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सुख-दुख...

”राजेश कौशिक मेरे लिए सिर्फ बॉस नहीं बल्कि उससे कहीं ज्‍यादा थे”

राजेश कौशिक ना सिर्फ मेरे बॉस थे बल्कि मेरे लिए मेरे संरक्षक की तरह थे.. मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैं पहली बार राजेश कौशिक जी से मिलने स्टार न्यूज़ के दफ्तर गया था। ये उस वक्त की बात है जब राजेश कौशिक जी स्टार छोड़कर सहारा से जुड़ने वाले थे। मुझे किसी ने बताया था कि कोई गाज़ियाबाद के राजेश कौशिक जी हैं जो सहारा यूपी चैनल में बतौर हेड ज्वाइन कर रहे हैं…. वैसे भी उन दिनों मैं राव वीरेंद्र सिंह और उनके चम्‍मचों की फौज, जिसके हेड हुआ करते थे कविंद्र सचान, इन सब लोगों से दुखी था। खासतौर से इसलिए क्योंकि इन लोगों ने मेरे क्राइम शो की तरक्की और टीआरपी से जलकर उसे बंद करा दिया था।

राजेश कौशिक ना सिर्फ मेरे बॉस थे बल्कि मेरे लिए मेरे संरक्षक की तरह थे.. मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैं पहली बार राजेश कौशिक जी से मिलने स्टार न्यूज़ के दफ्तर गया था। ये उस वक्त की बात है जब राजेश कौशिक जी स्टार छोड़कर सहारा से जुड़ने वाले थे। मुझे किसी ने बताया था कि कोई गाज़ियाबाद के राजेश कौशिक जी हैं जो सहारा यूपी चैनल में बतौर हेड ज्वाइन कर रहे हैं…. वैसे भी उन दिनों मैं राव वीरेंद्र सिंह और उनके चम्‍मचों की फौज, जिसके हेड हुआ करते थे कविंद्र सचान, इन सब लोगों से दुखी था। खासतौर से इसलिए क्योंकि इन लोगों ने मेरे क्राइम शो की तरक्की और टीआरपी से जलकर उसे बंद करा दिया था।

मैं पहली बार राजेश कौशिक जी से मिलने गया था, लेकिन मुझे उनसे मिलकर ऐसा लगा ही नहीं कि ये मेरी उनकी पहली मुलाकात है… बड़े ही दिलफेक किस्म के व्यक्ति थे। पहली मुलाकात में ही उन्होंने मुझसे कहा कि सहारा यूपी का आउटपुट तुम्हें संभालना है, स्टाफ की शिफ्ट अब तुम तय करोगे… मैंने उनसे कहा कि नहीं सर मेरे बस का ये सब काम नहीं है आप तो बस मेरा बंद किया हुआ क्राइम शो हैलो कंट्रोल रूम दोबारा शुरू करा दीजिएगा मैं तो उसी में खुश हूं और मन लगाकर काम भी कर पाऊंगा। ईश्वर साक्षी है मुझे कभी संस्थान की राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं रही लेकिन फिर भी कमोबेश इसने कभी मेरा पीछा भी नहीं छोड़ा, हमेशा मुझे शिकार बनाया… मेरी ड्यूटी मेरे तत्कालीन बॉस ने कॉमनवेल्थ गेम्स में लगा दी। तत्कालीन बॉस के नाम का ज़िक्र ऊपर कर चुका हूं दोबारा नाम लिखने की शायद ज़रुरत नहीं है।

8 अक्टूबर 2010 को राजेश कौशिक जी ने सहारा यूपी चैनल ज्वाइन करना था, लेकिन मेरी ड्यूटी 24 सितंबर 2010 से ही कॉमनवेल्थ गेम्स में लगा दी गई, ये ड्यूटी 18 अक्टूबर तक चली… 8 अक्टूबर को बॉस ने, माफ कीजिएगा मैं उन्हें हमेशा बॉस ही कहकर बुलाया करता था…, चैनल ज्वाइन कर लिया और मेरी कॉमनवेल्थ गेम्स की ड्यूटी जारी थी… मेरे पीछे कई लोगों ने बॉस के केबिन में बैठकर चाय पीनी शुरू की जिनमें से कुछ बॉस के खास तो कुछ बहुत खास बनने में कामयाब हो गये… और मैं फिर एक बार राजनीति का शिकार बना लिया गया, क्योंकि मेरे खिलाफ कुछ बहुत खास लोगों ने बॉस को कायदे से भड़का दिया था।

