सबसे पहले मैं प्रभु से सभी को सुख समृद्धि व जागरूकता प्रदान करने की कामना करता हूँ। स्वतंत्रता के पहले राजनीतिक पार्टियों का गठन देश को स्वतंत्र करने के उददेश्य से किया गया था पर अब राजनीतिक पार्टियों के गठन का कोई मतलब नहीं है क्योंकि अब इन पार्टियों को देश में कोई ऐसे कारण के लिये नही लड़ना है जहाँ भीड़ की जरूरत हो। क्योंकि भीड़ एक ताकत होती है जिसकी अपनी कोई सोच नहीं होती व हिंसक प्रारूप का परिचायक है जबकि लोकतंत्र में हिंसा यानी दिमागी जड़ता की कोई जगह नहीं होती यहाँ पर अहिंसा यानि बौद्धिकता से सही निर्णय लेने की जरूरत होती है।
राजनीतिक पार्टियां सामंतवादी सोच का पर्याय इसलिये बन गयी हैं क्योंकि इन पार्टियों के सर्वे सर्वाओं का पहला उद्देश्य मात्र कुर्सी को पाना ही होता है और राष्ट्र हित से इनका कोई सरोकार नहीं होता। राजनीतिक पार्टियाों के आका कुर्सी पाने के अपने उद्देश्य के लिये जनता को प्रलोभनों का चारा डालते हैं और जब चुनाव जीत जाते हैं तो वह राजा महाराजाओं की तरह अपने लिये व अपने लोगों के लिये एवं पार्टी के कार्यकर्ताआों के लिये ही समर्पित होते हैं और दूसरों के लिये उपेक्षा का भाव रखते हैं और यही भावना उन्हें सामंतवादी बनाती है।
मुझे जहाँ तक ज्ञात है कि अपने संविधान में पार्टियाों के गठन की बात कहीं पर भी नहीं कही गयी है बल्कि अच्छे प्रत्याशी जो कि देश तथा समाजसेवा को समर्पित हों तथा जिनकी सोच भी बहुत विस्तृत हो, को ही चुनने के लिये कहा गया है। इस बारे में मेरी श्री अन्ना हजारे व श्री सन्तोष भारतीय से भी काफी चर्चा हुई थी। श्री सन्तोष भारतीय ने मुझे यह बताया था कि उन्होंने अपनी जिन्दगी में एक ही असंवैधानिक कार्य किया है तथा जिसका अफसोस मुझे जिन्दगी भर रहेगा और वह है, एक पार्टी के नाम पर चुनाव लड़ना व जीतना। वैसे भी सामंतवादी सोच व व्यवस्था को खत्म करने के लिये ही लोकतंत्र का उदय हुआ था अतः सामंतवादी सोच ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन है। श्री महात्मा गाँधी जी भी स्वंतत्रता के बाद राजनीतिक पार्टियों के हिमायती नहीं थे अतः उन्होने स्वंतत्रता के बाद राजनीतिक पार्टियों से अपने को अलग कर लिया था। इसलिये मेरी समझ से चुनाव में राजनीतिक पार्टियों का गठन ही अलोकतांत्रिक तथा असंवैधानिक है। यह भी सर्वविदित है कि जब लाखों लोग एक अच्छे प्रत्याशी को चुनेंगे तो वह भी 400 से 600 के लगभग अपने जैसों में स्वतः ही योग्य नेता (मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री) व मंत्रिमण्डल को भी अवश्य बना लेंगे। चूँकि यह जीते हुये प्रत्याशी राष्ट्र तथा समाज के उत्थान को समर्पित होंगे अतः इनके अन्दर किसी तरह की गुटबाजी व अपने स्वार्थ की भावना नहीं होगी। वो कोई ऐसा कार्य नहीं करेंगे जिससे राष्ट्र हित व आम जनता के बीच सद्भावना व्यथित होती हो। ऐसे प्रत्याशी कभी भी चुनावों में आम जनता को किसी तरह का प्रलोभन नहीं देंगे बल्कि वह आम जनता को राष्ट्र के प्रति अपने फर्ज को याद दिलायेंगे तथा उनको लालची एवं स्वार्थी व स्वाभिमानहीन होने से बचने को भी प्रेरित करेंगे।
आजकल ऐसा होना बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि सामंतवादी सोच वाली राजनीतिक पार्टियां जिन्होंने राजनीति को सबसे फायदे का धन्धा बना लिया है जिस कारण गलत लोगों ने धन तथा बाहुबल के प्रयोग से आज राजनीति में बहुतायत से प्रवेश भी पा लिया है. इस कारण देश के चुनाव भी बहुत मंहगे एवं राष्ट्र तथा समाजसेवा को समर्पित अच्छे लोगों की पहुँच से बाहर भी होते जा रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशी जब जीत जाते हैं तो उनका सबसे पहला उद्देश्य राष्ट्र के धन को जोंक की तरह चूसना होता है जिस कारण हजारों करोड़ रूपयों के घपले भी करते रहते हैं व इस तरह के कर्मकाण्डों से देश को दिन पर दिन कमजोर व बदनाम करते जा रहे हैं।
आखिर में मैं सभी से निवेदन करूँगा कि राजनीति में ऐसे लोग ही आयें जिनकी मंशा राष्ट्र तथा समाज की सेवा व उत्थान की हो एवं जिनकी सोच भी बहुत ही विस्तृत हो तथा ऐसे लोग राजनीति में कभी भी न आयें जिनकी मंशा अपने को राजनीति से धनाढ्य बनाने की या इससे फायदा लेने की हो। मैं प्रभु से कामना करता हूँ कि वह हमारे राष्ट्र तथा विश्व में ऐसे ही त्यागी तथा अच्छे लोगों की हमेशा भरमार करते रहें जिससे राष्ट्र तथा विश्व में सदभावना, शान्ति तथा समृद्धि की लहर भी हमेशा उठती रहे।
लेखक प्रभात कुमार गुप्ता फर्रुखाबाद, उ0प्र0 में रहते हैं. इनसे 09415146417 पर संपर्क किया जा सकता है.