राजनीति और पत्रकारिता। दोनों विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रही हैं। पत्रकारिता में पेड न्यूज का मामला सबके सामने है। इसे लेकर मीडिया का अंदरुनी संघर्ष जारी है। जबतक शुद्धि नहीं होती तबतक मुश्किल बनी रहेगी। अब देश के सधे राजनेताओं पर विश्वास का ग्रहण लग रहा है। खासकर देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति ने लालकृष्ण आडवाणी के कहे को जिस तरह से नकारा हैं, उससे राजनेताओं के साख की पोल खुल रही है। इससे खतरनाक स्थिति बन सकती है।
भरोसे की कसौटी पर ही सार्वजनिक जीवन में राजनेता को बड़ा या छोटा साबित किया जाता रहा है। बीजेपी के भीष्म पितामह आडवाणी सक्रियता का बनावटी परिचय दे रहे हैं। उन्होंने अपराधियों को बचाने के लिए आए अध्यादेश के निरस्त होने का श्रेय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को दिया था। ब्लॉक पर ऐसा लिखने से संदेश गया कि राष्ट्रपति से अध्यादेश पर हस्ताक्षर कराने में सरकार को मुश्किल आ रही थी। इससे राष्ट्रपति से सरकार के तीन मंत्रियों की मुलाकात को सरकार और राष्ट्रपति के बीच तनाव का आशय निकला। राष्ट्रपति में तुलनात्मक रुप से जनभावना की बेहतर समझ को आख्यानित किया गया। यह राहुल गांधी की ओर से अध्यादेश को बकवास करार दिए जाने और फाड़कर कूड़े में फेंकने के बयान को बेकार की बात बताने के लिए था। आडवाणी के ब्लॉग ओर ट्विट से राहुल गांधी नाटकबाज साबित हो रहे थे। यह साबित हो जाता तो ठीक था। पर राष्ट्रपति ने आडवाणी के दिए श्रेय को लेने से इंकार करके ना सिर्फ खुद को पचड़े से निकाल लिया। साथ ही चुपके से बता दिया कि शालीनता से कोसों का वास्ता रखने वाले युवराज नौटंकी नहीं कर रहे थे।
इससे कई नेताओं की तरह बुजुर्ग आडवाणी की किरकिरी हुई। विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो गया। लोग 2002 का वाकया याद दिलाने लगे। तब एनडीए की सरकार ने ऐसे ही अध्यादेश लाकर तात्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को हैसियत का आईना दिखलाया था। अब्दुल कलाम का नैतिक पक्ष किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने राष्ट्रपति बनाए जाने के तमाम एहसान को खारिज करते हुए अध्यादेश पर पहली बार हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। अध्यादेश राष्ट्रपति भवन से लौट आया। सिपहसलारों की सलाह पर प्रधानमंत्री वाजपेयी की कैबिनेट ने कलाम साब को हैसियत बताना जरूरी समझा। अध्यादेश को जस का तस राष्ट्रपति के पास दोबारा भेज दिया। दोबारा आए अध्यादेश पर हस्ताक्षर करना राष्ट्रपति की वैधानिक बाध्यता थी, अब्दुल कलाम की एक ना चली और थक हारकर उनको हस्ताक्षर करना पड़ता।
ऐसा नहीं है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को श्रेय देने वाले ट्विट के वक्त आडवाणी राष्ट्रपति की हैसियत या बाध्यता से अनजान रहे होंगे। खासकर तब जब उनकी ही सरकार के पास राष्ट्रपति को इस मामले में हैसियत बताने का रिकार्ड है। राष्ट्रपति ने श्रेय उलटकर दो काम किया है। पहला, राजनीतिक प्रगाढ़ता की समझ का परिचय दिया है। दूसरा, शीर्ष राजनेताओं के कहे पर भरोसे के संकट को बयां कर दिया है। यह दुखद है। आडवाणी ही नहीं तेलांगना को लेकर सरकार के कई मंत्रियों का सच की कसौटी के विपरीत कई बयान आ रहे हैं। चारों ओर अविश्वास का माहौल बना है। इससे आभास हो रहा है कि आने वाला समय दुरूह होने जा रहा है। जाहिर है भरोसे के अभाव में राजनीति करना और मुश्किल होता जाएगा।
मिसाल की बात करूं तो सिर्फ आडवाणी के विश्वसनीयता ही समस्या में नहीं फंसी बल्कि यही गति नरेन्द्र मोदी की होती दिख रही है। आडवाणी को ठिकाने लगाने वाले नरेन्द्र मोदी बयान देने में अविश्वसनीय तरीके से कच्चे साबित हो रहे हैं। दिल्ली की रैली में एक साथ पाकिस्तान और मीडिया दोनों पर हमला किया। एक ओर नवाज शरीफ की शराफत पर सवाल उठाया तो दूसरी ओर मीडिया को राष्ट्रीय धर्म का पाठ पढाया। मोदी ने एक पाकिस्तानी पत्रकार के बयान को आधार बना जो कहा वह गलत साबित हुआ। मोदी ने भरी जनसभा में जोश दिलाने के लिए “भरे दिल” का हवाला देते हुए कहा कि नवाज शरीफ ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को “देहाती औरत” कहा है। यह बात भारतीय पत्रकार के सामने कही गई। पत्रकार ने भारतीय प्रधानमंत्री की तौहीन पर एतराज जताने के बजाय शरीफ के साथ जलपान करना पसंद किया।