बहरहाल 18 फरवरी को मेरी कॉमनवेल्थ गेम्स की ड्यूटी खत्म हुई उसके बाद दो दिन की छुट्टी संस्थान ने दी फिर दिवाली आ गई, उसके बाद मां को चिकनगुनिया हो गया औऱ फिर 23 नवंबर को मेरी शादी थी और शादी के बाद मेरे चाचा जी का देहावसान हो गया। इन सब में पूरे दो महीने गुज़र गये और मैं करीब दो महीने छुट्टी पर रहा (लीव विदआउट पे पर)। 1 जनवरी को मैं छुट्टियों से वापस लौटा तो हैरान था। बॉस का मेरे प्रति व्यवहार एक दम हैरान कर देने वाला था मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे बॉस मुझे नाकारा, निकम्मा और हरामखोर समझ रहे हैं। हर बात पर मुझे न्यूज़ रुम में सरेआम बेइज्ज़त करना, ये सिलसिला करीब 15-20 दिन तक चलता रहा… लेकिन आते ही बॉस ने एक काम बहुत बढ़िया किया था कि मेरा शो वापस शुरु करा दिया था।

उन दिनों मेरे शो को याकूब गौरी बनाया करते थे और मेरे पीठ पीछे बॉस के खास छर्रे बने हुए थे। बात बात पर उनके केबिन में जाना… उनसे सलाह मशविरा करने के बहाने केबिन में बैठकर उनके साथ चाय पीना, ये सब कई खास छर्रों का रोज़ का काम था… मुझे केबिन में बुलाना तो दूर मुझसे तो बॉस ठीक से बात भी नहीं करते थे… मैं ये सब देखकर सोचकर काफी डिप्रेशन में रहता था… लेकिन फिर मैंने एक दिन गंभीरता से सोचा कि आखिर माजरा क्या हो सकता है? आखिर मैंने ऐसा क्या किया है जो मुझसे बॉस इतने खफ़ा रहते हैं, शायद मेरे काम में कोई कमी हो लेकिन काम तो ठीक ही करता हूं, जो क्राइम की स्टोरी आती हैं उन्हें शो के लिए बना देता हूं… तो फिर मुझे मेरी आत्मा ने जवाब दिया जवाब ये था कि बेटा अब तक काम सिर्फ आधे घंटे का स्लॉट भरने के लिए कर रहे हो, अब काम अपनी आत्म संतुष्टि के लिए करो। वाकई तब तक मैं क्राइम का शो बना तो रहा था लेकिन मुझे आत्म संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी। रोज़ ऐसा लगता था कि शायद कोई कमी रह गई है, लेकिन उस दिन मैंने कसम खाई कि नहीं आज के बाद आधे घंटे का स्लॉट भरना बंद अब काम होगा खुद के लिए…।

बस फिर क्या था मैंने एक के बाद एक कई शो लगातार बनाने शुरू कर दिये… यहां तक कि रात को घर पर इंटरनेट से विज़ुअल डाउनलोड करता था रात को ही स्क्रीप्ट लिखता था। सुबह दफ्तर पहुंचकर विज़ुअल इंजस्ट कराता था और वॉयस ओवर करके पैकेज कराकर प्रोग्राम ऑन एयर कर देता था। ये सिलसिला भी करीब 2 महीने तक लगातार जारी था… इस बीच बॉस से बस शो के नाम और कॉन्सेप्ट को लेकर चर्चा होती थी, कोई फालतू बात नहीं…। मैं कार्यक्रम बनाता गया और शो की टीआरपी लगातार बढ़ती रही बॉस भी थोड़े-थोड़े खुश होने लगे। कई बार मेरी डेस्क पर आकर मुझसे पूछ लिया करते थे हां भई फ़र्ज़ी आज क्या बना रहा है तो मैं हंसकर उन्हें कार्यक्रम का नाम और कॉन्सेप्ट बता दिया करता था… इसी बीच एक दिन बॉस ने मुझे अपने केबिन में बुलाया वो भी डेस्क पर लगे इंटरकोम पर फोन करके…।

