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राज्‍यसभा चुनाव : झारखंड के गंदे लोगों की गंदी पसंद?

: स्‍थानीय उम्‍मीदवार की बजाय धनपशुओं को प्रमुखता दे रहे भाजपाई : एक विज्ञापन देखा था- उंचे लोग, उंची पसंद, फलना चंद। हमारे झारखंड में यह उल्टा है- गंदे लोग, गंदी पसंद, फलना चंद। राज्यसभा को सभ्य लोगों का सदन माना जाता है। लेकिन झारखंड से गंदे लोगों की गंदी पसंद के कारण लोकतंत्र के इस मंदिर में गंदगी के उदाहरण पहले भी देखे गये हैं। इस बार भी यही हो रहा है। झारखंड में भाजपा नीत सरकार है। वर्तमान 80 विधायकों में 45 का समर्थन इस सरकार को प्राप्त है।

: स्‍थानीय उम्‍मीदवार की बजाय धनपशुओं को प्रमुखता दे रहे भाजपाई : एक विज्ञापन देखा था- उंचे लोग, उंची पसंद, फलना चंद। हमारे झारखंड में यह उल्टा है- गंदे लोग, गंदी पसंद, फलना चंद। राज्यसभा को सभ्य लोगों का सदन माना जाता है। लेकिन झारखंड से गंदे लोगों की गंदी पसंद के कारण लोकतंत्र के इस मंदिर में गंदगी के उदाहरण पहले भी देखे गये हैं। इस बार भी यही हो रहा है। झारखंड में भाजपा नीत सरकार है। वर्तमान 80 विधायकों में 45 का समर्थन इस सरकार को प्राप्त है।

राज्यसभा की सीट निकालने के लिए सिर्फ 27 वोट चाहिए। इसलिए एक सीट निकाल लेना बायें हाथ का खेल है। यह तब संभव था जब फैसला करने वाले अच्छे लोग हों। अच्छी सोच हो। अच्छी पसंद हो। लेकिन अगर गंदे लोग, गंदी सोच के साथ अपनी गंदी पसंद थोपना चाहें तो वही होगा जो झारखंड में हो रहा है। राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन के अंतिम क्षण तक प्रमुख दल अपना प्रत्याशी नहीं चुन सके। भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल ने तो अपना प्रत्याशी ही नहीं दिया। इसका कारण सबको दिखता है कि प्रत्याशी को लेकर मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी के बीच नहीं पटी। गडकरी एक एनआरआई को उम्मीदवार बनाना चाहते थे। मुंडा की पसंद जमशेदपुर का धनपति था। दोनों को ही भाजपा से कोई लेना-देना नहीं। दोनों के संबंध में भाजपा विधायकों या पदाधिकारियों के बीच न तो प्रदेश स्तर पर कोई चर्चा हुई, न ही केंद्रीय स्तर पर। इसका कारण साफ था। आप किसी अच्छे काम को सीना ठोंक कर कर सकते हैं। लेकिन गंदा काम तो चोर की ही तरह करना पड़ता है।

चोर की तरह गंदे काम करने की कोशिश का ही नतीजा है कि भाजपा में अकेले अर्जुन मुंडा एक तरफ और सारे 17 विधायक एक तरफ दिखे। इसी तरह झामुमो में अकेले हेमंत सोरेन एक तरफ और सारे 17 विधायक दूसरी तरफ दिखे। नामांकन के एकदम आखिरी समय तक सस्पेंस बना रहा। मुंडा और गडकरी के दोनों दुलारों ने निर्दलीय के रूप में परचा भरा। दोनों को अपने पैसे की ताकत पर यह घमंड है कि कोठे पर सजी किसी भी वेश्या को खरीद सकते हैं। झाविमो और कांग्रेस ने अपने दल के वफादार लोगों को टिकट देकर एक अच्छा संदेश दिया। ऐसा संदेश देने में भाजपा चूक गयी। कारण वही- गंदे लोगों की गंदी पसंद। झाविमो ने प्रवीण सिंह को टिकट दिया तो भाजपा भी दीपक प्रकाश या रामजीलाल सारडा को राज्यसभा भेज कर हटिया विधानसभा सीट की जीत सुनिश्चित कर सकती थी।

