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राक्षस बनाम देवता : सोनी सोरी बनाम अंकित गर्ग

Himanshu Kumar : आज हम सब जानते हैं कि राक्षस असुर और दानव आदिवासी दलित और भारत के मूल निवासी थे, जिन्हें आर्यों ने मारा था। लेकिन आपको क्या बताया गया है? यही ना कि राक्षसों, दानवों और असुरों को इसलिए मारा गया क्योंकि वो काले होते थे, उनके सींग होते थे, उनके बड़े बड़े दांत होते थे। वो क्रूर होते थे, वो पवित्र यज्ञ की अग्नि को बुझा देते थे। राक्षस दानव और असुर मांस खाते थे शराब पीते थे और हाहाहा कर के हँसते थे। इसलिए हमारे देवता इन असुरों, दानवों और राक्षसों को मार देते थे।

Himanshu Kumar : आज हम सब जानते हैं कि राक्षस असुर और दानव आदिवासी दलित और भारत के मूल निवासी थे, जिन्हें आर्यों ने मारा था। लेकिन आपको क्या बताया गया है? यही ना कि राक्षसों, दानवों और असुरों को इसलिए मारा गया क्योंकि वो काले होते थे, उनके सींग होते थे, उनके बड़े बड़े दांत होते थे। वो क्रूर होते थे, वो पवित्र यज्ञ की अग्नि को बुझा देते थे। राक्षस दानव और असुर मांस खाते थे शराब पीते थे और हाहाहा कर के हँसते थे। इसलिए हमारे देवता इन असुरों, दानवों और राक्षसों को मार देते थे।

और हमारे देवता गोरे होते थे, वो बिलकुल हमारी तरह शांत, सुंदर पवित्र होते थे। देवता हमारी तरह सिर्फ मोहक ढंग से मंद मंद मुस्कुराते थे। देवता हमारी यज्ञ की अग्नि की रक्षा करते थे। देवता सुगन्धित, फूलों पर चलने वाले, स्वर्ण आभूषण पहने, फल खाने वाले, सुंदर संगीत प्रेमी मधुर सौम्य और रमणीय होते थे।

कुछ समय बाद जब मैं मर जाऊंगा और आपको सोनी सोरी के ऊपर हुए अत्याचारों और हमारी अपनी पुलिस की क्रूरता के बारे में बताने वाला कोई नहीं होगा। तब पुलिस की मालिक सरकार अपने इतिहास में लिखेगी की ''सोनी सोरी एक क्रूर और हत्यारी नक्सली आतंकवादी थी। वह छोटे बच्चों को भी मारती थी। वह हत्याएं करने के बाद हाहाहा कर के हंसती थी। इसलिए हमारे एक बहादुर पुलिस के देवता जैसे आफिसर अंकित गर्ग ने अपनी जान हथेली पर रख कर उस राक्षसनी सोनी सोरी को दंड दिया जिससे सोनी सोरी के क्रूर कर्म रुक गए और प्रजा शांति से रहने लगी। पवित्र आत्मा अंकित गर्ग को इस वीर कर्म के लिए भारत पुण्य भूमि के तत्कालीन राष्ट्रपति ने वीरता पदक देकर सम्मानित किया।''

असल में आपकी स्मृति में हमेशा विजेताओं की कहानियाँ डाली जाती हैं, इसलिए आपका मस्तिष्क खुद को विजेता प्रजाति का मानने लगता है। हारी हुई प्रजाति की कहानियों में निराशा, ग्लानी और शोक होता है। इसलिए आप खुद को हार की कहानियों वाली प्रजाति से जोड़ना नहीं चाहते। यही कारण है कि आज भी करोड़ों दलित और आदिवासी भी खुद को भारत की आक्रामक और हत्यारी परम्परा से जोड़ने में फक्र महसूस करते हैं। ताकि वे भी एक गर्व भाव से जी सकें।

खुद सोचिये आपके दिमाग में कितना सच ज्ञान है और कितना कचरा है? और क्या आप सच में सत्य जानना चाहते हैं? या आप झूठे गर्व भाव से भरे रहना चाहते हैं और सच बोलने वाला आपको अपना शत्रु लगता है? आपका झूठा गर्व भाव आपकी प्रगति में बाधा है। इससे मुक्त हुए बिना आप एक समता युक्त सुखी संसार बना ही नहीं सकते।

मानवाधिकारवादी और सोशल एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

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