तत्कालीन आउटपुट हेड कृष्ण रजित ने मुझे अवाज़ लगाई अरे शगुन तुम्हें बुला रहे हैं। मैंने कहा कौन तो उन्होंने बॉस के केबिन की तरफ इशारा किया। मैं सोच में पड़ गया मैंने मन ही मन कहा कि कोई भसूड़ी तो नहीं हो गई पता चला आज पेल दिया जाऊं… मैं यही सवाल मन में लिए बॉस के केबिन में गया। बॉस ने कहा बैठो, मैंने कहा जी सर। उन्होंने मेरी तरफ इंडिया टुडे मैग्ज़ीन फेंकी और कहा कि इसमें दाऊद की सल्तनत के नाम से कवर स्टोरी छपी है, उसी पर मुझे कल का शो चाहिए। मैंने कहा ठीक है सर बन जाएगा… हांलाकि दाऊद मेरे लिए एक नया विषय था। मैंने दाउद के बारे में क्राइम के शो उस दिन तक सिर्फ आज तक पर ही देखे थे, कभी कुछ लिखा नहीं था… खैर ज़िंदगी में पहली बार कभी ना कभी तो होता ही है और इस बार मेरे लिए दाउद पहली बार था…।

उन्हीं दिनों वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई फिल्म रिलीज़ हुई थी। मैंने वो फिल्म भी दो बार देखी थी और उस फिल्म का आखिरी डायलॉग अभिनेता रनदीप हुड्डा की आवाज़ में आज भी मुझे याद है कुछ इस तरह से था “आज 18 साल बाद हज़ारों मील दूर बंबई में ना रहकर भी वो बंबई पर राज करता है”। बस इसी डायलॉग पर मैंने दाउद की सल्तनत शो का प्रोमो एडिट कराया और बॉस को दिखाया…. बॉस प्रोमो देखकर इतने खुश हुए मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। उन्होंने डेस्क पर बैठे अपने सभी खास छर्रों को बुलाया और वो प्रोमो दिखाया। सभी छर्रों ने मेरी तारीफ की, सबने कहा क्या दिमाग लगाया है शगुन, कहां का डायलॉग कहां इस्तेमाल किया है। इस पर बॉस बोले और क्या तुम्हारी तरह थोड़ी है ये, मुझे चूतिया बनाते रहते हो 10-10 दिन की छुट्टियां मांगते हो और काम के नाम पर हरामखोरी करते हो…। ये शब्द बॉस ने उस बहुत खास के लिए कहे जिसने मेरे पीछे मेरे खिलाफ बॉस के कान भरे थे और शिफ्ट इंचार्ज बनकर बैठ गया था…।

बस उस दिन से बॉस को समझ आ गया मैंने लंगड़े घोड़ों पर दॉव लगा रखा है, काम का आदमी शगुन है बाकि सब अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। बॉस के खास बनकर गलत फायदा उठा रहे हैं… बस उसके कुछ दिनों बाद ही बॉस ने मुझे डिप्टी आउटपुट हेड बना दिया। शिफ्ट इंचार्ज की ज़िम्मेदारी दे दी। उस दिन मुझे वो कहावत फिर से याद आई “ऐवरी डॉग हैज़ ऐ डे ”…. बॉस की एक खासियत थी, बॉस जिसपर विश्वास करते थे उस पर आंख मूंदकर करते थे…। मैं जब तक सहारा में था बॉस का सबसे खास था। बॉस के और मेरे बीच संस्थान से लेकर घर परिवार की भी कोई बात राज़ नहीं रहती थी…। इतना ही नहीं अक्सर बॉस मुझे अपने साथ शॉपिंग पर ले जाते, अक्सर मुझे और बॉस को किसी बात पर चर्चा करनी होती थी तो हम लोग साथ में फिल्म देखने चले जाते थे, लेकिन मुझे हमेशा एक ही बात कहते थे कि देख मेरा खास होने का गलत फायदा मत उठाना, अपना काम हमेशा पूरा रखना और यही वजह थी कि मैं डिप्टी आउट पुट हेड होने के बावजूद एक शो रोज बनाया करता था और उसकी टीआरपी भी आती थी…।

बॉस दिल के साफ व्यक्ति थे और दिमाग के दबंग थे, जिसके लिए जो दिल में था वही ज़ुबान पर भी था। अगर किसी के लिए दिल में गाली देने का ख्याल होता था तो उसे मुंह पर गाली दिया करते थे… किसी को फर्जी तेल लगाने की उनकी आदत नहीं थी… किसी को कोई भी परेशानी हो बॉस उसका चुटकी बजाकर समाधान कर दिया करते थे… प्यार से हम लोग बॉस को चुलबुल पांडे भी कहकर बुलाते थे… मेरे बॉस के परिवारिक रिश्ते थे… मेरे लिए बॉस के घर के दरवाज़े किसी भी वक्त खुले रहते थे… मैं सहारा में अब नहीं था लेकिन फिर भी मुझे ऐसा लगता था कि हां कोई ऐसी शख्सियत है जिसके घर का दरवाज़ा अगर मैं आधी रात भी खटखटाऊंगा तो मेरे लिए उस घर के दरवाज़े खुल जाएंगे… मेरी सहारा में वापसी हो जाए इसके लिए भी बॉस ने भरसक प्रयास किये… लेकिन मेरी किस्मत में शायद वापसी नहीं थी…. आखिरी बार बॉस से 14 मार्च को बात हुई थी। मेरे पहचान के कुछ लोगों का गाज़ियाबाद में एक पुलिस मैटर हो गया था, उसके लिए मैंने बॉस को फोन किया था लेकिन बॉस उस दिन बात करते हुए मुझे कुछ परेशान लगे, पता नहीं क्यों उन्होंने मुझसे ठीक से बात नहीं की थी। हालांकि मैटर निपटा दिया था लेकिन मुझे उनका व्यवहार कुछ बदला बदला सा लगा…।

