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राजेंद्र माथुर की ‘गिफ्ट-लिफ्ट’ वाली सलाह और सांसत में फंसी मेरी जान

नवभारत टाइम्स के तत्कालीन प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने एक घटना के बाद मुझे कहा था कि पत्रकार को गिफ्ट और लिफ्ट से परहेज नहीं करना चाहिए बल्कि इन्हें सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। हुआ यह कि रब्बी जी के अवकाश पर होने के कारण माथुर जी ने मुझे यू. पी. डेस्क की जिम्मेदारी दे रखी थी। मैं काम में व्यस्त था कि एक महिला आकर मेरे पास बैठ गई और बाते करने लगी। मैंने डेस्क पहली बार संभाली थी इसलिए थोड़ा परेशान भी था। उधर वह महिला बात बनाए जा रही थी। मैंने उसे कहा कि आज काम बहुत है, आप फिर किसी दिन आ जाएं।

नवभारत टाइम्स के तत्कालीन प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने एक घटना के बाद मुझे कहा था कि पत्रकार को गिफ्ट और लिफ्ट से परहेज नहीं करना चाहिए बल्कि इन्हें सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। हुआ यह कि रब्बी जी के अवकाश पर होने के कारण माथुर जी ने मुझे यू. पी. डेस्क की जिम्मेदारी दे रखी थी। मैं काम में व्यस्त था कि एक महिला आकर मेरे पास बैठ गई और बाते करने लगी। मैंने डेस्क पहली बार संभाली थी इसलिए थोड़ा परेशान भी था। उधर वह महिला बात बनाए जा रही थी। मैंने उसे कहा कि आज काम बहुत है, आप फिर किसी दिन आ जाएं।

वह महिला जाने लगी और चलते समय एक गिफ्ट पैक मुझे देने लगी। मैं परेशान तो था ही, गिफ्ट पैक देख कर क्रोध आ गया कि यह मुझे खरीदना चाह रही है। मैंने उस महिला को जोर से डांट दिया और तुरंत जाने को कहा। महिला पैर पटकती हुई चली गई। मैं भी काम में लग गया।

थोड़ी देर बाद माथुर जी ने मुझे अपने कक्ष में बुलाया। मेरी सीट माथुर जी के कमरे के सामने ही थी। उस महिला को डांटने की अवाज उन्होंने सुन ली थी। पूछने पर मैंने बताया कि वह  जबरन गिफ्ट देने का प्रयास कर रही थी। इस पर माथुर जी ने कहा कि आपको गिफ्ट ले लेनी चाहिए थी। आपने गिफ्ट न ले कर अपना एक विरोधी पैदा कर लिया। अब जहां भी आपका जिक्र आएगा वह आप के बारे में अच्छी राय नहीं देगी। पत्रकारिता में गिफ्ट और लिफ्ट से परहेज नहीं करना चाहिए। मैंने माथुर जी की बात गांठ बांध ली मगर गिफ्ट में तो नहीं, हां लिफ्ट का एक मामला ऐसा बना कि उसे याद कर के आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

दिल्ली जाने के लिए दादरी के बस स्टैंड पर खड़ा एक दारोगा से बात कर रहा था। इसी बीच एक कार दारोगा के पास आ कर रुकी। कार में अगली सीट पर दो आदमी बैठे थे। उनमें से एक उतरा। दारोगा से हाथ मिलाया और बात करने लगे। थोड़ी देर बाद वह चलने लगा तो दारोगा ने कहा आप भी तो दिल्ली जा रहे हैं, इनके साथ चल जाओ। उस आदमी ने पिछली खिड़की खोल दी और मैं गाड़ी में सवार हो गया। दो मिनट बाद गाड़ी गांव के सामने से गुजरी तो वह आदमी कहने लगा- ये है उस घुमंतू पत्रकार का गांव। साले ने बहुत परेशान किया था। अगर डी. एम. रासुका में बंद न करता तो उसे टपकाने का पूरा प्रोग्राम बन गया था। यह सब सुनते ही मेरे होश उड़ गए। सोचने लगा आज की लिफ्ट बहुत मंहगी पड़ सकती है।