तहकीकात के बाद पता लगा कि मोदी की विश्वसनीयता ही ट्रैप में फंस गई। पाकिस्तान ने अधिकारिक बयान जारी करके कहा कि शरीफ ने भारतीय प्रधानमंत्री की तौहीन नहीं की। यह भी पता लगा कि जिस वक्त पाकिस्तान प्रधानमंत्री का कथित आपत्तिजनक बयान आया उस वक्त कोई भारतीय पत्रकार मौजूद ही नहीं था। उल्टे शरीफ को अतिरिक्त शराफत प्रदर्शित करने का मौका मिल गया और भारतीय प्रधानमंत्री से एक न कही बात के लिए माफी मांग ली।
मीडिया के लिए अधिकारिक बयान का महत्व होता है। यह मानकर चला जाता है कि कोई भी अधिकारिक बयान अविश्वसनीय नहीं होता है। अधिकारिक बयान ही खबरों की पूरी दुनिया यानी मीडिया को संचालित करती है। हर शाम अधिकारिक ब्रीफिंग की विश्वसनीयता की वजह से ही बीजेपी, कांग्रेस, वामपंथी और जनता परिवार के राजनीतिक दलों के दरबार में मत्था टेकने के लिए पत्रकारों की बड़ी फौज जुटती है। इन दफ्तरों की अधिकृत ब्रीफिंग से पत्रकारों को दशकों से वो खुराक मिलता रहा है, जो उनको दिन भर के कठिन परिश्रम से नहीं मिल पाता है। ब्रीफिंग के तथ्य की व्याख्या करने के तरीके पर एतराज या विवाद तो हो सकता है, पर तथ्य पर कोई सवाल नहीं होता। नियमित ब्रीफिंग के अलावा पत्रकार इन दफ्तरों के उन्हीं नेताओं का दरबार सजाया करते हैं, जो विश्वसनीय होते हैं। मिसाल के तौर पर दिग्विजय सिंह को लीजिए। दिग्विजय सिंह के बारे में आप चाहे जो राय रखते हों, पर पत्रकारों के दुलारे वो सिर्फ इसलिए हैं कि उनमें अपने विश्लेषित टीम के जरिए अंदर की बात निकाल लाने का जबदस्त माद्दा है। यह माद्दा तो और भी कई नेताओं के पास है। इसका लाभ उनको मीडिया देती है। जिनकी बताई जानकारी तथ्यपरक होती है और धोखा खाने का डर सबसे कम होता है। उनपर हरदिन खबर निकालकर परोसने वाले पत्रकार सबसे ज्यादा आश्रित होते हैं। यह सहज स्वाभाविक है। अगर दिग्विजय सिंह जैसा नेता कहता है कि पूरबियों से द्वेष के जरिए मराठी मानुष की राजनीति करने वाले राज ठाकरे पुरखे बिहार से थे, तो उसे लेकर मीडिया दौड़ लेती है। प्रसारित करने में मीडिया को कोई दिक्कत नहीं होती है बल्कि अगले दिन ऐसी ही किसी हतप्रभ करने वाले खबर की उम्मीद में उनका दरबार सजाए रखने में मीडियाकर्मियों को कोई दिक्कत महसूस नहीं होती है।
दिग्विजय सिंह विश्वसनीयता बढाने के लिए प्रमोदन ठाकरे की पुस्तक का अंश तबतक मुहैया कराते हैं। दिग्विजय सिंह की तरह ही बीजेपी में अरुण जेटली हैं। हर अधिकारिक ब्रीफिंग के बाद उनके आवास पर होने वाली डी ब्रीफिंग अखबार के सुर्खियों का आधार बनती हैं। न्यूज़ चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ अधिकारिक ब्रीफिंग से ज्यादा इन विश्वसनीय नेताओं के डी ब्रीफिंग से आती है। बाकी नेताओं से भी मीडिया को यही अपेक्षा रहती है। प्रमोद महाजन की कमी आज भी मीडिया को इसी विश्वास की वजह से खटकती है। अधिकारिक ब्रीफिंग में भरोसे का नतीजा है कि मीडिया अरविंद केजरीवाल को आंखों पर रखती है। राबर्ट बढेरा से लेकर सलमान खुर्शीद के खिलाफ मीडिया का प्रचार खुद की जांच से अधिक भरोसा आधारित राजनेताओं से मिली जानकारी पर टिकी होती है।
ऐसे में अपेक्षा लाजिमी है कि नेता भरोसे को तोड़ने का काम न करें। झटके से बड़ा होने की चाहत में आंखों में धुल झोंकने का काम बंद हो और जब जो भी कहा जाए वह पूरी तहकीकात के बाद भरोसे को कसौटी पर कसने के लिए कहा जाए। अधिकारिक ब्रीफिंग की विश्वसनीयता के आधार पर ही युद्ध लडे जाते हैं। मीडिया का काम ब्रीफिंग में कही बात पर एतराज करने के बजाय उसको रिपोर्ट करना होता है। ब्रीफिंग के दौरान वह सिर्फ कही बात को सहजता से लिखने के लिए प्रतिसवाल किया करता है ताकि उस कहे के आधार की पुष्टी हो सके।
लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने 'आज', 'देशप्राण', 'स्पेक्टिक्स इंडिया', 'करंट न्यूज', होम टीवी, 'माया', दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक काफी समय से समाज सेवा, पर्यावरण सक्रियता, मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.