15 मार्च को मैं लखनऊ चला गया और 21 मार्च को मैं लखनऊ में ही था कि उस्मान का मुझे फोन आया और फोन सुनकर मैं हैरान रह गया। पहले तो मुझे लगा कि शायद हल्का फुल्का ऐक्सीडेंट होगा लेकिन जैसे ही उस्मान ने मुझे बताया कि नहीं भैय्या बॉस वेंटिलेटर पर हैं तो मेरे पांव तले ज़मीन खिसक गई। मेरे मन में उसी वक्त गलत ख्याल आ गया था लेकिन मैंने मन को तसल्ली दी लेकिन 28 मार्च की सुबह ऐसी मनहूस सुबह साबित होगी इस बात की कल्पना भी मैंने नहीं की थी। करीब 10.30 बजे जैसे ही मैंने अपना मोबाइल ऑन किया मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। उसमें उस्मान का मैसेज था और मैसेज में लिखा था कि सहारा एनसीआर चैनल हैड राजेश कौशिक इज़ नो मोर। अंतिम संस्कार 10 बजे हिंडन पर… इस मैसेज को पढ़ते ही मैं बदहवास अपनी गाड़ी की ओर दौड़ा और निकल पड़ा लेकिन घड़ी में वक्त देखा तो 10 बजकर 38 मिनट हो रहे थे। मैंने तुरंत उस्मान को फोन लगाया तो उसने मुझे बताया कि भैय्या अंतिम संस्कार तो हो चुका अब आप घर ही आ जाना… मैंने कहा ठीक है दिल्ली से गाज़ियाबाद शास्त्री नगर तक के सफर भर बॉस का चेहरा मेरी आंखों के सामने था। एक पल के लिए भी उनके अलावा कोई दूसरा ख्याल दिमाग में नहीं आया… बॉस के घर पहुंचा तो मेरी घर की चौखट पार कर भीतर जाने की हिम्मत नहीं हुई। अपनी मां समान भाभी से मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और दोपहर बाद घर वापस आ गया….।

मलाल सिर्फ इस बात का है कि आखिरी बार बॉस को देख नहीं पाया…. बीच में एक दिन यशोदा अस्पताल बॉस को देखने गया था लेकिन कमबख्त डॉक्टरों ने आईसीयू में जाने नहीं दिया था। उस दिन ये सोचकर वापस आ गया था कि चल दो चार दिन में वेंटिलेटर हट जाएगा तो फिर आऊंगा, लेकिन मुझे क्या मालूम था कि दो चार दिन में तो बॉस हमेशा हमेशा के लिए चले जाएंगे… बास के जाने के बाद मेरे मन को बस यहीं सवाल कचोट रहा है कि बॉस के परिवार पर जो विपत्ति आई वो उससे बाहर कैसे निकल पाएंगे…. ईश्वर से यही प्रार्थना है कि बॉस के परिवार को इस विपत्ति का सामना करने की शक्ति दें… और बॉस की आत्मा को शांति प्रदान करें… सार्वजनिक मंच से ये शगुन त्यागी का वायदा बॉस और उनके परिवार से है कि आधी रात को भी बॉस का ये छोटा भाई उनकी गैरमौजूदगी में खड़ा मिलेगा… बस बॉस अपना आशीर्वाद बनाये रखना।

लेखक शगुन त्यागी सहारा, चैनल वन, नॉर्थ ईस्ट बिज़नेस रिपोर्टर समेत कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. मायावती की मूर्ति तोड़कर चर्चा में आने वाले शगुन 'राजद्रोह' नाम से एक किताब भी लिख रहे हैं. इन दिनों वे सपा से जुड़े हुए हैं. शगुन से संपर्क उनके मोबाईल नंबर 07838246333 पर किया जा सकता है.

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