यह आदमी कालू राम राणा था। जब मैं मेरठ में था तो इसका इतना आतंक था कि कोई इसके खिलाफ सामने नहीं आता था। राणा पी. ए. सी में कमानडेंट था और अपने विरोधियों को मारने के लिए सरकारी जीप से आता था और मार कर चला जाता था। इस पर गांव के लोगों ने पंचायत की तो राणा पंचायत में आ धमका और दो आदमियों को मार कर जीप दौड़ा कर भाग गया। इसके बाद किसी में इतना साहस नहीं रहा कि राणा के खिलाफ बोल सके।

मेरे एक अध्यापक मित्र भी इसके सताए हुए थे। एक दिन आफिस में आ कर उन्होने मुझे सारी दास्तान सुनाई और बताया कि कोई भी बोलने को तैयार नही है । शुरूआत में कुछ लोग पुलिस के पास गए थे पुलिस पड़ताल में पता चला कि जिस समय की घटना बताई गई उस समय तो राणा ड्यूटी पर था। राणा ने जो भी वारदात की, वह ड्यूटी पर रहते हुए ही अंजाम दी। मैंने मित्र से सूचनाएं लीं और एक समचार लगा दिया। मेरठ में वेद अग्रवाल भी समाचार लिखना चाहते थे मगर लिख नहीं पा रहे थे। मेरा समाचार देख कर उनका भी हौसल बढा और उन्होंने भी एक कड़क समाचार लगा दिया।

इसके बाद दूसरे अखबारों में भी छुटपुट समाचार आने लगे तो लोगों में भी हौसला पैदा हो गया। पीड़ित लोग डी. एम. से मिले और राणा की हरकतों से उन्हें अवगत कराया। कुछ सूचनाएं डी. एम. के पास पहले से थीं। डी. एम. ने शिकंजा कसना आरंभ किया और कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद राणा को रासुका में बंद करा दिया। इसके बाद जांच हुई और राणा को सेवा से भी बर्खास्त कर दिया गया। और आज मैं उसी राणा के साथ उसी की कार में सफर कर रहा था। मेरी हालत क्या होगी इस का अनुमान ही लगाया जा सकता है।

रास्ते में एक जगह गाड़ी और रुकी। राणा को कुछ परिचित दिख गए थे। लोकल होने के कारण मेरे भी काफी परिचित थे। कोई मुझे पहचान न ले, इसलिए मैंने पुस्तक खोल कर मुंह के सामने कर ली। यहां से आगे बढने पर राणा ने पीछे घूम कर देख तो मेरे होश उड़ने लगे। राणा ने पूछा आप किस चीज के डाक्टर हैं बात आगे न बढे इसलिए मैंने बताया कि ढोरों ‘पशुओं’ का डाक्टर हूं। इस बीच गाड़ी गाजियाबाद कचहरी के सामने आ गई तो मैंने गाड़ी रोकने के लिए कहा और बताया कि एक जरूरी काम याद आ गया है। गाड़ी रुकते ही मैं लगभग कूदते हुए गाड़ी से उतरा और डिवाइडर फलांग कर कचहरी के गेट में घुस गया।

सामने एक परिचित वकील का चैम्बर था। वहां पहुंचा तो मुझे बदहवास देख कर वकील ने पूछा तो मैंने कहानी बता दी। सुन कर वकील ने कहा- डाक्टर साहब शुकराने की दो नमाज पढ लेना अगर उन्हें पता चल जाता तो किसी नहर में तुम्हारी बाडी मिलती।

वकील के पास थेड़ी देर सुस्ता कर दिल्ली आया और माथुर जी के कक्ष में जा कर सारी कहानी बताई और कहा कि आप का लिफ्ट वाला फार्मूला तो आज फेल हो गया। माथुर जी हंसें और बोले इस फार्मूला में संशोधन यह कर लो कि किसी अनजान आदमी से लिफ्ट लेने से जहां तक संभव हो बचना चाहिए।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

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