्ते राजनीति में दिखना एक अच्छा और शुभ कदम ही मान जाएगा.
रवीश कुमार का वह कार्यक्रम जो अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली में बिजली बिलों को लेकर हो रहे अनशन पर था, उसमें ऐसा कुछ खास तो नहीं दिखा कि उन्होंने अरविन्द के पक्ष में सबको अपने कटाक्ष से धाराशायी कर दिया हो. उस कार्यक्रम में आप पार्टी की ओर से ख्यातिप्राप्त राजनैतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव मौजूद थे, जिनकी राजनैतिक समझ के हम सब नए पुराने पत्रकार कम या अधिक मात्रा में प्रशंसक रहे ही हैं. वहीँ कांग्रेस और बीजेपी के ओर से अपेक्षाकृत कम नज़र आने वाला या यूँ कहें राजनैतिक बहसों में अपेक्षाकृत थोड़े कमजोर रहे लोग मुकेश शर्मा और विजेंदर ही मौजूद थे. ऐसे में कार्यक्रम थोड़ा एकतरफा हो जाना बनता ही है.
इस मामले में सवाल यहाँ रवीश कुमार से ज्यादा प्रोग्राम कोआर्डीनेटर पर ज्यादा बनता है. जिन्होंने भी इन लोगों को चर्चाओं में बुलाने की व्यवस्था की रही होगी. अधिकतर लोग जो पत्रकारिता खास तौर पर टीवी पत्रकारिता से जुड़े हैं उन्हें पता ही होगा कि टीवी बहस में एंकर की भूमिका मेहमान तय करने में न के बराबर रहती है. ऐसे में बातें कहीं दूसरे कोने में चली जाती दिखती हैं.
इन सबके बाद बात आती है उस सूचना पर जो अब निरर्थक हो गई है कि उक्त कार्यक्रम में अरविन्द का पक्ष लिए जाने से रवीश कुमार पर कुछ तनातनी चैनल के अंदर हो गई थी. इससे एक प्रश्न मन में उठता है कि क्या किसी पत्रकार को किसी भी संगठन या राजनैतिक पार्टी का पक्षधर होना चाहिए. भले ही वह एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में उस संगठन या पार्टी के विचारों का घोर समर्थक हो लेकिन अगर पत्रकार के रूप में बात की जाए तो उसे पक्षधरता से दूर रहना चाहिए. पत्रकारिता की सूचना या जानकारी से सामान्य व्यक्ति को किसी भी मुद्दे, राजनैतिक आंदोलन या जनजमाव के कई पहलुओं की जानकारी मिलती है जो सामान्य भावनात्मक उबाल के आगे दिखाई देना बंद हो जाता है. परन्तु जब ऐसे मौकों पर पत्रकार ही उन्माद में बह जाए तो इसमें से कई सारे मौजूद काले कोने छुप जाते हैं.
इस तरह के कारनामे काफी ज्यादा देखने को मिले हैं चाहें अरविन्द और उनकी भूतपूर्व टीम को मिला अभूतपूर्व 600 घंटे का कवरेज या फिर हाल ही में दामिनी या निर्भया नाम से दिल्ली बलात्कार कांड का पूरा मसला. लेकिन जब हम आज पलटकर इन मुद्दों का विश्लेषण करते हैं तो सब कहीं गायब हो जाता है. जो कल तक मेट्रो से लेकर गाँव कूचों तक टोपी लगाए घूमते थे आज वह छोटे बड़े हर कारनामे में मुस्कुराहट के साथ घूस देते हुए आसानी से मिल जाते हैं. लोकपाल कहाँ चला गया किसी को याद करने की फुर्सत नहीं है. जिले मुहल्ले के जो ठेकेदार कैंडिल जलाते थे वह तब और अब भी मजदूरों का वैसे ही शोषण कर रहे हैं. वही हाल बलात्कार कांड को लेकर प्रदर्शन करने को आमादा भीड़ आज जस्टिस वर्मा कमिटी की सिफारिशों को एकदम भुलवा चुकी सरकार पर चुप हैं. आपवा की कविता कृष्णन जैसी नेत्रियों ने वर्मा कमिटी की सिफारिशों को मनवाने के लिए मोर्चा बनाये रखा है. अन्यथा वह भीड़ आज जाने कहाँ खो सी गई है जो लाठी और पानी की बौछार खाने को अमादा थी. कुल मिलाकार टीवी देखकर जोश में आए लोगों के लिए वह मुद्दे समय बीतने से अपने मूल विषयों पर अप्रासांगिक हो जाते हैं.
पत्रकारिता के बारे में एक बात कही जाती है कि इसका स्वरूप आलोचनात्मक होना चाहिए. साथ ही कुछ मित्र व वरिष्ठ यह भी कहते हैं कि पत्रकारिता जब अपने असली स्वरूप में होती हैं तो पूर्णत: वामपंथी ही हो जायेगी. ऐसे में किसी की भी पक्षधरता का आरोप भी अजीब लगता है. यहाँ मुझे वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी का एक कथन याद आता है कि पत्रकार को डिटैच होकर ही लिखना चाहिए. अगर किसी मुद्दे से जुड़कर कोई बात कही जायेगी तो उसमें वह बैलेंस नहीं दिखेगा. पत्रकारिता के मिशन में चाहे वह कैसे भी मुद्दे हों उन्हें सामान्य नज़र से इतर होकर माइक्रोस्कोपिक निरिक्षण करके सबके के सामने रखना चाहिए. और शेष निर्धारण लोगों पर छोड़ देना चाहिए.
रवीश कुमार के कार्यक्रम से पहले इसी चैनल के इंटरनेट पर लीक फुटेज में कांग्रेस की तरफ से डिफेंड कर देने के आग्रह
भी सामने आया था. ऐसे में अगर किसी भी राजनैतिक दल की पक्षधरता अगर रखी जाए तो बातें काफी उलझती जायेंगी. लेकिन यह भी एक सच है कि अगर सवाल जनहित में है तो वह बदलेंगे नहीं उसे कोई भी कहेगा वह वैसे ही लगेंगे. उस कार्यक्रम में पक्षधरता तो कहीं नहीं दिखी थी लेकिन अगर पक्षधरता के आरोप सिर्फ इसलिए लगा दिए जायें कि तथाकथित राजनीति में मजबूत दो पार्टियों को मौका नहीं मिला. तो यह बात बेहद गलत ही जायेगी. खैर, अब जिस तरह की इलेक्ट्रानिक मीडिया है उससे सही की उम्मीद तो नहीं ही रहती है.
लेखक हरिशंकर शाही युवा पत्रकार हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पणियां करते रहते हैं.