भाजपा के पास अजय मारू, रामटहल चौधरी, युगल किशोर खंडेलवाल, ज्ञानप्रकाश जालान, केके नाग, सूर्यमणि सिंह, बलबीर दत्त, महेश पोद्दार, देवदयाल कुशवाहा, महावीर विश्वकर्मा, यदुनाथ पांडेय, रवींद्र राय, अशोक भगत, देवीधन बेसरा, लोकनाथ महतो, चंद्रमोहन प्रसाद, राकेश प्रसाद जैसे लोगों की लंबी सूची है। ऐसे लोगों में किसी को उम्मीदवार बनाने से राज्यसभा की गरिमा बची रहती और झारखंड व पार्टी का भी भला होता। लेकिन यहां चर्चा यह होती रही- किसका पार्टनर जीतेगा, इसका पार्टनर, या उसका पार्टनर? गंदे लोगों की गंदी पसंद का ही नतीजा है कि आज महज राज्यसभा की एक सीट के लिए सिद्धांतवाली भाजपा पार्टी का केंद्रीय नेताओं के बीच जूतमपैजार हो रही है। आडवाणी से लेकर यशवंत सिन्हा, सुषमा, जेटली तक की नाराजगी सामने आ चुकी है। यहां तक कि भाजपा के तथाकथित समर्थित एनआरआई प्रत्याशी अंशुमन मिश्र द्वारा अपना नामांकन वापस लेने जैसी छिछालेदर की स्थिति पैदा हो गयी है। ऐसी ही एक अन्य पसंद निर्दलीय प्रत्याशी को राज्यसभा भेजकर झारखंड के भूमिपुत्रों को धूल चटाने की तैयारी हो रही है।

गंदे लोगों की गंदी पसंद का ही नतीजा है कि आज झारखंड विधानसभा के सत्र में जनता के गंभीर सवालों पर चर्चा के बजाय माननीय सदस्यों का ज्यादा वक्त पेटी और ड्रम जैसे शब्दों और साइनिंग एमाउंट के बाद वोटिंग एमाउंट जैसे शब्दों पर चर्चा में बीत रही है। झारखंड के लिये जान लगाने वाले बेचारे गुरु जी शिबू सोरेन की लंबे समय से कसक है कि झारखंड के युवा अधिवक्ता संजीव कुमार को राज्यसभा भेजें। लेकिन पैसे के आगे गुरुजी भी लाचार कर दिये गये। पिछली बार गुरु जी ने संजीव कुमार का नाम घोषित कर दिया। लेकिन उसके बदले एक धनपशु को टिकट दे दिया गया। इस बार गुरुजी की जिद के कारण अंतिम क्षण में संजीव कुमार को दिखावे के लिए टिकट दे दिया गया। लेकिन हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री के साथ बंबई जाकर गडकरी की जिस साजिश में हिस्सा लिया, उससे झामुमो प्रत्याशी की हार सुनिश्चित है। क्या यही दिन देखने के लिए बना झारखंड, यही सोच सोच आजकल परेशान रहता है यह एक बेचारा झारखंडी। गंदे लोग, गंदी पसंद, फलना चंद का फारमूला कब तक चलेगा?

अंत में एक झारखंडी चुटकुला- किसी ने पूछा- भाजपा और झामुमो में क्या समानता और क्या फर्क है। जवाब मिला- समानता यह कि दोनों के नेता अपने विधायकों की भावना के खिलाफ हैं। फर्क यह कि झामुमो के विधायक अपने आलाकमान के आगे दब्बू नहीं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 
 

 
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