राजेन टोडरिया के निधन पर सहसा विश्वास नहीं कर पाने वाले राष्ट्रीय सहारा के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल ने कहा कि मैंने राजेन टोडरिया जैसा विद्वान तथा मुद्दों जागरूक रहने वाला पत्रकार नहीं देखा. मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा है कि वे हमारे बीच से चले गए हैं. पत्रकारिता के साथ मुद्दों को लेकर जूझने की उनकी क्षमता हमलोगों को हमेशा प्रेरणा देती रहेगी. उनका जाना जनपक्षधर पत्रकारिता की बहुत बड़ी क्षति है. परन्तु उनके किए गए कार्य हमारे बीच उनकी मौजूदगी का एहसास कराती रहेगी.
उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार बसंत निगम ने कहा कि राजेन टोडरिया ने स्थानीय लोगों के हक के लिए हमेशा लड़ाई लड़ी. पहाड़ी मुद्दों को लेकर हमेशा सरकार से लड़ते भिड़ते रहते थे. सरकार के खिलाफ कलम चलाने से लेकर सड़क पर उतरने से भी वे परहेज नहीं करते थे. उत्तराखंड को लेकर उनके मन में जो चिंतन था, उससे वो सरकार को बताना चाहते थे. अपने लक्ष्य के प्रति हमेशा समर्पित रहे. कलम के माध्यम से मुद्दों को जीवन भर उठाते रहे. उनका निधन उत्तारखंड के लिए बहुत बड़ी क्षति है, जिसे भरा नहीं जा सकता.
देहरादून के पत्रकार अनिल राणा ने कहा कि राजेन टोडरिया जी युवा पत्रकारों के लिए बहुत बड़े मार्गदर्शक थे. सरकारों को जगाने के साथ उन्होंने भटकती पत्रकारिता दिशा पर भी बराबर आक्रमण किया. पहाड़ी मुद्दों पर तो वे हमेशा मुखर रहे. उनके भीतर जबर्दसत वैचारिक मजबूती थी. उनकी लेखनी में कल्पनाशीलता थी. पहाड़ के लिए लड़े, बिना डरे लिखा. ऐसे पत्रकार की कमी उत्तराखंड को बराबर खलती रहेगी. उत्तराखंड ने केवल कमल चलाने वाले नहीं बल्कि सड़क पर उतर कर लड़ने वाले एक पत्रकार को खो दिया.
उत्तराखंड के युवा पत्रकार दीपक आजाद ने कहा कि राजेन टोडरिया जी का जाना एक अपूरणनीय क्षति है. वे हमेशा जनता के लिए लड़ते रहे. जनपक्षधरता के साथ हमेशा खड़े रहे. पत्रकारिता से आगे बढ़ते हुए वे राजनीति की तरफ भी आ गए थे. जनमंच के माध्यम से उन्होंने उत्तराखंड के आम लोगों की आवाज उठाने की कोशिश की. सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों ने हमेशा मुद्दों को लेकर भिड़ते रहे. कलम चलाने में उन्होंने कभी परहेज नहीं किया. उनकी व्यक्तिगत लड़ाई कभी किसी से नहीं रही. वे हमेशा आम लोगों के लिए ही संघर्ष करते रहे.





