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‘रांझड़ा’ फिल्म में यही वह हिंदुत्ववादी ‘सेक्युलरिज़्म’ है, जिसे पहचानने की ज़रूरत है

Uday Prakash : कई दिनों से टीवी चैनलों में केदारनाथ, अमरनाथ, जगन्नाथ आदि छाये हुए हैं. सारा सीन नाथ-मय हो रहा है. अयोध्या फिर से लौट रहा है. बोध गया उभर आया है. बाबा राम देव फिर से नमूदार हैं. सारे जोगड़े झुंड बना रहे हैं. १२ साल का एक युग बनता है. एक युग से गुजरात का मुख्यमंत्री हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनने के लिए रथ खींच रहा है. उसी की आइडियोलाजी का एक ताकतवर सत्तर पार का बूढ़ा मंत्री नौकर के साथ सोडोमी के जुर्म में जेल पहुंच गया है. उसी की पार्टी के राज में एक कंपाउडर के पास से दो सौ करोड़ बरामद हो चुका है और उसी कंपाउडर को राष्ट्रपति सम्मान दे चुके हैं और स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाहकार समिति का वह सम्मानित सदस्य है.

Uday Prakash : कई दिनों से टीवी चैनलों में केदारनाथ, अमरनाथ, जगन्नाथ आदि छाये हुए हैं. सारा सीन नाथ-मय हो रहा है. अयोध्या फिर से लौट रहा है. बोध गया उभर आया है. बाबा राम देव फिर से नमूदार हैं. सारे जोगड़े झुंड बना रहे हैं. १२ साल का एक युग बनता है. एक युग से गुजरात का मुख्यमंत्री हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनने के लिए रथ खींच रहा है. उसी की आइडियोलाजी का एक ताकतवर सत्तर पार का बूढ़ा मंत्री नौकर के साथ सोडोमी के जुर्म में जेल पहुंच गया है. उसी की पार्टी के राज में एक कंपाउडर के पास से दो सौ करोड़ बरामद हो चुका है और उसी कंपाउडर को राष्ट्रपति सम्मान दे चुके हैं और स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाहकार समिति का वह सम्मानित सदस्य है.

रविशंकर प्रसाद के डालर-रुपया वाला यह पंच हर चैनल और अखबार में चमकाया जा रहा है – कि यूपीए की पहली सरकार के दौरान डालर के मुकाबले रुपये का रेट राहुल गांधी की उम्र तिरालिस के बराबर था. यूपीए की दूसरी सरकार के वक्त में यह सोनिया गांधी की तिरसठ की उम्र के बराबर पुंच गया है और अगर मनमोहन सिंह दुबारा पीएम बने तो रुपया उनकी उम्र अस्सी तक खिसक जायेगा.

बहुत तालियां बज रही हैं इस पर कि वाह क्या शाट लगाया है ..

लेकिन रविशंकर प्रसाद यह सच गोल कर जाते हैं कि अगर भाजपा और एनडीए की सरकार आयी तो डालर के मुकाबले रुपया या तो आडवानी जी की उम्र के बराबर पहुंचेग या फिर अटल जी की तरह बिस्तर बंद होकर सारे मंज़र से गायब हो जायेगा ….

कल 'रांझणा' देखने गया. जेएनयू के बारे में ऐसी सोच को देख कर तरस आया. इस फ़िल्म में भी बनारस के एक मोहल्ले का पंडित कुंदन उसी मोहल्ले की ज़ोया हैदर नाम की लड़की से 'इश्क' कर बैठता है और फ़िल्म के आखीर में गिल-गिल रोमेंटिक-पोलिटिकल शहीद बन कर 'हीरो' हो जाता है और खलनायिका बनती है –ज़ोया हैदर.

यही वह हिंदुत्ववादी 'सेक्युलरिज़्म' है, जिसे पहचानने की ज़रूरत है.

खैर, जो जी में आया लिख दिया. बाकी आप दोस्त लोग जानें…!

कई दिनों से जेएनयू के अपने पुराने सहपाठी भूपिंदर बराड़ की कविताएं 'सूखी हवा की आवाज़' संग्रह में पढ़ रहा हूं. कुछ उस पर लिखने का इरादा है….

जाने-माने कथाकार-उपन्यासकार उदय प्रकाश के फेसबुक वॉल से.

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